बरगद के पत्ते पर बालक

The child on the banyan leaf — Mārkaṇḍeya in the flood sees a child holding the whole world

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सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधवः ।
वन 192.56

जय श्री कृष्ण।

कभी-कभी ऐसा लगता है न… कि पूरी दुनिया डूब रही है?

सुबह अख़बार खोलो — बाढ़, युद्ध, बीमारी, छँटनी। और अपनी ज़िंदगी में भी — बीस साल का बनाया काम-धंधा एक झटके में बैठ गया। डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर चेहरा गंभीर कर लिया। जिस घर में सब हँसते थे, वहाँ अब सन्नाटा है।

और फिर एक रात आती है, जब आप अँधेरे में लेटे सोचते हैं — "कुछ नहीं बचा। चारों ओर बस पानी है। और मैं अकेला तैर रहा हूँ।"

आज की कथा उसी रात की है। बस, फ़र्क़ इतना है कि उस रात… सचमुच पूरी दुनिया डूब चुकी थी।

ये कथा महाभारत के वनपर्व में है। पाण्डव वनवास में हैं। और उनसे मिलने आए हैं — ऋषि मार्कण्डेय।

और पहली दिलचस्प बात। मार्कण्डेय की उम्र कितनी थी? युधिष्ठिर ख़ुद कहते हैं — "महामुनि, आपने एक नहीं, अनेक बार युगों का अंत देखा है। ब्रह्मा को छोड़कर, आपके बराबर लंबी उम्र किसी की नहीं।"

यानी ये ऋषि प्रलय देख चुके हैं! और युधिष्ठिर ने पूछा — "महाराज, बताइए, जब सब डूब जाता है, तब आपने क्या देखा?"

और मार्कण्डेय ने सुनाना शुरू किया।

"राजन्, युग का अंत आता है। पहले बरसों तक सूखा। भूख से प्राणी मरने लगते हैं। फिर आकाश में सात सूरज जलते हैं, और समुद्रों, नदियों का सारा पानी पी जाते हैं।"

"फिर आग। संवर्तक अग्नि। धरती फाड़कर पाताल तक, सब कुछ जलाती हुई।"

"और फिर बादल। हाथियों के झुंड जैसे, बिजली की मालाओं वाले, भयानक गरजते हुए। और बारह वर्षों तक… बारिश। पहाड़ डूब जाते हैं। समुद्र अपनी सीमा लाँघ जाता है।"

"और फिर… कुछ नहीं बचता। न देवता, न असुर। न मनुष्य, न पशु, न पेड़। बस एक अनंत समुद्र।"

निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्भ्रमाम्येकोऽहमातुरः ॥
191.88

"और उस ख़ाली दुनिया में… मैं अकेला, व्याकुल होकर भटकता हूँ।"

सोचिए उस दृश्य को। चारों ओर बस पानी। कोई किनारा नहीं। कोई आवाज़ नहीं। कोई चेहरा नहीं।

ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो धराधिप । श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लब्धवानस्म्यतन्द्रितः ॥
191.90

"मैं बहुत दूर तक तैरता गया। थक गया। पर कहीं कोई सहारा नहीं मिला।"

आप में से कई लोग इस तैरने को जानते हैं। हर रोज़ हाथ-पैर मारते हैं। थक जाते हैं। और किनारा नहीं दिखता।

और फिर… उस अनंत पानी में… मार्कण्डेय को कुछ दिखा।

ततः कदाचित्पश्यामि तस्मिन्सलिलसंनिधौ । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥
191.91

एक बरगद का पेड़। विशाल, फैला हुआ। जहाँ सब कुछ डूब गया, वहाँ एक पेड़ खड़ा था।

शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥
191.92

और उसकी एक चौड़ी शाखा पर, दिव्य बिछौनों से ढके एक पलंग पर… एक छोटा-सा बालक बैठा था!

अब यहाँ एक बात। लोक में हम कहते हैं — "बरगद के पत्ते पर बालक।" महाभारत की हमारी प्रति कहती है — बरगद की चौड़ी शाखा पर, एक पलंग पर। पत्ता हो या शाखा… बात वही है। जहाँ सब डूबा, वहाँ एक बालक मुस्कुरा रहा था।

कमल जैसा चेहरा। खिले कमल जैसी बड़ी आँखें। अलसी के फूल जैसा नीला रंग। छाती पर श्रीवत्स का निशान।

और मार्कण्डेय हैरान — "जब पूरी दुनिया नष्ट हो चुकी है… तो ये शिशु यहाँ कैसे?" और दूसरी चौंकाने वाली बात — वो ऋषि, जो भूत-भविष्य-वर्तमान सब जानते थे… उस बालक को पहचान नहीं पाए!

