आग को साक्षी मानकर दोस्ती

A friendship with fire as witness — Śrī Rāma and Sugrīva circle the fire and swear friendship

The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.

त्वं वयस्योऽसि मे हृद्यो ह्येकं दुःखं सुखं च नौ ।
किष्किन्धा 5.19

जय श्री राम।

बचपन का वो दोस्त याद है? जिसके साथ टिफ़िन बाँटा था। जिसके लिए मास्टरजी से मार खाई थी। और जिसने कहा था — "यार, हम हमेशा साथ रहेंगे।"

और फिर ज़िंदगी चली। नौकरी, शहर, शादी। और एक दिन, जब आपको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, आपने फ़ोन किया… और उसने उठाया नहीं। या उठाया, और कहा, "यार, अभी थोड़ा बिज़ी हूँ।"

वो चोट गहरी होती है। दुश्मन का वार उतना नहीं लगता, जितना दोस्त की चुप्पी लगती है। और फिर मन कसम खा लेता है — "अब किसी पर भरोसा नहीं करूँगा।"

आज एक ऐसी दोस्ती की कथा, जो आग को साक्षी मानकर शुरू हुई। जिसमें एक दोस्त भूला भी। और फिर भी… दोस्ती टूटी नहीं।

श्रीराम पम्पा सरोवर के किनारे भटक रहे हैं। सीता का हरण हो चुका है। लक्ष्मण साथ हैं। और दोनों भाई टूटे हुए हैं।

और उसी जंगल में, ऋष्यमूक पर्वत पर, एक और टूटा हुआ आदमी छिपा बैठा है। सुग्रीव। वानरों का राजकुमार। जिसके बड़े भाई वाली ने उसे राज्य से निकाल दिया था, और उसकी पत्नी भी छीन ली थी।

सुग्रीव डरा हुआ था। दो धनुषधारी वीरों को आते देखा, तो सोचा — "कहीं वाली ने तो नहीं भेजे?" और उसने पता लगाने भेजा अपने सबसे समझदार मन्त्री को। हनुमान को।

हनुमान भिक्षु का वेश बनाकर गए। बात की। और लौटकर सुग्रीव से कहा —

"ये दशरथ के पुत्र राम हैं। धर्म के लिए जाने जाते हैं। रावण ने इनकी पत्नी हर ली है। और ये तुमसे मित्रता चाहते हैं।"

अब ज़रा इस मिलन को देखिए। एक तरफ़ अयोध्या का राजकुमार। दूसरी तरफ़ जंगल में छिपा एक वानर, जिसके पास न राज्य है, न घर। और सुग्रीव ने कहा —

रोचते यदि वा सख्यं बाहुरेष प्रसारितः । गृह्यतां पाणिना पाणिर्मर्यादा बध्यतां ध्रुवा ॥
5.12

"अगर आपको ये दोस्ती सचमुच अच्छी लगे… तो लीजिए, मैंने अपनी बाँह फैला दी है। मेरा हाथ थाम लीजिए। एक पक्का बंधन बाँध लीजिए।"

सोचिए उस पल को। फैली हुई बाँह। और मन में डर — "कहीं ठुकरा न दें।"

और श्रीराम ने? बहुत ख़ुश होकर उसका हाथ अपने हाथ में कसकर दबाया। और फिर गले लगा लिया। कसकर।

ततो हनूमान्संत्यज्य भिक्षुरूपमरिंदमः । काष्ठयोः स्वेन रूपेण जनयामास पावकम् ॥
5.15

और तब हनुमान ने भिक्षु का वेश उतारा, अपने असली रूप में आए। और दो लकड़ियों को रगड़कर आग जलाई।

फूलों से उस आग की पूजा की। और बड़े ध्यान से उसे दोनों के बीच रख दिया।

ततोऽग्निं दीप्यमानं तौ चक्रतुश्च प्रदक्षिणम् । सुग्रीवो राघवश्चैव वयस्यत्वमुपागतौ ॥
5.17

और श्रीराम और सुग्रीव ने उस जलती आग की परिक्रमा की। और दोनों दोस्त बन गए।

अब ध्यान दीजिए। अग्नि की परिक्रमा कब होती है? विवाह में। सात फेरे। यानी ये दोस्ती उतनी ही पवित्र मानी गई, जितना विवाह। आग को साक्षी बनाया गया।

और फिर दोनों एक-दूसरे को देखते रहे… और वाल्मीकि कहते हैं — देखते-देखते मन नहीं भरा।

त्वं वयस्योऽसि मे हृद्यो ह्येकं दुःखं सुखं च नौ ।
5.19

और सुग्रीव ने ख़ुशी से कहा — "तुम मेरे दिल के दोस्त हो। आज से हम दोनों का दुख एक, और सुख एक।"

एक दुख। एक सुख। दोस्ती की इससे छोटी और इससे पूरी परिभाषा नहीं हो सकती।

फिर सुग्रीव ने साल के पेड़ की फूलों भरी डाल काटी, बिछाई, और श्रीराम के साथ उस पर बैठ गए। और हनुमान ने लक्ष्मण के लिए चंदन की फूलों वाली डाल बिछाई। जंगल का सिंहासन!

