उसे भी छोड़ दो
Let him go too — Draupadī spares Aśvatthāmā so his mother will not weep as she did
The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.
मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता ।
जय श्री कृष्ण।
आज का सत्संग थोड़ा भारी है। क्योंकि आज उस बात पर बात करनी है, जिसे सबसे कठिन माना जाता है। माफ़ी।
छोटी-मोटी बातों की माफ़ी नहीं। किसी ने ग़लत बोल दिया, किसी ने उधार नहीं लौटाया — वो तो फिर भी हो जाती है। मैं उस आदमी की बात कर रहा हूँ, जिसने आपको ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुख दिया।
वो रिश्तेदार, जिसकी वजह से घर टूटा। वो आदमी, जिसकी लापरवाही से कोई अपना चला गया। वो, जिसका नाम सुनते ही आज भी हाथ काँपने लगते हैं।
"उसे माफ़ कर दूँ? कभी नहीं।" और ये बात ग़लत भी नहीं लगती।
आज एक माँ की कथा। जिसके सामने उसके बेटों का हत्यारा, रस्सी से बँधा, खड़ा था। और उसने क्या कहा… वो सुनकर भगवान ने भी सिर हिलाया।
महाभारत का युद्ध ख़त्म हो चुका है। दुर्योधन की जाँघ भीम की गदा से टूट चुकी है। युद्ध का आख़िरी दिन। और आख़िरी रात।
उस रात, गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र, अश्वत्थामा, पाण्डवों के शिविर में घुसा। उसे लगा, ये उसके स्वामी दुर्योधन को ख़ुश करेगा।
भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन् कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।
और उसने द्रौपदी के सोते हुए बेटों के सिर काट दिए। सोते हुए। बच्चे।
और भागवत एक बात साफ़ लिखता है — ये काम उसके स्वामी दुर्योधन को भी अच्छा नहीं लगा। सब इस काम की निंदा करते हैं।
सुबह द्रौपदी को ख़बर मिली।
माता शिशूनां निधनं सुतानां निशम्य घोरं परितप्यमाना ।
माँ ने अपने बच्चों की भयानक मौत सुनी… और रोने लगी। आँखें आँसुओं से भरी। बार-बार।
अर्जुन से देखा नहीं गया। उन्होंने कसम खाई — "कल्याणी, मैं तुम्हारे आँसू तब पोंछूँगा, जब उस हत्यारे का सिर काटकर तुम्हारे सामने लाऊँगा।"
और अर्जुन रथ पर चढ़े। सारथि स्वयं श्रीकृष्ण। और पीछा शुरू हुआ!
अश्वत्थामा ने दूर से देखा कि अर्जुन आ रहे हैं। जान बचाने के लिए भागा। घोड़े थक गए। और जब कोई रास्ता नहीं बचा, तो उसने वो किया जो कोई सोच नहीं सकता — ब्रह्मास्त्र चला दिया। जबकि उसे उसे वापस लेना आता ही नहीं था।
चारों दिशाओं में प्रचंड तेज! अर्जुन ने पुकारा, "कृष्ण! कृष्ण! ये क्या है?" श्रीकृष्ण ने कहा, "इसे इसी अस्त्र से शांत करो।" अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चलाया। दोनों टकराए। तीनों लोक जलने लगे। लोगों को लगा, प्रलय आ गया।
और तब, लोगों को बचाने के लिए, और श्रीकृष्ण की इच्छा समझकर, अर्जुन ने दोनों अस्त्र वापस ले लिए।
फिर अर्जुन झपटे। और गुरुपुत्र को पकड़ लिया।
बबन्धामर्षताम्राक्षः पशुं रशनया यथा ॥
क्रोध से लाल आँखें। और उसे रस्सी से ऐसे बाँधा, जैसे कोई पशु को बाँधता है।
और अब पहली चौंकाने वाली बात। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा? "इसे छोड़ो मत, पार्थ! मार डालो। इसने रात में सोते हुए निर्दोष बच्चे मारे हैं। और तुमने मेरे सामने द्रौपदी से वादा किया था।"
