घर से निकाले गए दो लोग
Two people thrown out of their homes — King Suratha and the merchant Samādhi, still worried for those who cast them out
The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
जय माता दी।
एक बुज़ुर्ग हैं। सत्तर साल के। ज़िंदगी भर मेहनत करके एक घर बनाया। बच्चों को पढ़ाया, बसाया।
और एक दिन, जायदाद के काग़ज़ों पर दस्तख़त होते ही… बेटों ने कह दिया — "पापा, अब आप गाँव वाले घर में रहिए। यहाँ जगह कम है।"
अब वो गाँव में हैं। अकेले। और हर शाम, फ़ोन उठाकर किसी पड़ोसी से पूछते हैं — "बड़े वाले की तबीयत ठीक है? छोटे का काम कैसा चल रहा है? पोता स्कूल जाता है न?"
जिन्होंने निकाला… उन्हीं की चिंता।
आप सोचेंगे, ये कैसा पागलपन है? पर सच बताइए — हम में से कितने लोग ऐसे हैं, जिनका दिल किसी ने तोड़ा, और फिर भी हम उसी के लिए दुआ करते हैं?
आज की कथा ऐसे ही दो लोगों की है। और आपको जानकर हैरानी होगी — माँ दुर्गा की पूरी सप्तशती, जो हम नवरात्रि में पढ़ते हैं… इन्हीं दो लोगों के एक सवाल का उत्तर है।
बहुत पुराने समय की बात है। सुरथ नाम के एक राजा थे। सारी पृथ्वी पर राज। और प्रजा को अपने बेटों की तरह पालते थे।
फिर कुछ शत्रु राजाओं ने हमला किया। संख्या में कम थे, फिर भी सुरथ हार गए। अपने नगर लौटे। और वहाँ… उनके अपने मंत्रियों ने, जिन्हें उन्होंने पाला था, ख़ज़ाना छीन लिया। सेना छीन ली।
राजा के पास कुछ नहीं बचा। तो शिकार का बहाना करके, अकेले घोड़े पर बैठकर, घने जंगल में चले गए।
वहाँ उन्हें एक आश्रम मिला। मेधा ऋषि का। और वो आश्रम ऐसा था कि वहाँ जंगली जानवर भी शांत होकर रहते थे।
आश्रम शांत था। पर राजा का मन? बिल्कुल नहीं।
और यहाँ सप्तशती एक बड़ी इंसानी बात बताती है। पहली मज़ेदार बात। राजा बैठे-बैठे क्या सोच रहे हैं?
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः ।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥
"पता नहीं, वो मंत्री राज्य ठीक से चला रहे होंगे या नहीं? और मेरा वो हाथी! मेरा सबसे प्यारा, बहादुर हाथी… अब दुश्मनों के यहाँ न जाने क्या खाता होगा!"
सोचिए। राज्य गया, ख़ज़ाना गया, जान बचाकर जंगल में बैठे हैं… और चिंता हाथी के खाने की! "और वो जो मेरे नौकर थे, अब दूसरों की सेवा करते होंगे। और वो फ़िज़ूलख़र्च लोग मेरा जमा किया ख़ज़ाना उड़ा देंगे!"
हँसी आती है। पर ये हम हैं। पुरानी नौकरी छूट गई, फिर भी सोचते हैं, "मेरे बिना वो प्रोजेक्ट कैसे चलेगा?" घर छूट गया, फिर भी सोचते हैं, "वो पौधों में पानी डालते होंगे या नहीं?"
और तभी आश्रम के पास राजा को एक और आदमी दिखा। उदास। सिर झुकाए।
राजा ने प्यार से पूछा — "भाई, तुम कौन हो? इतने दुखी क्यों हो?"
वो बोला — "मेरा नाम समाधि है। व्यापारी हूँ। धनी घर में पैदा हुआ।"
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
"मेरी पत्नी और बेटों ने… धन के लालच में… मुझे घर से निकाल दिया। सारा पैसा ले लिया। मुझे ख़ाली हाथ कर दिया।"
और फिर अगली ही साँस में वो कहता है —
"पता नहीं, मेरे बेटे ठीक हैं या नहीं। घर में सब कुशल है या कोई तकलीफ़? मेरे बच्चे अच्छे रास्ते पर हैं, या बिगड़ गए?"