और बालक ने बड़ी मीठी आवाज़ में कहा —

जानामि त्वां परिश्रान्तं तात विश्रामकाङ्क्षिणम् ।
191.98

"तात… मैं जानता हूँ, तुम बहुत थक गए हो। विश्राम चाहते हो।"

सुनिए। प्रलय के बीच, भगवान का पहला वाक्य क्या है? कोई उपदेश नहीं। कोई परीक्षा नहीं। "मैं जानता हूँ, तुम थक गए हो।"

"आओ, मेरे शरीर के भीतर आकर विश्राम करो। जब तक चाहो।"

और उस पल मार्कण्डेय के मन में एक अजीब बात हुई। महाभारत कहता है — उन्हें अपने लंबे जीवन पर ही उदासी आ गई। युगों-युगों का जीवन। प्रलय पर प्रलय देखे। और आज, एक बालक की एक मीठी बात के आगे, वो सारी लंबी उम्र… फीकी लगी। उम्र कितनी भी लंबी हो, थकान वहीं उतरती है, जहाँ कोई कहे, "आओ, आराम करो।"

और बालक ने अपना मुँह खोला… और मार्कण्डेय उसमें समा गए!

और भीतर क्या देखा?

पूरी पृथ्वी! राज्य, नगर। गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी… सारी नदियाँ। हिमालय, विन्ध्य, मेरु… सारे पर्वत। समुद्र, आकाश, सूरज, चाँद। शेर, बाघ, सारे जीव। इन्द्र और सारे देवता।

और लोग! अपने-अपने काम में लगे हुए। यज्ञ करते, खेती करते, जीवन जीते हुए।

बाहर सब डूब चुका था। और भीतर… सब सुरक्षित था। एक बालक के पेट में।

मार्कण्डेय सौ साल से ज़्यादा उस शरीर के भीतर घूमते रहे। फल खाते रहे, दौड़ते रहे। और उस शरीर का अंत कभी नहीं मिला।

और बाद में मार्कण्डेय ने एक बात कही — "प्रभु, आपके भीतर इतना घूमा, पर आपकी कृपा से मेरी याददाश्त नहीं खोई।" भगवान के भीतर रहकर भी आप "आप" रहते हैं। वो आपको मिटाते नहीं, सँभालते हैं।

और आख़िर में… मार्कण्डेय ने वही किया जो हर थका हुआ यात्री अंत में करता है।

ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत्तदा ।
191.126

"मैं उन्हीं की शरण में गया।"

और उसी पल, हवा के एक झोंके की तरह, वो बालक के मुँह से बाहर आ गए। और सामने, उसी शाखा पर, वही बालक… सारा जगत भीतर लिए, मुस्कुराता हुआ।

अपीदानीं शरीरेऽस्मिन्मामके मुनिसत्तम । उषितस्त्वं परिश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥
191.131

"मुनिवर, अब बताओ — मेरे भीतर रहकर, थकान उतरी?"

जैसे कोई माँ, बच्चे को गोद में सुलाकर पूछे — "आराम मिला बेटा?"

मार्कण्डेय ने चरणों में गिरकर पूछा — "प्रभु, आप कौन हैं?"

और बालक ने कहा — "जल को 'नार' कहते हैं। और जल ही मेरा घर है। इसलिए मैं नारायण हूँ।"

"और जब तक ब्रह्मा जी सोते हैं, हज़ार युगों की उस रात तक… मैं बालक न होकर भी, बालक बनकर यहीं रहता हूँ।" सोचिए — प्रलय की सबसे लंबी रात में, भगवान ने अपने लिए कौन-सा रूप चुना? एक बच्चे का। ताकि जो भी थका-हारा वहाँ पहुँचे, उसे डर न लगे।

और फिर एक बात कही, जो हर थके हुए इंसान के लिए है —

यच्च किंचित्त्वया प्राप्तं मयि क्लेशात्मकं द्विज । सुखोदयाय तत्सर्वं श्रेयसे च तवानघ ॥
192.37