और अब एक बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं।

सुग्रीवरामप्रणयप्रसङ्गे वामानि नेत्राणि समं स्फुरन्ति ॥
5.33

वाल्मीकि कहते हैं — जिस पल ये दोस्ती हुई, उसी पल तीन लोगों की बाईं आँख एक साथ फड़कने लगी। दूर अशोक वन में सीता की। वानरों के राजा की। और लंका के उस निशाचर की।

एक दोस्ती हुई जंगल में… और उसकी हलचल लंका तक पहुँच गई।

फिर सुग्रीव गुफा में गया, और एक पोटली ले आया। "जब एक राक्षस एक स्त्री को आकाश में ले जा रहा था, तो उसने हमें देखकर ये ओढ़नी और गहने नीचे गिराए थे। पहचानिए।"

श्रीराम ने वो गहने उठाए… और आँसुओं से ढक गए। जैसे कोहरे में ढका चाँद। "हा प्रिये!" कहकर धरती पर गिर पड़े।

और फिर लक्ष्मण की वो बात, जो रामायण की सबसे कोमल पंक्तियों में है —

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥
6.21

"भैया, मैं ये बाजूबंद नहीं पहचानता। ये कुंडल नहीं पहचानता। पर ये पायल पहचानता हूँ… क्योंकि रोज़ भाभी के पैर छूता था।"

चौदह साल साथ रहे, और आँख कभी चेहरे तक नहीं उठी। बस चरणों तक।

और अब देखिए दोस्ती कैसे काम करती है। श्रीराम रो रहे हैं। और जो सुग्रीव ख़ुद डरा हुआ, उजड़ा हुआ था… वो आँसू पोंछने आगे आया।

"राम, मेरी भी पत्नी छिनी है। पर मैं ऐसे शोक नहीं करता। आप तो महात्मा हैं। धीरज रखिए। सीता को मैं ढूँढूँगा। पाताल में हो या आकाश में।"

हितं वयस्यभावेन ब्रूमि नोपदिशामि ते ।
7.14

और फिर बड़ी प्यारी बात — "मैं दोस्त के नाते कह रहा हूँ। उपदेश नहीं दे रहा।"

कितना समझदार दोस्त! जानता था कि दुखी आदमी को लेक्चर अच्छा नहीं लगता।

दुर्लभो हीदृशो बन्धुरस्मिन्काले विशेषतः ॥
7.18

और श्रीराम ने मुँह पोंछा, सुग्रीव को गले लगाया, और कहा — "सखा, तुमने मुझे सँभाल लिया। ऐसा बंधु दुर्लभ है। ख़ासकर ऐसे समय में।"

अनृतं नोक्तपूर्वं मे नच वक्ष्ये कदाचन ।
7.22

और फिर अपना वचन दिया — "मैंने कभी झूठ नहीं कहा, न कभी कहूँगा। जो कहा है, वो करूँगा।"

और श्रीराम ने वचन निभाया। वाली का अंत हुआ। सुग्रीव राजा बना। राज्य मिला, पत्नी मिली।

और फिर… वही हुआ जो हम सबके साथ होता है।

बरसात आई। सुग्रीव महलों के सुख में खो गया। बरसात बीत गई, शरद आ गई। और वो भूल गया कि जंगल की एक गुफा में उसका दोस्त, अपनी पत्नी के लिए, एक-एक दिन गिन रहा है।

लक्ष्मण क्रोध में किष्किन्धा पहुँचे। और तब सुग्रीव को होश आया। उसने गले की माला तोड़कर फेंक दी। और हाथ जोड़कर बोला —

यदि किंचिदतिक्रान्तं विश्वासात्प्रणयेन वा । प्रेष्यस्य क्षमितव्यं मे न कश्चिन्नापराध्यति ॥
36.11

"अगर भरोसे में, या प्रेम में, मुझसे कोई भूल हो गई हो… तो क्षमा कीजिए। ऐसा कोई नहीं, जिससे कभी भूल न हो।"

