सकृदेव प्रपन्नाय
Whoever comes even once — Vibhīṣaṇa from the enemy camp, and Śrī Rāma’s vow of refuge
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥
जय श्री राम।
एक लड़का है। कुछ साल पहले ग़लत संगत में पड़ गया था। नशा, झगड़े, थाने के चक्कर। अब सब छोड़ चुका है। सच में बदल गया है।
पर जब वो नौकरी माँगने जाता है, तो लोग उसकी फ़ाइल देखते हैं। मोहल्ले में निकलता है, तो लोग फुसफुसाते हैं — "अरे, ये वही है न?" रिश्तेदार कहते हैं, "भरोसा मत करना। ऐसे लोग नहीं बदलते।"
या एक नई बहू, जो दूसरे घर से आई है। हर बात पर सुनती है — "तुम्हारे मायके में ऐसा होता होगा।" बरस बीत जाते हैं, पर वो "बाहर वाली" ही रहती है।
मन में एक ही सवाल — "मुझे कौन अपनाएगा? मेरा अतीत, मेरा घराना, मेरी पहचान… सब मेरे ख़िलाफ़ है।"
आज की कथा उस आदमी की, जो दुश्मन के घर से आया था। और भगवान ने उसे गले लगाया।
लंका। रावण की सभा। सीता जी अशोक वाटिका में बंदी हैं। और समुद्र के उस पार श्रीराम की वानर सेना आ पहुँची है।
सभा में एक ही आदमी था जो सच बोल रहा था। रावण का छोटा भाई — विभीषण। "भैया, सीता जी को लौटा दीजिए। ये विनाश का रास्ता है।"
रावण भड़क उठा। भरी सभा में बोला — "सगे-संबंधी सबसे बड़े दुश्मन होते हैं! साँप के साथ रह लो, पर ऐसे भाई के साथ नहीं, जो दुश्मन का पक्ष ले। तेरी जगह कोई और होता, तो इसी पल मार डालता। धिक्कार है तुझ पर, कुल के कलंक!"
विभीषण उठे। चार साथियों के साथ आकाश में उठ गए। और जाते-जाते एक बात कही, जो हर दफ़्तर, हर घर में लिखी होनी चाहिए —
सुलभाः पुरुषा राजन्सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥
"राजन्, मीठी बातें कहने वाले तो बहुत मिल जाते हैं। पर कड़वी, फिर भी भले की बात कहने वाला दुर्लभ है… और उसे सुनने वाला उससे भी दुर्लभ।"
और जाते-जाते विभीषण ने क्या कहा? गाली? शाप? नहीं। बोले — "भैया, आप बड़े हैं। मैंने आपके भले के लिए कहा था। जो कहा, उसके लिए क्षमा करना। अपनी और लंका की रक्षा करना। आपका कल्याण हो।"
जिसे अपमान करके निकाला गया… वो भी आशीर्वाद देकर निकला।
और विभीषण उड़कर समुद्र के इस पार आए। वानर सेना के ऊपर, आकाश में रुक गए। और ज़ोर से पुकारा —
"मैं रावण का छोटा भाई हूँ। विभीषण। मैंने उसे बहुत समझाया कि सीता जी को लौटा दे। उसने मेरा दास की तरह अपमान किया।"
त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ॥
"मैं अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर… राघव की शरण में आया हूँ।"
सोचिए। सब कुछ पीछे छोड़कर आया है। घर, परिवार, राज्य। और अब इस पार भी कोई उसे नहीं जानता।
नीचे वानर सेना में हलचल मच गई! किसी ने पेड़ उठाया, किसी ने चट्टान। "राक्षस! पाँच राक्षस! मारने आए हैं!"
और सुग्रीव, जो श्रीराम के सबसे बड़े मित्र थे, ग़ुस्से में आए — "प्रभु, इस पर भरोसा मत कीजिए! ये रावण का भाई है। जासूस है। भरोसा जमने पर पीठ में छुरा घोंपेगा। इसे इसके साथियों समेत मार डालिए!"
