सात दिन की छतरी

An umbrella for seven days — Govardhana held on one finger while the rain would not stop

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तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्नाथं मत्परिग्रहम् । गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः ॥
भागवत 10.25.18

जय श्री कृष्ण।

कभी ऐसा दौर आया है आपकी ज़िंदगी में… जब मुसीबतें एक-एक करके नहीं, एक साथ बरसीं?

नौकरी गई। उसी महीने पिताजी बीमार। अस्पताल का बिल। फिर बच्चे के स्कूल की फ़ीस। और जिस दिन लगा कि अब थोड़ा सँभल रहे हैं… उसी दिन घर की छत टपकने लगी।

उस समय मन में एक ही सवाल उठता है — "ये बारिश रुकेगी कब?" एक दिन, दो दिन, हफ़्ता… और लगता है, बस अब नहीं सहा जाता।

आज उस बारिश की कथा, जो सात दिन तक नहीं रुकी। और उस छतरी की, जो सात दिन तक नहीं हिली।

व्रज में हर साल इन्द्र की पूजा होती थी। बड़ी तैयारी। पकवान, दूध, सब कुछ।

इस बार नन्हे श्रीकृष्ण ने पिता नन्द बाबा से पूछा — "बाबा, ये किसलिए?" और फिर समझाया — "हम ग्वाले हैं। हमारा जीवन गायों से, जंगल से, इस पर्वत से चलता है। तो इस बार गोवर्धन पर्वत की, गायों की, ब्राह्मणों की पूजा कीजिए।"

और जो कहा, सुनने लायक़ है। "खीर से लेकर दाल तक, हलवा, पूए, पूरियाँ बनाइए। और सबको खिलाइए — कुत्तों को भी, जिन्हें कोई नहीं पूछता उन्हें भी। गायों को घास दीजिए। फिर नहा-धोकर, अच्छे कपड़े पहनकर, पर्वत की परिक्रमा कीजिए।"

यानी पूजा भी, दावत भी, और कोई भूखा भी न रहे।

व्रजवासियों ने वैसा ही किया। और भागवत कहता है, उस दिन श्रीकृष्ण ने एक दूसरा विशाल रूप धरा, कहा "मैं पर्वत हूँ", और सारा भोग खा गए। और फिर ख़ुद ही व्रजवासियों के साथ अपने उस रूप को प्रणाम करने लगे! "देखो, पर्वत ने साक्षात् आकर कृपा की!"

पर स्वर्ग में कोई नाराज़ बैठा था।

इन्द्र। अपनी पूजा बंद होते देखी, तो क्रोध से भर गया। "इन ग्वालों को धन का घमंड चढ़ा है। एक मामूली बच्चे के कहने पर मेरा अपमान किया!"

गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारिणाम् ।
10.25.2

और इन्द्र ने भेजे — सांवर्तक मेघ। वो बादल, जो प्रलय के समय छोड़े जाते हैं!

बिजलियाँ कड़कीं। बादल गरजे। आँधी चली। और फिर ओले बरसने लगे।

स्थूणास्थूला वर्षधारा मुञ्चत्स्वभ्रेष्वभीक्ष्णशः ।
10.25.10

भागवत कहता है — खंभे जितनी मोटी धाराएँ। धरती ऐसी डूबी कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ टीला, कुछ दिखना बंद हो गया।

गायें काँप रही थीं। ग्वाले ठंड से ठिठुर रहे थे। और भागवत एक ऐसा दृश्य लिखता है, जो दिल चीर देता है — माँ-बाप अपने शरीर से अपने बच्चों के सिर ढके हुए थे। ख़ुद भीगते हुए, ख़ुद ओले खाते हुए।

आपने भी किया है ये। जब मुसीबत बरसी, तो पहले बच्चों को ढका। ख़ुद भीगते रहे।

और फिर वो सब, काँपते हुए, किसके पास गए?

कृष्ण कृष्ण महाभाग त्वन्नाथं गोकुलं प्रभो । त्रातुमर्हसि देवान्नः कुपिताद्भक्तवत्सल ॥
10.25.13

"कृष्ण! कृष्ण! गोकुल के रक्षक तुम्हीं हो। इस नाराज़ देवता से हमें बचाओ!"

ज़रा सोचिए इस दृश्य को। बड़े-बूढ़े, अनुभवी ग्वाले… एक सात साल के बच्चे के पैरों में जाकर गिर रहे हैं। क्योंकि मुसीबत में दिल जानता है कि किसके पास जाना है।

श्रीकृष्ण ने देखा, ओलों की मार से सब बेसुध हो रहे हैं। समझ गए, ये इन्द्र का ग़ुस्सा है। और फिर मन में एक बात कही, जो इस पूरी कथा की जान है —

तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्नाथं मत्परिग्रहम् । गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः ॥
10.25.18

"ये व्रज मेरी शरण में है। मैं इसका रक्षक हूँ। ये मेरा अपना परिवार है। इसकी रक्षा करूँगा। ये मेरा लिया हुआ व्रत है।"

"सोऽयं मे व्रत आहितः।" ये मेरा व्रत है।

इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम् । दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालकः ॥
10.25.19

और ऐसा कहकर, एक हाथ से पूरा गोवर्धन पर्वत उखाड़ लिया!

और यहाँ पहली मज़ेदार बात। भागवत उपमा क्या देता है? "छत्राकमिव बालकः" — जैसे कोई बच्चा ज़मीन से कुकुरमुत्ता उखाड़ लेता है। बरसात में उगने वाली वो छोटी-सी छतरी!

