जब कोई साथ न दे

When no one stands by you — Prahlāda, a five-year-old with his own father against him

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कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
गीता 9.31

जय श्री कृष्ण।

क्या कभी ऐसा हुआ है… कि आप सही थे, बिल्कुल सही… और फिर भी पूरा कमरा आपके ख़िलाफ़ खड़ा था?

ऑफ़िस की मीटिंग में आपने सच बोला, और सबने नज़रें फेर लीं। घर में आपने कोई बात रखी, और अपने ही भाई-बहन चुप रहे। या किसी रात आप अस्पताल के गलियारे में अकेले बैठे थे, और फ़ोन की लिस्ट में सैकड़ों नाम थे… पर एक भी ऐसा नहीं, जिसे रात के दो बजे फ़ोन कर सकें।

उस अकेलेपन को आप जानते हैं। मैं भी जानता हूँ।

आज एक ऐसे बच्चे की कहानी सुनाता हूँ, जो इससे भी ज़्यादा अकेला था। जिसके ख़िलाफ़ कोई ऑफ़िस नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं… उसका अपना पिता खड़ा था।

उस बच्चे का नाम था प्रह्लाद। और पिता थे हिरण्यकशिपु — वो राजा जिसके ग़ुस्से से तीनों लोक काँपते थे। देवता भी।

अब पहली दिलचस्प बात। प्रह्लाद को भगवान की भक्ति किसने सिखाई? किसी गुरु ने? किसी मंदिर ने?

नहीं। भागवत बताता है — जब प्रह्लाद माँ के गर्भ में थे, तब देवर्षि नारद ने उनकी माँ को अपने आश्रम में शरण दी थी। और वहाँ नारद जो उपदेश देते थे… वो गर्भ में बैठा बच्चा सुन रहा था।

माँ भूल गईं। बच्चा नहीं भूला।

इसलिए जो माताएँ आज सुन रही हैं — आप जो सुनती हैं, जो गाती हैं, जो सोचती हैं… वो कोई और भी सुन रहा है।

प्रह्लाद बड़े हुए, तो बाक़ी बच्चों जैसे नहीं थे। भागवत कहता है, उन्होंने बचपन में ही खिलौने छोड़ दिए। मन भगवान में ऐसा लगा रहता था कि लोग उन्हें बुद्धू समझते थे।

और पिता ने भेजा पढ़ने। गुरुओं को सख़्त हिदायत दी — "इस पर पहरा रखो! कोई विष्णु का भक्त वेश बदलकर आए और इसका दिमाग़ न बिगाड़ दे!"

सोचिए, एक बादशाह, जिसने तीनों लोक जीत लिए… वो डर रहा है कि उसके बेटे को कोई भगवान का नाम न सिखा दे!

एक दिन पिता ने बड़े प्यार से बेटे को गोद में बिठाया और पूछा — "बेटा, गुरुजी ने क्या सबसे अच्छी चीज़ सिखाई?"

और पाँच साल के प्रह्लाद ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया —

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
भागवत 7.5.23

"पिताजी! भगवान विष्णु की कथा सुनना, उनका कीर्तन, उन्हें याद करना…" पूरी नौ बातें गिना दीं!

और फिर… पिता ने बेटे को गोद से उठाकर ज़मीन पर पटक दिया।

सैनिकों से कहा — "इसे ले जाओ। मार डालो।"

और भागवत, एक-एक करके, गिनाता है कि क्या-क्या किया गया उस बच्चे के साथ।

त्रिशूलों से वार किए गए। बड़े-बड़े हाथियों से कुचलवाया गया। ज़हरीले साँपों से डँसवाया गया। ऊँचे पहाड़ से नीचे फेंका गया। कोठरी में बंद करके भूखा रखा गया। ज़हर दिया गया। बर्फ़ में, आँधी में, आग में, पानी में डाला गया। पहाड़ों के नीचे दबाया गया।

और भागवत कहता है — प्रह्लाद चुपचाप बैठे रहे। उनका मन भगवान में लगा था। सारे वार ऐसे बेकार हो गए… जैसे किसी अभागे आदमी की सारी मेहनत।

