भरी सभा में अकेली
Alone in a full court — Draupadī, humiliated before the elders, calls on Govinda
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागताम् ॥
जय श्री कृष्ण।
आज की बात थोड़ी भारी है। पर ज़रूरी है।
क्या कभी ऐसा हुआ है कि सबके सामने आपका अपमान हुआ हो? ऑफ़िस की मीटिंग में बॉस ने सबके बीच आपको नीचा दिखाया। किसी शादी में रिश्तेदार ने ताना मारा, और सब हँस पड़े। या आपके बारे में फ़ोन पर कोई झूठी बात फैल गई, और सौ लोगों ने पढ़ी।
और उस पल में सबसे ज़्यादा दर्द किस बात का होता है? अपमान का नहीं। इस बात का कि वहाँ बैठे अपने… चुप रहे।
आज एक ऐसी स्त्री की कथा, जिसके साथ ये सबसे बड़े रूप में हुआ। भरी सभा में। अपने पाँच पतियों के सामने। बड़े-बूढ़ों के सामने।
उसका नाम था द्रौपदी।
हस्तिनापुर की सभा। जुआ चल रहा है। शकुनि पासे फेंक रहा है, और युधिष्ठिर हारते जा रहे हैं।
धन गया। रथ गए। राज्य गया। फिर भाई — एक-एक करके चारों भाई दाँव पर। फिर अपने आप को भी हार गए। और फिर… जब कुछ नहीं बचा… तो द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया।
और वो भी हार गए।
दुर्योधन ने एक सेवक भेजा — "जाओ, द्रौपदी को ले आओ। अब वो दासी है।"
अब यहाँ पहली बात देखिए, जो बहुत कम लोग याद रखते हैं। द्रौपदी रोई नहीं। गिड़गिड़ाई नहीं। उसने सेवक को एक सवाल देकर लौटा दिया —
"जाओ, सभा में उस जुआरी से पूछो — तुम पहले किसे हारे? अपने आप को, या मुझे?"
किं तु पूर्वं पराजैषीरात्मानमथवा नु माम् ॥
सोचिए इस सवाल को। जो आदमी पहले ख़ुद को हार चुका, वो दूसरे को दाँव पर कैसे लगा सकता है? ये क़ानून का सवाल था। धर्म का सवाल था। और भरी सभा में किसी के पास इसका जवाब नहीं था।
युधिष्ठिर ऐसे बैठे रहे, मानो प्राण निकल गए हों। एक शब्द नहीं बोले।
तब दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन को भेजा।
दुःशासन महल में घुसा। द्रौपदी डरकर भागी, रानियों की ओर। और वो दौड़कर पीछे गया… और उसके लंबे, काले बालों को पकड़ लिया।
और महाभारत एक ऐसी बात कहता है जो कलेजा चीर देती है। ये वही बाल थे, जो राजसूय यज्ञ के अंत में मंत्रों से पवित्र जल से सींचे गए थे। जिस दिन द्रौपदी सम्राज्ञी थी। और आज उन्हीं बालों से उसे घसीटा जा रहा था।
महाभारत कहता है — उसके पाँच रक्षक थे, फिर भी उसे अनाथ की तरह घसीटा गया। जैसे आँधी केले के पेड़ को झकझोर देती है।
वो कहती रही — "मैं एक ही वस्त्र में हूँ, मुझे सभा में मत ले चलो।" पर किसी ने नहीं सुना।
और सभा में पहुँचकर उसने सबकी ओर देखा। भीष्म। द्रोण। विदुर। राजा धृतराष्ट्र। अपने पाँचों पति।
सब सिर झुकाए बैठे थे।
तब द्रौपदी ने वो बात कही, जो आज भी हर अदालत, हर पंचायत, हर दफ़्तर के लिए एक कसौटी है —
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा
न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम् ।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ॥
"वो सभा नहीं, जहाँ बड़े न हों। वो बड़े नहीं, जो धर्म की बात न कहें। वो धर्म नहीं, जिसमें सच न हो। और वो सच नहीं… जिसमें छल मिला हो।"
चार पंक्तियाँ। और पूरी सभा का मुँह बंद।
पर सुनिए। उस सभा में एक आवाज़ उठी थी। सिर्फ़ एक।