यानी भगवान ख़ुद कह रहे हैं — मार दो।
और उसके साथ श्रीकृष्ण ने युद्ध का एक नियम भी याद दिलाया —
मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बालं स्त्रियं जडम् ।
प्रपन्नं विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित् ॥
"धर्म जानने वाला सोते हुए को, बच्चे को, स्त्री को, डरे हुए को, शरण आए को नहीं मारता।" और अश्वत्थामा ने ठीक यही तोड़ा था। सोते हुए बच्चों को मारा था।
एवं परीक्षता धर्मं पार्थः कृष्णेन चोदितः ।
पर भागवत यहाँ एक राज़ खोलता है। श्रीकृष्ण अर्जुन के धर्म की परीक्षा ले रहे थे। और अर्जुन? उन्होंने गुरु के बेटे को मारना नहीं चाहा। भले ही उसने उनके अपने बच्चे मारे थे।
वो उसे बाँधकर शिविर ले आए। और द्रौपदी के सामने खड़ा कर दिया।
अब इस दृश्य को आँखें बंद करके देखिए।
एक तरफ़ एक माँ। जिसकी गोद कल रात ख़ाली हो गई। आँखें रो-रोकर सूजी हुई। और सामने… रस्सी से बँधा, सिर झुकाए, वो आदमी। जिसने ये किया।
और उस माँ ने सबसे पहले क्या किया? भागवत कहता है —
निरीक्ष्य कृष्णापकृतं गुरोः सुतं वामस्वभावा कृपया ननाम च ॥
उसने… उसे प्रणाम किया।
अपने बच्चों के हत्यारे को। दया से। सिर झुकाकर।
क्योंकि वो गुरु का पुत्र था। उसके पति के गुरु का। और फिर द्रौपदी से उसका बँधा होना सहा नहीं गया।
मुच्यतां मुच्यतामेष ब्राह्मणो नितरां गुरुः ॥
"छोड़ दो! इसे छोड़ दो! ये हमारे गुरु का बेटा है।"
और फिर अर्जुन को याद दिलाया — "जिन गुरु द्रोण की कृपा से तुमने सारी धनुर्विद्या सीखी, अस्त्र चलाना और लौटाना सीखा… वही द्रोण आज इस बेटे के रूप में सामने खड़े हैं।"
और फिर द्रौपदी ने वो बात कही, जो भागवत की सबसे बड़ी पंक्तियों में है।
मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता ।
यथाहं मृतवत्साऽऽर्ता रोदिम्यश्रुमुखी मुहुः ॥
"इसकी माँ अभी ज़िंदा है। गौतमी। कृपी। उसे वैसे न रोना पड़े… जैसे मैं, अपने बच्चे खोकर, आँसू भरे मुँह से बार-बार रो रही हूँ।"
सोचिए। अपना दुख इतना बड़ा। और उस दुख के बीच, उसे एक दूसरी माँ का ख़याल आया। हत्यारे की माँ का।
जिस दर्द से वो गुज़र रही थी, वो दर्द वो किसी और माँ को नहीं देना चाहती थी। चाहे वो उसके दुश्मन की माँ ही क्यों न हो।
और दूसरी बात, जो सुनकर अच्छा लगता है। भागवत कहता है — द्रौपदी के इन वचनों की सबने सराहना की। युधिष्ठिर ने, नकुल-सहदेव ने, अर्जुन ने… और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने।
भागवत उन वचनों को छह शब्दों में तौलता है — धर्म से भरे, न्याय से भरे, करुणा से भरे, निष्कपट, सबको बराबर देखने वाले… और महान।
पर सब एक जैसे नहीं थे। भीम ग़ुस्से में थे। "इसे मारना ही ठीक है! इसने सोते बच्चों को बेवजह मारा। न अपने स्वामी के लिए, न अपने लिए।"
अब अर्जुन फँस गए। एक तरफ़ अपनी प्रतिज्ञा, भीम का ग़ुस्सा। दूसरी तरफ़ द्रौपदी की करुणा।
और तब श्रीकृष्ण ने अपने मित्र के चेहरे की ओर देखा… और जैसे मुस्कुराते हुए कहा —
ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हणः ।