और सुंदर बात ये — लक्ष्मण ने भी कहा, "मैंने भी आपको कठोर बातें कहीं, उन्हें भी क्षमा कीजिए।"

और जब सुग्रीव श्रीराम के पास पहुँचा, तो उनके चरणों में गिर पड़ा। और श्रीराम ने? उठाया। और प्रेम से, आदर से… गले लगा लिया। "आइए, बैठिए।"

कोई ताना नहीं। कोई "तुम भूल गए थे" नहीं। बस वही गले लगाना, जो आग के सामने हुआ था।

और सुग्रीव ने भूल का प्रायश्चित ऐसे किया — धरती के कोने-कोने से लाखों-करोड़ों वानर बुला लिए! और कहा — "जो किए उपकार का बदला न चुकाए, वो मनुष्यों का कलंक है।"

अब इस दोस्ती में भगवान कहाँ हैं?

श्रीराम स्वयं भगवान हैं। और भगवान ने एक जंगल में छिपे, डरे हुए वानर का हाथ थामा। आग के सामने फेरे लिए। और जब वो भूला, तो उसे छोड़ा नहीं।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
गीता 5.29

गीता में भगवान कहते हैं — "मैं सब प्राणियों का सुहृद हूँ। बिना स्वार्थ का दोस्त। जो ये जान लेता है, उसे शांति मिल जाती है।"

दुनिया के दोस्त भूल सकते हैं। फ़ोन न उठाएँ, ये हो सकता है। पर एक दोस्त ऐसा है, जिसने आपकी फैली हुई बाँह कभी नहीं ठुकराई।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। दोस्ती का मतलब है — "एक दुख, एक सुख।" जिस दिन दोस्त रोए, उस दिन लेक्चर नहीं, साथ दीजिए। सुग्रीव की तरह कहिए — "उपदेश नहीं दे रहा, दोस्त के नाते कह रहा हूँ।"

दूसरी। अगर आप भूल गए हैं — किसी दोस्त का फ़ोन, किसी का एहसान, कोई वादा — तो आज ही माला तोड़िए। सुख की नींद से उठिए, और जाकर कहिए, "माफ़ करना, भूल हो गई।" देर हुई है, पर दरवाज़ा बंद नहीं हुआ।

और तीसरी। अगर किसी दोस्त ने आपको भुला दिया है, तो मन में ज़हर मत पालिए। "न कश्चिन्नापराध्यति" — ऐसा कोई नहीं, जिससे भूल न हो। जब वो लौटे, तो श्रीराम की तरह उठाइए, और गले लगाइए। बिना ताने के।

तो अगली बार, जब किसी दोस्त की चुप्पी चुभे… जब लगे, अब किसी पर भरोसा नहीं…

तो जंगल की उस आग को याद कीजिए। दो लकड़ियों से जली हुई। फूलों से पूजी हुई। और उसके चारों ओर घूमते दो दोस्त।

आग को साक्षी मानकर दोस्ती। "आज से हमारा एक दुख, एक सुख।"

जय श्री राम।

ततोऽग्निं दीप्यमानं तौ चक्रतुश्च प्रदक्षिणम् । सुग्रीवो राघवश्चैव वयस्यत्वमुपागतौ ॥
किष्किन्धा 5.17

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.दोस्ती का मतलब है — "एक दुख, एक सुख।" जिस दिन दोस्त रोए, उस दिन लेक्चर नहीं, साथ दीजिए। सुग्रीव की तरह कहिए — "उपदेश नहीं दे रहा, दोस्त के नाते कह रहा हूँ।"
  2. 2.अगर आप भूल गए हैं — किसी दोस्त का फ़ोन, किसी का एहसान, कोई वादा — तो आज ही माला तोड़िए। सुख की नींद से उठिए, और जाकर कहिए, "माफ़ करना, भूल हो गई।" देर हुई है, पर दरवाज़ा बंद नहीं हुआ।
  3. 3.अगर किसी दोस्त ने आपको भुला दिया है, तो मन में ज़हर मत पालिए। "न कश्चिन्नापराध्यति" — ऐसा कोई नहीं, जिससे भूल न हो। जब वो लौटे, तो श्रीराम की तरह उठाइए, और गले लगाइए। बिना ताने के।

इस सत्संग के श्लोक

किष्किन्धा 5.19 5.12 5.15 5.17 5.19 5.33 6.21 7.14 7.18 7.22 36.11 गीता 5.29 किष्किन्धा 5.17