यात्री हो तुम

You are a traveller — Śrī Rāma to Bharata, the Yakṣa’s questions, Naciketā’s chariot

मृत्यु और शोक 24 Oct 2026 · 15 min
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सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥
कठ 1.3.9

जय श्री कृष्ण।

एक बात बताइए… आख़िरी बार आप कब स्टेशन पर किसी को छोड़ने गए थे?

याद कीजिए वो दृश्य। गाड़ी चलने वाली है। अंदर बैठा आदमी खिड़की से हाथ हिला रहा है। बाहर प्लेटफ़ॉर्म पर आप खड़े हैं। और जैसे ही गाड़ी सरकने लगती है… आप क्या कहते हैं?

"पहुँचकर फ़ोन करना!"

और कभी-कभी, कोई बुज़ुर्ग धीरे से कह देते हैं — "चलो, हम भी पीछे-पीछे आते हैं।"

अब ध्यान से सुनिए। यही बात… यही "हम भी पीछे-पीछे आते हैं"… आज से हज़ारों बरस पहले भगवान श्रीराम ने कही थी।

चित्रकूट। मन्दाकिनी नदी का किनारा।

भरत अयोध्या से दौड़े-दौड़े आए हैं। पूरी सेना, पूरी प्रजा, तीनों माताएँ साथ हैं। और वो अपने बड़े भाई को एक ख़बर देने आए हैं… जो कोई बेटा सुनना नहीं चाहता।

पिताजी नहीं रहे।

श्रीराम वनवास में थे। उन्हें पता भी नहीं था। पिता बेटे के वियोग में चल बसे, और बेटा अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाया।

अब सोचिए। श्रीराम ख़ुद रोए हैं। ख़ुद टूटे हैं। पर अगली सुबह भरत रो रहे हैं, प्रजा रो रही है… और जिसे सबसे ज़्यादा रोना चाहिए था, वही सबको सँभालता है।

और श्रीराम क्या कहते हैं? कोई बड़ा दर्शन नहीं झाड़ते। बिल्कुल हमारी-आपकी भाषा में बोलते हैं।

यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात्कश्चित्पथि स्थितः । अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति ॥
अयोध्या 105.29

श्रीराम कहते हैं — भरत, जैसे रास्ते पर खड़ा कोई आदमी, जाते हुए यात्रियों के काफ़िले से कहता है, "आप चलिए, मैं भी पीछे-पीछे आता हूँ"…

एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पितृपैतामहो ध्रुवः ।
105.30

…वैसे ही हमारे पिता गए, उनके पिता गए, उनके भी पिता गए। ये वही पक्का रास्ता है। और हम सब उसी रास्ते पर खड़े हैं।

यात्री हैं हम। सब के सब।

अब एक मज़ेदार बात। श्रीराम ने उसी बातचीत में एक ऐसी बात कही, जो आज के ज़माने पर बिल्कुल फ़िट बैठती है।

नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमिते रवौ ।
105.24

लोग सूरज उगने पर ख़ुश होते हैं… और सूरज डूबने पर भी ख़ुश होते हैं। सुबह कहते हैं, "वाह, नया दिन!" शाम को कहते हैं, "चलो, छुट्टी हुई!"

हृष्यन्त्यृतुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिहागतम् ।
105.25

हर नई ऋतु आती है तो हम ख़ुश। और जन्मदिन पर तो पूछिए मत! केक कटता है, मोमबत्तियाँ बुझती हैं, सब ताली बजाते हैं…

श्रीराम कहते हैं — ज़रा रुककर देखो। हर ऋतु के बदलने के साथ… जीवन से एक टुकड़ा कम हो गया।

वो मोमबत्ती, जो आपने फूँक मारकर बुझाई… वो एक साल था।

डराने के लिए नहीं कह रहे। जागने के लिए कह रहे हैं।

अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते । यात्येव यमुना पूर्णा समुद्रमुदकाकुलम् ॥
105.19

जो रात बीत गई, वो लौटकर नहीं आती। और यमुना… भरी हुई यमुना… बस बहती जाती है, समुद्र की ओर।

नदी कभी उल्टी नहीं बहती। नदी रुकती भी नहीं। पर नदी को कभी शोक करते देखा है? नहीं! क्योंकि नदी को पता है — वो समुद्र की तरफ़ जा रही है। उसका घर वहीं है।