राजा हैरान। "भाई, जिन्होंने तुम्हें निकाल दिया… उन्हीं के लिए तुम्हारा मन इतना क्यों तड़प रहा है?"
और समाधि ने जो उत्तर दिया… वो हर उस माँ-बाप का उत्तर है, जिसका दिल अपने बच्चों ने तोड़ा —
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।
"क्या करूँ? मेरा मन कठोर हो ही नहीं पाता।"
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ।
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥
"जिनमें कोई गुण नहीं, उन अपनों के लिए भी मेरा मन प्रेम में डूबा रहता है। उनके लिए मैं आहें भरता हूँ।"
अब दोनों साथ गए मेधा ऋषि के पास। और राजा ने वो प्रश्न रखा, जो इस पूरी कथा का दिल है —
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥
"महाराज, हम दोनों जानते हैं कि जो छूट गया वो हमारा नहीं। हमने उसके दोष भी देख लिए। फिर भी मन उसी की ओर खिंचता है। हम समझदार हैं… फिर भी ये मोह क्यों?"
कितना ईमानदार सवाल है। "मैं जानता हूँ, फिर भी नहीं छूटता।"
और ऋषि ने पहले एक बहुत प्यारी उपमा दी। दूसरी ख़ास बात।
"राजन्, उन पक्षियों को देखो। ख़ुद भूखे हैं… फिर भी दाना अपने बच्चों की चोंच में डाल रहे हैं।"
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ।
"ये प्रेम का बंधन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं। सारी सृष्टि इसी से चलती है।"
और फिर ऋषि ने वो बात कही, जिसके बाद पूरी सप्तशती खुलती है —
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥
"ये महामाया हैं। भगवती। वो ज्ञानियों के मन को भी, ज़बरदस्ती खींचकर, मोह में डाल देती हैं।"
और यहीं वो बात, जो मुझे सबसे सुंदर लगती है —
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
"और जब वही प्रसन्न होती हैं… तो वही मुक्ति का वर देती हैं।"
यानी जिस माँ ने बाँधा है, वही खोलेगी भी। बंधन भी उसका, चाबी भी उसकी।
राजा ने पूछा — "महाराज, ये देवी कौन हैं? कैसे प्रकट हुईं?"
और ऋषि ने पहली कथा सुनाई। प्रलय का समय। चारों ओर पानी ही पानी। भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में सोए हैं। और दो भयानक असुर, मधु और कैटभ, ब्रह्मा जी को मारने दौड़े।
ब्रह्मा जी ने किसे पुकारा? विष्णु को? नहीं — विष्णु तो सो रहे थे! उन्होंने उस निद्रा-देवी को पुकारा, जिसने विष्णु को भी सुला रखा था। "माँ, प्रभु को जगा दो।" और माँ विष्णु की आँखों से, मुख से, हृदय से निकलकर बाहर आईं… और भगवान जागे।
सोचिए। जो माया विष्णु को भी सुला दे… उसके आगे राजा और व्यापारी का मोह क्या है? और जो माँ विष्णु को जगा दे… वो हमें क्यों नहीं जगाएगी?