अब यहाँ श्रीराम ने एक बड़ी सुंदर बात की। उन्होंने फ़ैसला नहीं सुनाया। सबसे पूछा — "आप सबकी क्या राय है?"
और एक-एक करके सब बोले। अंगद — "शत्रु के घर से आया है, शक करो।" शरभ — "पहले जासूस लगाओ।" जाम्बवान — "ग़लत जगह, ग़लत समय पर आया है।" मैन्द — "मीठे से पूछताछ करो।"
यानी पूरी सभा एक ओर। ठीक वैसे ही, जैसे उस लड़के का पूरा मोहल्ला।
और फिर हनुमान बोले। विनम्रता से।
"प्रभु, मैं बहस के लिए नहीं बोल रहा। जो सच लगता है, वो कहता हूँ। विभीषण ने रावण में दुष्टता देखी, आप में पराक्रम देखा। यही सही समय है, सही जगह है।"
और फिर एक ऐसी बात कही, जो आज के इंटरव्यू लेने वाले भी काम में ले सकते हैं —
आकारश्छाद्यमानोऽपि न शक्यो विनिगूहितुम् ।
बलाद्धि विवृणोत्येव भावमन्तर्गतं नृणाम् ॥
"चेहरे का भाव छिपाने से नहीं छिपता। मन के अंदर जो है, वो ज़बरदस्ती बाहर आ ही जाता है। इसके बोलने में कोई खोट नहीं दिखती। चेहरा साफ़ है। मुझे कोई संदेह नहीं।"
पूरी सभा में एक आवाज़। और वो आवाज़ हनुमान की थी।
अब सबकी नज़रें श्रीराम पर। और श्रीराम ने पहली ही बात ऐसी कही, कि सब चुप हो गए —
मित्रभावेन संप्राप्तं न त्यजेयं कथंचन ।
दोषो यद्यपि तस्य स्यात्सतामेतदगर्हितम् ॥
"जो मित्र बनकर आया है, उसे मैं किसी हाल में नहीं छोड़ूँगा। भले ही उसमें कोई दोष हो।"
"भले ही दोष हो!" सुना आपने? भगवान ये नहीं कह रहे कि "पहले साबित करो कि तुम अच्छे हो।"
सुग्रीव फिर भी नहीं माने। बोले — "प्रभु, जो अपने संकट में पड़े भाई को छोड़ आया, वो किसे नहीं छोड़ेगा?"
श्रीराम हल्का-सा मुस्कुराए। लक्ष्मण की ओर देखा। और बोले —
न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः ।
"प्यारे मित्र, सब भाई भरत जैसे नहीं होते।"
एक वाक्य में सब कह दिया। हर घर एक जैसा नहीं होता। जो अपना घर छोड़कर आया है, ज़रूरी नहीं कि वो बुरा हो। हो सकता है, घर ही ऐसा था।
और फिर श्रीराम ने एक कहानी सुनाई। एक कबूतर की।
श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।
अर्चितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥
"सुना है, एक कबूतर के पास उसका शत्रु शरण माँगने आया। वो शिकारी, जो उसकी पत्नी को पकड़कर ले गया था। और कबूतर ने उसका सत्कार किया… और अपना ही मांस उसे भोजन में दे दिया।"
"जब एक कबूतर ऐसा कर सकता है… तो मेरे जैसा क्या करे?"