याद रखिएगा ये बात। आगे काम आएगी।

अब चलिए एक दूसरे दृश्य में। महाभारत। वनवास के दिन।

पाण्डवों को प्यास लगी है। एक-एक भाई पानी लेने सरोवर पर जाता है… और लौटता नहीं। नकुल गए — गिर पड़े। सहदेव गए — गिर पड़े। अर्जुन गए, भीम गए — सब के सब, उस सरोवर के किनारे, निष्प्राण।

आख़िर में युधिष्ठिर पहुँचते हैं। चारों भाई सामने पड़े हैं। और एक आवाज़ आती है — "पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर पानी पीना।"

वो यक्ष था। और उसने एक के बाद एक सवाल पूछे। उनमें से एक सवाल… आज के सत्संग का सवाल है।

किंस्वित्प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य च किं मित्रं किंस्विन्मित्रं मरिष्यतः ॥
वनपर्व 314.65

परदेस जाने वाले का मित्र कौन? घर में रहने वाले का मित्र कौन? बीमार का मित्र कौन? और जो मरने वाला है… उसका मित्र कौन?

सोचिए, आप होते तो क्या जवाब देते?

युधिष्ठिर ने कहा —

विद्या प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य भिषङ्मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥
314.66

परदेस में तुम्हारी विद्या साथ देती है। घर में जीवनसाथी। बीमार का साथी वैद्य। और जाते हुए यात्री का साथी… दान।

अब ज़रा सोचिए। हम किसी लंबी यात्रा पर जाते हैं, तो सबसे ज़्यादा चिंता किस बात की होती है? सामान की! अटैची में क्या रखूँ, कितना रखूँ, वज़न तो ज़्यादा नहीं हो गया…

और इस सबसे लंबी यात्रा के लिए? यहाँ तो एक भी अटैची चढ़ने नहीं देते! घर यहीं रह जाता है, गाड़ी यहीं, बैंक का खाता यहीं।

जो साथ जाता है… वो सिर्फ़ वो है जो आपने दे दिया। जो आपने बाँटा। जिसकी भूख आपने मिटाई। जिसके आँसू पोंछे।

अजीब बात है न? जो रखा, वो छूट गया। जो दे दिया… वो साथ चला।

और फिर यक्ष ने वो सवाल पूछा, जो महाभारत का सबसे प्रसिद्ध सवाल बन गया। "सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?"

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् । शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
314.118

रोज़… हर दिन… प्राणी इस दुनिया से जाते हैं। और जो बचे हैं, वो सोचते हैं, "हम तो यहीं रहेंगे, हमेशा।" इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा?

हम श्मशान जाते हैं। अर्थी को कंधा देते हैं। "राम नाम सत्य है" बोलते हैं। और लौटते समय रास्ते में फ़ोन निकालकर पूछते हैं — "अरे, वो प्लॉट वाली बात आगे बढ़ी या नहीं?"

यही तो आश्चर्य है!

और आपको पता है, ये प्रश्न पूछने वाला यक्ष असल में कौन था? स्वयं धर्म। और युधिष्ठिर के उत्तरों से प्रसन्न होकर उन्होंने चारों भाइयों को जीवित कर दिया।

जिसने यात्रा को समझ लिया… उसके लिए मृत्यु भी लौट जाती है।

पर अब एक बड़ा प्रश्न। अगर हम यात्री हैं… तो जा कहाँ रहे हैं?

क्योंकि यात्री और भटकने वाले में एक ही फ़र्क़ है। यात्री को अपनी मंज़िल पता होती है।

इसका उत्तर मिलता है कठ उपनिषद् में। वहाँ एक बालक है, नचिकेता। वो यमराज के दरवाज़े पर पहुँच गया। तीन रातें बिना खाए-पिए, यम की प्रतीक्षा में बैठा रहा। सोचिए, मृत्यु के देवता के घर पर, एक बच्चा, अकेला!