मयैवोभयमाम्नातं परिपाह्यनुशासनम् ॥
"ब्राह्मण को मारना नहीं चाहिए। आततायी को मारना चाहिए। दोनों नियम मैंने ही बनाए हैं। दोनों का पालन करो। और ऐसा करो, जो भीम को भी प्रिय हो, द्रौपदी को भी, और मुझे भी।"
अर्जुन तुरंत समझ गए। तलवार उठाई… और अश्वत्थामा के सिर की मणि, बालों सहित, काट ली। रस्सी खोल दी। और उसे शिविर से बाहर निकाल दिया।
भागवत कहता है — मणि गई, तेज गया, सिर मुँड़ा, शिविर से निकाला गया। ऐसे आदमी के लिए यही वध है।
ध्यान दीजिए। अर्जुन की प्रतिज्ञा थी — "उसका सिर लाऊँगा।" और वो सिर से मणि, बालों समेत, काटकर लाए। जैसे वचन भी पूरा हुआ, और प्राण भी बच गए।
न्याय भी हुआ। और करुणा भी बची।
गीता में भगवान बताते हैं कि दैवी स्वभाव के लक्षण क्या हैं —
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
"तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्रोह न करना…" देखिए, क्षमा तेज के ठीक बाद आती है। कमज़ोरी के साथ नहीं। तेज के साथ।
द्रौपदी कमज़ोर नहीं थी। वो सबसे ताक़तवर थी उस पल में। उसके एक शब्द पर अश्वत्थामा मर सकता था। और उसने कहा, "छोड़ दो।"
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। माफ़ी का मतलब ये नहीं कि जो हुआ, वो ठीक था। द्रौपदी के बच्चे लौटे नहीं। अश्वत्थामा को सज़ा भी मिली। माफ़ी का मतलब है — अपने दुख को किसी और के घर में आग बनकर नहीं जाने देना।
दूसरी। जिसने आपको दुख दिया, उसके पीछे खड़े लोगों को देखिए। उसकी माँ, उसके बच्चे, उसका परिवार। द्रौपदी ने गौतमी को देखा। जब बदले का मन हो, एक बार उस दूसरी माँ का चेहरा सोचिए।
और तीसरी। जब मन उलझा हो — न्याय करूँ या दया — तो भगवान को बीच में आने दीजिए। श्रीकृष्ण ने ऐसा रास्ता निकाला, जिसमें भीम का ग़ुस्सा भी शांत हुआ और द्रौपदी की करुणा भी। प्रार्थना कीजिए — "प्रभु, ऐसा रास्ता दिखाइए, जो सबके लिए सही हो।"
तो अगली बार, जब किसी का नाम सुनकर मन में बदले की आग उठे… जब लगे, "इसे कभी माफ़ नहीं करूँगा"…
तो उस शिविर को याद कीजिए। रस्सी से बँधा एक आदमी। और सामने खड़ी एक माँ, जिसकी गोद ख़ाली थी… और जो फिर भी झुक गई।
"उसे भी छोड़ दो… उसकी माँ को मेरी तरह न रोना पड़े।"
जय श्री कृष्ण।
मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता ।
यथाहं मृतवत्साऽऽर्ता रोदिम्यश्रुमुखी मुहुः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.माफ़ी का मतलब ये नहीं कि जो हुआ, वो ठीक था। द्रौपदी के बच्चे लौटे नहीं। अश्वत्थामा को सज़ा भी मिली। माफ़ी का मतलब है — अपने दुख को किसी और के घर में आग बनकर नहीं जाने देना।
- 2.जिसने आपको दुख दिया, उसके पीछे खड़े लोगों को देखिए। उसकी माँ, उसके बच्चे, उसका परिवार। द्रौपदी ने गौतमी को देखा। जब बदले का मन हो, एक बार उस दूसरी माँ का चेहरा सोचिए।
- 3.जब मन उलझा हो — न्याय करूँ या दया — तो भगवान को बीच में आने दीजिए। श्रीकृष्ण ने ऐसा रास्ता निकाला, जिसमें भीम का ग़ुस्सा भी शांत हुआ और द्रौपदी की करुणा भी। प्रार्थना कीजिए — "प्रभु, ऐसा रास्ता दिखाइए, जो सबके लिए सही हो।"