और फिर ऋषि कण्डु की एक पुरानी गाथा सुनाई —
आर्तो वा यदि वा दृप्तः परेषां शरणागतः ।
अरिः प्राणान्परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना ॥
"शत्रु दुखी होकर आए, या घमंड में ही क्यों न हो… अगर शरण माँगे, तो अपने प्राण देकर भी उसकी रक्षा करो।"
और श्रीराम ने कहा — शरण में आए को न बचाना बहुत बड़ा दोष है। वो अपयश देता है, और बल-पराक्रम का नाश करता है।
और फिर वो वचन आया। जो रामायण का सबसे बड़ा वचन कहा जाता है।
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥
"सकृदेव" — बस एक बार। "जो एक बार भी मेरी शरण आकर कह दे, 'मैं तुम्हारा हूँ'… उसे मैं सारे प्राणियों से अभय देता हूँ। ये मेरा व्रत है।"
अब ध्यान दीजिए, क्या नहीं कहा। "जो सौ बार आए" नहीं कहा। "जो पवित्र हो" नहीं कहा। "जो सही घराने का हो" नहीं कहा। बस — एक बार। और "मैं तुम्हारा हूँ।"
और अब सबसे चौंकाने वाली बात। अगला श्लोक —
आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया ।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम् ॥
"सुग्रीव, इसे ले आओ। मैंने इसे अभय दे दिया है। चाहे ये विभीषण हो… या स्वयं रावण!"
सोचिए। जिसने उनकी पत्नी का हरण किया, जिसके लिए ये पूरा युद्ध है… श्रीराम कह रहे हैं, अगर वो भी आज हाथ जोड़कर आ जाए, "मैं तुम्हारा हूँ"… तो उसके लिए भी दरवाज़ा खुला है।
तो फिर आप-हम? हमारा अतीत इससे बड़ा तो नहीं।
और फिर क्या हुआ? विभीषण धरती पर उतरे और श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। "प्रभु, लंका छोड़ी, मित्र छोड़े, धन छोड़ा। अब मेरा राज्य, मेरा जीवन, मेरा सुख… सब आप पर है।"
और दूसरी चौंकाने वाली बात — श्रीराम ने उसे गले लगाया और लक्ष्मण से कहा, "समुद्र से जल लाओ।" और युद्ध शुरू होने से पहले ही… उसी समुद्र के किनारे… विभीषण का लंका के राजा के रूप में अभिषेक कर दिया!
अभी लंका जीती नहीं गई। रावण ज़िंदा है। पर भगवान का वचन पहले ही मुहर लगा चुका था।
तो जो आज सोच रहे हैं, "मुझे कौन अपनाएगा," उनके लिए तीन बातें।
पहली। भगवान आपकी फ़ाइल नहीं देखते। "दोषो यद्यपि" — दोष हो, तो भी। बस एक बार, सच्चे मन से कहिए — "मैं तुम्हारा हूँ।"
दूसरी। हनुमान बनिए। जब पूरा मोहल्ला किसी के ख़िलाफ़ हो, किसी नए आदमी को, किसी बदल चुके इंसान को… तो उसका चेहरा देखिए, उसकी बात सुनिए। एक आवाज़ उसके पक्ष में उठाइए।
और तीसरी। विभीषण की तरह, कड़वा सच कहने की हिम्मत रखिए। और जब कोई आपको कड़वा सच कहे… तो रावण मत बनिए। सुन लीजिए।
तो अगर आज आपको लगता है कि आप ग़लत घर से हैं… ग़लत अतीत से… ग़लत पहचान से…
तो समुद्र के उस किनारे को याद कीजिए। जहाँ पूरी सेना ने कहा "मारो," और एक ने कहा "अभय।"
वो किनारा आज भी है। वो वचन आज भी है। दरवाज़ा कभी बंद नहीं हुआ।
सकृदेव… बस एक बार।
जय श्री राम।
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.भगवान आपकी फ़ाइल नहीं देखते। "दोषो यद्यपि" — दोष हो, तो भी। बस एक बार, सच्चे मन से कहिए — "मैं तुम्हारा हूँ।"
- 2.हनुमान बनिए। जब पूरा मोहल्ला किसी के ख़िलाफ़ हो, किसी नए आदमी को, किसी बदल चुके इंसान को… तो उसका चेहरा देखिए, उसकी बात सुनिए। एक आवाज़ उसके पक्ष में उठाइए।
- 3.विभीषण की तरह, कड़वा सच कहने की हिम्मत रखिए। और जब कोई आपको कड़वा सच कहे… तो रावण मत बनिए। सुन लीजिए।