दुर्योधन का ही छोटा भाई, विकर्ण। एक नौजवान। उसने खड़े होकर कहा — "राजाओ, द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर दो! युधिष्ठिर ख़ुद को हार चुके थे, तब उन्होंने इसे दाँव पर लगाया। मैं मानता हूँ, ये जीती ही नहीं गई।"
सभा में शोर उठा। कुछ लोगों ने उसकी तारीफ़ भी की। पर कर्ण ने उसे झिड़क दिया — "तू बच्चा है, बड़ों जैसी बातें करता है।" और बात वहीं दब गई।
कई बार ऐसा ही होता है। एक आदमी सच बोलता है, और उसे "बच्चा" कहकर बिठा दिया जाता है। पर याद रखिए — उस पूरी सभा में, हज़ारों बरस बाद भी, विकर्ण का नाम सम्मान से लिया जाता है।
और फिर वो आदेश आया। "दुःशासन, इसके वस्त्र उतार लो।"
दुःशासन ने सभा के बीच द्रौपदी का वस्त्र पकड़ा… और खींचने लगा।
अब उस पल में, द्रौपदी के मन में क्या आया होगा? पति चुप। बड़े चुप। सभा चुप।
महाभारत बताता है। उसे बचपन में सुनी एक बात याद आई। ऋषि वसिष्ठ की कही हुई बात —
महत्यापदि संप्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान्हरिः ।
"जब बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़े… तब भगवान हरि को याद करना।"
सुना आपने? किसी ने उसे ये बात कभी सिखाई थी। और वो बात, बरसों बाद, ठीक उस पल काम आई जब कुछ और काम नहीं आ रहा था।
और द्रौपदी ने पुकारा —
शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत ।
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागताम् ॥
"हे शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले! हे द्वारका में रहने वाले अच्युत! हे गोविन्द, हे कमल-नयन… मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हारी शरण में हूँ।"
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन ।
कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन ॥
"हे नाथ! हे दुःख मिटाने वाले! मैं कौरवों के समुद्र में डूब रही हूँ। जनार्दन… मुझे निकाल लो।"
और फिर उसने अपना मुँह ढक लिया… और फूट-फूटकर रोने लगी।
और अब सुनिए, उस सभा में क्या हुआ।
तस्य प्रसादाद्द्रौपद्याः कृष्यमाणेऽम्बरे तदा ।
तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः ॥
"उनकी कृपा से… जैसे-जैसे वस्त्र खींचा जाता, वैसा ही दूसरा वस्त्र प्रकट हो जाता।" एक बार नहीं। बार-बार।
नानारागविरागाणि वसनान्यथ वै प्रभो ।
प्रादुर्भवन्ति शतशो धर्मस्य परिपालनात् ॥
रंग-बिरंगे वस्त्र, सफ़ेद वस्त्र… सैकड़ों! दुःशासन खींचता जा रहा है, और वस्त्र निकलते जा रहे हैं।
और इस श्लोक के अंत में दो शब्द हैं, ध्यान दीजिए — "धर्मस्य परिपालनात्"। क्योंकि द्रौपदी ने धर्म की रक्षा की थी। उसने अपमान में भी धर्म का सवाल पूछा था, गाली नहीं दी थी।
यदा तु वाससां राशिः सभामध्ये समाचितः ।
तदा दुःशासनः श्रान्तो व्रीडितः समुपाविशत् ॥
सभा के बीच वस्त्रों का ढेर लग गया। और दुःशासन… थककर, शर्म से, बैठ गया।
जो सबके सामने अपमान करने खड़ा हुआ था… वही सबके सामने थककर बैठ गया। सब राजाओं ने कहा — "धिक्कार है!"
अब एक ऐसी बात, जो सुनकर आप चौंक जाएँगे।
द्रौपदी ने पुकारा था — "द्वारकानिलय", द्वारका में रहने वाले। पर उस दिन श्रीकृष्ण द्वारका में थे ही नहीं!