सोचिए उस पाँच साल के बच्चे को। माँ कुछ नहीं कर सकती। गुरु कुछ नहीं कर सकते। सारा राज्य पिता के साथ। दुनिया में एक इंसान भी उसके साथ नहीं खड़ा था।

पर वो अकेला नहीं था।

आख़िर में, थका-हारा, ग़ुस्से में काँपता पिता बेटे के सामने खड़ा हुआ। और उसने वो प्रश्न पूछा जो हर अत्याचारी पूछता है —

तस्य मेऽभीतवन्मूढ शासनं किम्बलोऽत्यगाः ॥
7.8.7

"मूर्ख! मेरे ग़ुस्से से तीनों लोक काँपते हैं। तू किसके बल पर मेरे सामने इतना निडर खड़ा है?"

और वो बच्चा हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर, बड़ी विनम्रता से बोला —

न केवलं मे भवतश्च राजन् स वै बलं बलिनां चापरेषाम् ।
7.8.8

"पिताजी… वो केवल मेरे बल नहीं हैं। वो आपके भी बल हैं। दुनिया के हर बलवान का बल वही हैं।"

सुना आपने? जिस पिता ने उसे मारने की हर कोशिश की… उससे भी बच्चा कह रहा है — आपकी ताक़त भी उन्हीं की दी हुई है। नफ़रत का एक शब्द नहीं।

अब हिरण्यकशिपु का धैर्य टूट गया।

क्वासौ यदि स सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते ॥
7.8.13

"कहाँ है तेरा भगवान? अगर वो सब जगह है… तो इस खम्भे में क्यों नहीं दिखता?"

तलवार उठाई। सिंहासन से कूदा। "देखता हूँ आज तेरा हरि तुझे कैसे बचाता है!" और पूरी ताक़त से उस खम्भे पर घूँसा मारा —

भागवत कहता है, उस खम्भे में से ऐसी भयानक गर्जना उठी, मानो ब्रह्माण्ड का ढक्कन फट गया हो। ब्रह्मा जैसे देवताओं को लगा, प्रलय आ गया।

सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः ।
7.8.18

और अब इस श्लोक का पहला शब्द ध्यान से सुनिए। भगवान खम्भे से क्यों निकले? "सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितम्" — अपने सेवक की कही हुई बात सच करने के लिए।

एक पाँच साल के बच्चे ने कहा था, "वो सब जगह हैं।" और भगवान ने उस बच्चे की बात झूठी नहीं होने दी।

यही भरोसा है। जब आप उनका नाम लेकर कोई बात कहते हैं… तो वो आपकी बात की लाज रखते हैं।

अब एक ऐसी बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं।

नृसिंह भगवान का क्रोध शांत ही नहीं हो रहा था। ब्रह्मा, शिव, सारे देवता — कोई पास जाने की हिम्मत नहीं कर पाया। फिर देवताओं ने स्वयं लक्ष्मी जी को भेजा। और भागवत कहता है, वो रूप देखकर लक्ष्मी जी भी डर गईं। पास नहीं गईं।

तब ब्रह्मा ने किसे भेजा? उसी पाँच साल के बच्चे को। "बेटा, जाओ, प्रभु को शांत करो।"

और प्रह्लाद धीरे-धीरे गए। हाथ जोड़े। ज़मीन पर लेटकर प्रणाम किया।

और जिस रूप से देवता काँप रहे थे… उस नृसिंह ने करुणा से भरकर बच्चे को उठाया, और उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। वो हाथ, जो मृत्यु से डरे हर प्राणी को अभय देता है।

सोचिए। सारी दुनिया जिससे डर रही थी… उसके लिए वो बच्चा डरने वाली चीज़ था ही नहीं। क्योंकि बच्चा अपने पिता से नहीं डरता।

और फिर भगवान ने कहा — "माँगो, क्या चाहिए?"