फिर ऋषि ने और कथाएँ सुनाईं। महिषासुर की। शुम्भ-निशुम्भ की। और यही है तीसरी बात — ये पूरी कथा, जिसे हम दुर्गा सप्तशती कहते हैं, सात सौ श्लोक… एक जंगल के आश्रम में, घर से निकाले गए दो आदमियों को सुनाई गई थी।
किसी राजमहल में नहीं। किसी मंदिर में नहीं। दो टूटे हुए दिलों के लिए।
और कथा के बीच देवताओं ने माँ की ये स्तुति गाई —
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
कथा पूरी हुई। और ऋषि ने कहा —
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥
"महाराज, उसी परमेश्वरी की शरण में जाओ। वही भोग भी देती है, स्वर्ग भी, और मुक्ति भी।"
और दोनों चले गए। एक नदी के किनारे। और वहाँ, रेत पर, अपने हाथों से… माँ की एक मिट्टी की मूर्ति बनाई।
कोई मंदिर नहीं। कोई सोने का सिंहासन नहीं। नदी की मिट्टी। फूल, धूप, और होम। पहले कम खाया, फिर बिल्कुल नहीं। तीन साल।
और तीन साल बाद… माँ चण्डिका प्रत्यक्ष प्रकट हुईं। "माँगो, जो चाहिए।"
अब ध्यान दीजिए। एक ही तप। एक ही देवी। एक ही नदी का किनारा। और दोनों ने क्या माँगा?
राजा ने माँगा — "मेरा राज्य वापस मिले। शत्रु हारें। और अगले जन्म में ऐसा राज्य मिले जो कभी न छिने।"
और समाधि ने? जिसे बीवी-बच्चों ने निकाला था? उसने माँगा —
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥
"वो ज्ञान दो माँ, जो 'मैं' और 'मेरा' की गाँठ खोल दे।"
और माँ ने दोनों को दिया। जो जिसने माँगा। राजा को थोड़े ही दिनों में राज्य मिला, और अगले जन्म में वो सावर्णि मनु बने। और समाधि को वो ज्ञान, जो मुक्ति देता है।
माँ ने किसी को छोटा नहीं समझा। न राज्य माँगने वाले को, न ज्ञान माँगने वाले को।
तो जिनका दिल अपनों ने तोड़ा है, उनके लिए तीन बातें।
पहली। अगर आपका मन उन्हीं के लिए तड़पता है, जिन्होंने चोट दी… तो अपने आप को कमज़ोर मत समझिए। ऋषि ने कहा — ये ज्ञानियों के साथ भी होता है। पक्षी भी भूखे रहकर बच्चों को खिलाते हैं।
दूसरी। पर उस तड़प को अपनी ज़िंदगी मत बनने दीजिए। सुरथ और समाधि जंगल में बैठकर रोते नहीं रहे। उठे, नदी पर गए, मिट्टी उठाई। आप भी अपना दुःख माँ के चरणों में रख दीजिए। मूर्ति मिट्टी की हो, तो भी चलेगी।
और तीसरी। माँ से माँगिए — चाहे राज्य माँगिए, चाहे शांति। पर एक बार, समाधि की तरह, ये भी माँगकर देखिए — "माँ, 'मेरा' की ये गाँठ थोड़ी ढीली कर दो।" फिर देखिए, दुःख कितना हल्का हो जाता है।
तो जब आप भी किसी दिन ऐसे ही अकेले बैठे हों… जिन्हें अपना समझा, उन्होंने पराया कर दिया हो…
तो उस जंगल के आश्रम को याद कीजिए। जहाँ घर से निकाले गए दो लोग बैठे थे।
और माँ ने पूरी सप्तशती… उन्हीं के लिए कहलवाई।
जय माता दी।
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.अगर आपका मन उन्हीं के लिए तड़पता है, जिन्होंने चोट दी… तो अपने आप को कमज़ोर मत समझिए। ऋषि ने कहा — ये ज्ञानियों के साथ भी होता है। पक्षी भी भूखे रहकर बच्चों को खिलाते हैं।
- 2.पर उस तड़प को अपनी ज़िंदगी मत बनने दीजिए। सुरथ और समाधि जंगल में बैठकर रोते नहीं रहे। उठे, नदी पर गए, मिट्टी उठाई। आप भी अपना दुःख माँ के चरणों में रख दीजिए। मूर्ति मिट्टी की हो, तो भी चलेगी।
- 3.माँ से माँगिए — चाहे राज्य माँगिए, चाहे शांति। पर एक बार, समाधि की तरह, ये भी माँगकर देखिए — "माँ, 'मेरा' की ये गाँठ थोड़ी ढीली कर दो।" फिर देखिए, दुःख कितना हल्का हो जाता है।