बाद में, जब वो वन में पाण्डवों से मिले, तो उन्होंने ख़ुद कहा —
असान्निध्यं तु कौरव्य ममानर्तेष्वभूत्तदा ।
"उस समय मैं वहाँ नहीं था। द्वारका लौटकर मैंने सुना कि तुम पर क्या संकट आया।"
सोचिए। पता जिस घर का दिया, वहाँ वो नहीं थे। ख़बर भी उन्हें बाद में मिली। फिर भी, सभा में वस्त्र बढ़ता रहा। "तस्य प्रसादात्" — उनकी कृपा से।
यानी पुकार को पते की ज़रूरत नहीं। ख़बर की ज़रूरत नहीं। पुकार सीधे पहुँचती है।
और एक आख़िरी बात द्रौपदी की, जो मुझे सबसे बड़ी लगती है।
अपशकुन हुए, तो धृतराष्ट्र डर गए। द्रौपदी से बोले — "बेटी, वर माँगो।" द्रौपदी ने माँगा — युधिष्ठिर दासता से मुक्त हों। ताकि उसके बेटे को कोई "दास का बेटा" न कहे। दूसरा वर — बाक़ी चारों भाई मुक्त हों, अपने रथ और धनुष के साथ।
धृतराष्ट्र बोले — "तीसरा भी माँगो!"
और द्रौपदी ने मना कर दिया।
लोभो धर्मस्य नाशाय भगवन्नाहमुत्सहे ।
"लोभ धर्म का नाश करता है। मैं तीसरा वर नहीं लूँगी।"
जिसका अभी-अभी सबके सामने अपमान हुआ… उसने बदले में भी हिसाब से ज़्यादा नहीं लिया। यही गरिमा है।
और वन में, जब द्रौपदी ने रोते हुए श्रीकृष्ण से अपना दुःख कहा, तो उन्होंने एक वचन दिया —
पतेद्द्यौर्हिमवाञ्शीर्येत्पृथिवी शकली भवेत् ।
शुष्येत्तोयनिधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ॥
"आकाश गिर जाए, हिमालय टूट जाए, पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो जाए, समुद्र सूख जाए… पर मेरा वचन व्यर्थ नहीं जाएगा।"
और गीता में यही वचन सबके लिए है —
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
"सज्जनों की रक्षा के लिए… मैं आता हूँ।"
तो जब भरी सभा में आप अकेले पड़ जाएँ, तो तीन बातें।
पहली। अपमान में भी अपनी गरिमा मत छोड़िए। द्रौपदी ने गाली नहीं दी, प्रश्न पूछा। और वस्त्र आए — "धर्मस्य परिपालनात्"।
दूसरी। विकर्ण बनिए। जब किसी और का अपमान हो रहा हो, और सब चुप हों… तो आप खड़े हो जाइए। चाहे आपको "बच्चा" कहकर बिठा दिया जाए।
और तीसरी। आज, जब सब ठीक है, एक बात याद कर लीजिए — "बड़ी विपत्ति में हरि को याद करना।" द्रौपदी को ये बात बचपन में मिली थी। और उस दिन यही काम आई।
तो अगली बार, जब सबके सामने आपका सिर झुकाया जाए… जब अपने ही चुप बैठे हों…
तो याद रखिए — उस सभा में सब चुप थे। पर वो चुप नहीं रहे।
भरी सभा में अकेली थी वो… पर अकेली नहीं थी।
जय श्री कृष्ण।
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागताम् ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.अपमान में भी अपनी गरिमा मत छोड़िए। द्रौपदी ने गाली नहीं दी, प्रश्न पूछा। और वस्त्र आए — "धर्मस्य परिपालनात्"।
- 2.विकर्ण बनिए। जब किसी और का अपमान हो रहा हो, और सब चुप हों… तो आप खड़े हो जाइए। चाहे आपको "बच्चा" कहकर बिठा दिया जाए।
- 3.आज, जब सब ठीक है, एक बात याद कर लीजिए — "बड़ी विपत्ति में हरि को याद करना।" द्रौपदी को ये बात बचपन में मिली थी। और उस दिन यही काम आई।