अब आप-हम होते तो लिस्ट लंबी होती! पर प्रह्लाद ने जो कहा, वो सुनिए।

यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक् ॥
7.10.4

"प्रभु, जो आपसे बदले में कुछ माँगे… वो सेवक नहीं, व्यापारी है।"

और फिर, बहुत ज़ोर देने पर, प्रह्लाद ने एक वर माँगा। जानते हैं क्या?

"मेरे पिता ने आपकी निंदा की। मुझे सताया। प्रभु… मेरे पिता को क्षमा कर दीजिए। उन्हें पवित्र कर दीजिए।"

जिस पिता ने उसे पहाड़ से फेंका, ज़हर दिया, आग में डाला… उसके लिए पहला और आख़िरी वर।

और भगवान ने कहा —

त्रिःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ ।
7.10.18

"तुम्हारे पिता ही नहीं, इक्कीस पीढ़ियाँ पवित्र हो गईं। क्योंकि उस घर में तुम जन्मे हो।"

एक बच्चे की भक्ति ने… पूरे कुल को तार दिया।

और एक आख़िरी बात प्रह्लाद की, जो मुझे सबसे सुंदर लगती है। उन्होंने भगवान से कहा —

नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एको ।
7.9.44

"प्रभु, बड़े-बड़े मुनि एकांत में बैठकर केवल अपनी मुक्ति चाहते हैं। पर मैं इन दुखी लोगों को छोड़कर… अकेला मुक्त होना नहीं चाहता।"

जिसे सारी दुनिया ने अकेला छोड़ दिया था… वो किसी को अकेला छोड़ना नहीं चाहता था।

तो जब कोई साथ न दे, तब तीन बातें याद रखिए।

पहली। आप अकेले नहीं हैं। "स वै बलं बलिनाम्" — दुनिया के हर बलवान की ताक़त वही है। जो आपके ख़िलाफ़ खड़े हैं, उनकी साँस भी वही चला रहा है। डरिए मत।

दूसरी। कड़वे मत होइए। प्रह्लाद ने पिता के लिए भी क्षमा माँगी। जिन्होंने आपका साथ नहीं दिया, उनके लिए भी एक प्रार्थना कर दीजिए। आपका बोझ आधा हो जाएगा।

और तीसरी। जिस दिन आप अकेले थे, वो दिन याद रखिए। और जब कोई और अकेला दिखे — अस्पताल में, दफ़्तर में, गली के कोने में — उसके पास जाकर खड़े हो जाइए। क्योंकि कई बार… भगवान खम्भे से नहीं, किसी इंसान के रूप में आते हैं।

तो अगली बार, जब पूरा कमरा आपके ख़िलाफ़ हो… जब फ़ोन की लिस्ट में एक नाम न मिले…

तो उस पाँच साल के बच्चे को याद कीजिए, जो पहाड़ से गिरा, आग में बैठा… और मुस्कुराता रहा।

और याद रखिए — वो खम्भे में भी है। वो आपके कमरे में भी है।

भगवान ने गीता में वचन दिया है। "मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।"

जय श्री कृष्ण।

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
गीता 9.31

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.आप अकेले नहीं हैं। "स वै बलं बलिनाम्" — दुनिया के हर बलवान की ताक़त वही है। जो आपके ख़िलाफ़ खड़े हैं, उनकी साँस भी वही चला रहा है। डरिए मत।
  2. 2.कड़वे मत होइए। प्रह्लाद ने पिता के लिए भी क्षमा माँगी। जिन्होंने आपका साथ नहीं दिया, उनके लिए भी एक प्रार्थना कर दीजिए। आपका बोझ आधा हो जाएगा।
  3. 3.जिस दिन आप अकेले थे, वो दिन याद रखिए। और जब कोई और अकेला दिखे — अस्पताल में, दफ़्तर में, गली के कोने में — उसके पास जाकर खड़े हो जाइए। क्योंकि कई बार… भगवान खम्भे से नहीं, किसी इंसान के रूप में आते हैं।

इस सत्संग के श्लोक

गीता 9.31 भागवत 7.5.23 7.8.7 7.8.8 7.8.13 7.8.18 7.10.4 7.10.18 7.9.44