"तुमने जो भी कष्ट पाया… वो सब तुम्हारे सुख के लिए था। तुम्हारे कल्याण के लिए।"

सर्वमेकार्णवं दृष्ट्वा नष्टं स्थावरजङ्गमम् । विक्लवोऽसि मया ज्ञातस्ततस्ते दर्शितं जगत् ॥
192.43

"तुमने सब कुछ डूबा हुआ देखा, और तुम व्याकुल हो गए। मैंने जाना। इसलिए तुम्हें दिखाया — कि जगत नष्ट नहीं हुआ। वो मेरे भीतर सुरक्षित है।"

और अब तीसरी बात। सबसे बड़ी।

ये सब सुनाकर मार्कण्डेय रुके। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, द्रौपदी, सब सुन रहे थे। और वहाँ, उनके बीच, श्रीकृष्ण भी बैठे थे।

और मार्कण्डेय ने उनकी ओर उँगली उठाई —

यः स देवो मया दृष्टः पुरा पद्मायतेक्षणः । स एष पुरुषव्याघ्र संबन्धी ते जनार्दनः ॥
192.51

"युधिष्ठिर! जिस कमल-नयन देव को मैंने प्रलय में बरगद पर देखा था… वो यही हैं। तुम्हारे संबंधी। जनार्दन।"

जो प्रलय में बालक बनकर सारा जगत बचाए बैठा था… वो पाण्डवों के बीच, उनका भाई बनकर बैठा था।

और मार्कण्डेय ने कहा — "इन्हीं के वर से मेरी स्मृति मुझे नहीं छोड़ती, मेरी आयु लंबी है, और मृत्यु मेरी इच्छा से होगी।"

सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधवः । गच्छध्वमेनं शरणं शरण्यं कौरवर्षभाः ॥
192.56

"माधव ही सब प्राणियों के पिता और माता हैं। इनकी शरण में जाओ।"

तो जब दुनिया डूबती लगे, तीन बातें याद रखिए।

पहली। तैरते-तैरते थक जाना कमज़ोरी नहीं। मार्कण्डेय भी थके थे। और भगवान का पहला वाक्य था — "मैं जानता हूँ, तुम थक गए हो।" वो आपकी थकान जानते हैं।

दूसरी। जो डूबता दिखता है, वो नष्ट नहीं हुआ। आपका पुराना घर, आपके बिछड़े लोग, आपकी टूटी उम्मीदें… सब उसी बालक के भीतर सुरक्षित हैं। "ततस्ते दर्शितं जगत्।"

और तीसरी। अंत में मार्कण्डेय ने क्या किया? "तमेव शरणं गतः।" उसी की शरण। आप भी, जब सारे हाथ-पैर थक जाएँ, तो बस इतना कहिए — "मैं तुम्हारी शरण में हूँ।"

तो अगली बार, जब रात के अँधेरे में लगे कि चारों ओर बस पानी है… और आप अकेले तैर रहे हैं…

तो उस बरगद को याद कीजिए। जो प्रलय में भी खड़ा था।

और उस पर बैठा एक बालक… जो मुस्कुराकर कह रहा है, "तात, मैं जानता हूँ, तुम थक गए हो।"

जय श्री कृष्ण।

सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधवः । गच्छध्वमेनं शरणं शरण्यं कौरवर्षभाः ॥
वन 192.56

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.तैरते-तैरते थक जाना कमज़ोरी नहीं। मार्कण्डेय भी थके थे। और भगवान का पहला वाक्य था — "मैं जानता हूँ, तुम थक गए हो।" वो आपकी थकान जानते हैं।
  2. 2.जो डूबता दिखता है, वो नष्ट नहीं हुआ। आपका पुराना घर, आपके बिछड़े लोग, आपकी टूटी उम्मीदें… सब उसी बालक के भीतर सुरक्षित हैं। "ततस्ते दर्शितं जगत्।"
  3. 3.अंत में मार्कण्डेय ने क्या किया? "तमेव शरणं गतः।" उसी की शरण। आप भी, जब सारे हाथ-पैर थक जाएँ, तो बस इतना कहिए — "मैं तुम्हारी शरण में हूँ।"

इस सत्संग के श्लोक

वन 192.56 191.88 191.90 191.91 191.92 191.98 191.126 191.131 192.37 192.43 192.51 192.56