और यमराज ने उसे जीवन की यात्रा एक रथ की तरह समझाई।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
कठ 1.3.3

ये शरीर रथ है। बुद्धि सारथी है। मन लगाम है। और रथ में बैठा यात्री… वो आप हैं। आत्मा।

अब रथ पुराना हो जाता है। पहिए घिस जाते हैं। रंग उतर जाता है। तो क्या यात्री भी पुराना हो जाता है? नहीं! यात्री तो वही है जो बचपन में बैठा था।

और यह रथ जा कहाँ रहा है? यमराज ख़ुद बताते हैं —

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
कठ 1.3.9

जिसका सारथी समझदार है, जिसने मन की लगाम थाम रखी है… वो इस रास्ते के पार पहुँचता है। **विष्णु के परम पद तक।**

सुना आपने? ये बात मृत्यु के देवता कह रहे हैं। जो सबको ले जाते हैं, वही बता रहे हैं — रास्ता मुझ पर ख़त्म नहीं होता। रास्ता भगवान पर ख़त्म होता है।

और अब सबसे सुंदर बात।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ख़ुद बताते हैं कि यह यात्री है कौन।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
गीता 15.7

"मेरा ही अंश।" भगवान कहते हैं — ये जो जीव है, ये मेरा ही अंश है। सनातन। हमेशा का।

सोचिए इसका मतलब। आप कोई अनाथ यात्री नहीं हैं, जो अनजान शहर में भटक रहा है। आप उस घर के बच्चे हैं… जो घर से निकला है… और घर लौट रहा है।

और भगवान अपना परिचय कैसे देते हैं?

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
9.18

"मैं गति हूँ" — यानी मंज़िल। "भर्ता" — रास्ते में तुम्हारा पेट भरने वाला। "साक्षी" — हर क़दम देखने वाला। "निवास" — रुकने की जगह। "शरण" — थकने पर सहारा। और "सुहृत्" — रास्ते का दोस्त।

यानी मंज़िल भी वो, रास्ते का खाना भी वो, सराय भी वो, और साथ चलने वाला दोस्त भी वही!

अब बताइए… ऐसी यात्रा में डर किस बात का?

और वो घर कैसा है?

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
15.6

वहाँ रोशनी के लिए न सूरज चाहिए, न चाँद, न दीया। और जहाँ जाकर… कोई लौटता नहीं।

याद है, स्टेशन पर हम क्या कहते थे? "पहुँचकर फ़ोन करना।"

उस घर से कोई फ़ोन नहीं आता… क्योंकि वहाँ पहुँचकर किसी को कहीं और जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। जो चले गए हैं… उनके लिए शोक हो, ये स्वाभाविक है। श्रीराम भी रोए थे। पर याद रखिए, श्रीराम ने ही कहा — वो आगे गए हैं, हम पीछे आ रहे हैं। बिछड़ना नहीं है ये। ये बस… अलग-अलग गाड़ी है।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे । समेत्य च व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन ॥
105.26

जैसे महासागर में दो लकड़ियाँ बहते-बहते मिल जाती हैं, कुछ दूर साथ चलती हैं, फिर लहरें उन्हें अलग कर देती हैं। वैसे ही माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे, दोस्त… इसलिए जो साथ हैं, आज उन्हें जी भरकर प्यार कीजिए। ये सफ़र छोटा है।

दूसरी। अटैची हल्की रखिए। जितना रखेंगे, उतना छूटेगा। जितना देंगे, उतना साथ चलेगा।

और तीसरी… सबसे ज़रूरी।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
गीता 9.33

भगवान कहते हैं — ये दुनिया हमेशा की नहीं है। यहाँ आए हो, तो मुझे भजो। ये मनुष्य जन्म… ये टिकट है। बहुत मुश्किल से मिला है। इस टिकट पर सिर्फ़ प्लेटफ़ॉर्म पर घूमते मत रहिए। गाड़ी में बैठिए। नाम लीजिए।

तो अगली बार, जब मन घबराए… जब कोई अपना छूट जाए… जब आईने में एक और सफ़ेद बाल दिखे…

तो अपने आप से धीरे से कहिए —

"यात्री हो तुम।"

और याद रखिए… घर पर कोई तुम्हारी राह देख रहा है।

जय श्री कृष्ण।

सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
कठ 1.3.9

इस सत्संग के श्लोक

कठ 1.3.9 अयोध्या 105.29 105.30 105.24 105.25 105.19 वनपर्व 314.65 314.66 314.118 कठ 1.3.3 गीता 15.7 9.18 15.6 105.26 गीता 9.33