यानी पूरा पहाड़… श्रीकृष्ण के लिए बरसाती कुकुरमुत्ता था। और वो कुकुरमुत्ता पूरे व्रज की छतरी बन गया।

लोग अक्सर कहते हैं, छोटी उँगली पर उठाया। हमारा भागवत का पाठ कहता है — "एकेन हस्तेन", एक हाथ से। बात वही है। जितना भारी पहाड़, उतना हल्का हाथ।

और फिर बड़े प्यार से पुकारा —

अथाह भगवान्गोपान्हेऽम्ब तात व्रजौकसः ।
10.25.20

"माँ! बाबा! व्रज के सब लोगो! अपनी गायों को लेकर आराम से नीचे आ जाओ।"

न त्रास इह वः कार्यो मद्धस्ताद्रिनिपातनात् ।
10.25.21

"और डरना मत कि मेरे हाथ से पहाड़ गिर जाएगा!"

सोचिए, कैसी मासूम बात। सात साल का बच्चा, सिर के ऊपर पूरा पर्वत… और वो दूसरों को तसल्ली दे रहा है।

और सब आ गए। गायें, बछड़े, छकड़े, सामान, नौकर-चाकर, बूढ़े, बच्चे। जिसको जहाँ जगह मिली, वहाँ बैठ गया।

और अब वो पंक्ति, जिसके लिए ये सत्संग है।

क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः । वीक्ष्यमाणो दधाराद्रिं सप्ताहं नाचलत्पदात् ॥
10.25.23

सात दिन। भूख छोड़ दी। प्यास छोड़ दी। आराम की इच्छा छोड़ दी। और अपनी जगह से… एक क़दम नहीं हिले।

बाहर सात दिन तक प्रलय की बारिश। अंदर पूरा व्रज। और बीच में एक बच्चा, जिसका हाथ ऊपर उठा है।

और एक शब्द पर ध्यान दीजिए — "वीक्ष्यमाणः", व्रजवासी उन्हें निहारते रहे। सात दिन, ऊपर ओले गिर रहे थे, पर किसी की नज़र ऊपर नहीं थी। सबकी नज़र उस चेहरे पर थी।

जब मुसीबत ऊपर बरस रही हो… तो ऊपर मत देखिए। उसका चेहरा देखिए।

और फिर? इन्द्र थक गया।

भागवत कहता है — श्रीकृष्ण की शक्ति देखकर इन्द्र चकित रह गया। उसकी अकड़ टूट गई, संकल्प टूट गया। और उसने ख़ुद अपने बादलों को रोक लिया।

आसमान साफ़ हुआ। सूरज निकला। श्रीकृष्ण बोले — "डर छोड़ो, बाहर आओ। पानी उतर गया।" सब धीरे-धीरे निकले। और सबके देखते-देखते, खेल-खेल में, पर्वत को वापस उसी जगह रख दिया।

फिर यशोदा माँ ने, रोहिणी ने, नन्द बाबा ने, बलराम ने… कसकर गले लगाया। गोपियों ने दही, अक्षत, जल से पूजा की। और आसमान से देवता फूल बरसाने लगे।

और बाद में ग्वाले नन्द बाबा के पास इकट्ठे हुए। हैरान। और जो कहा, वो बहुत प्यारा है —

यः सप्तहायनो बालः करेणैकेन लीलया । कथं बिभ्रद् गिरिवरं पुष्करं गजराडिव ॥
10.26.3

"नन्द, ये सात साल का बालक एक हाथ पर इतना बड़ा पर्वत ऐसे कैसे उठाए रहा… जैसे हाथी अपनी सूँड़ में कमल का फूल उठा लेता है?"

और फिर उन्होंने एक और सवाल पूछा, जो मुझे सबसे सुंदर लगता है — "हम सबका तुम्हारे बेटे से ऐसा प्रेम क्यों है, जो छूटता ही नहीं? और उसका भी हम पर ऐसा प्रेम क्यों है?"

जिसने सात दिन छतरी पकड़ी हो… उससे प्रेम छूटेगा कैसे?

और अब दूसरी बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं।

इसके बाद इन्द्र स्वयं आए। लज्जित। एकांत में। और अपने चमकते मुकुट से श्रीकृष्ण के चरण छुए।

त्वयेशानुगृहीतोऽस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यमः ।
10.27.13

"प्रभु, आपने मुझ पर कृपा की। मेरा घमंड टूट गया। मेरी कोशिश बेकार गई।"

जिसने सात दिन ओले बरसाए, उसे भी भगवान ने ठुकराया नहीं। "जाओ, तुम्हारा भला हो। बस घमंड छोड़कर अपने पद पर रहो।"

अभ्यषिञ्चत दाशार्हं गोविन्द इति चाभ्यधात् ॥
10.27.23

और फिर गोलोक से आई गाय सुरभि ने अपने दूध से, और इन्द्र ने आकाशगंगा के जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया। और नाम दिया — "गोविन्द"!

यानी जो नाम हम रोज़ लेते हैं, "गोविन्द"… वो नाम उसी इन्द्र ने दिया, जिसने बारिश भेजी थी!

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। मुसीबत बरसे, तो दौड़िए उसकी तरफ़। व्रजवासी किसी और देवता के पास नहीं गए, सीधे उस बच्चे के पास गए। "कृष्ण, कृष्ण" — बस दो शब्द। प्रार्थना इससे लंबी होनी ज़रूरी नहीं।

दूसरी। बारिश कितनी भी लंबी हो, छतरी उससे लंबी चलती है। सात दिन बारिश थी, सात दिन हाथ उठा रहा। भगवान का धीरज हमारी मुसीबत से हमेशा बड़ा होता है।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
गीता 9.22

भगवान का वचन है — "जो मुझ पर टिके रहते हैं, उनका सारा बोझ मैं उठाता हूँ।" गोवर्धन तो बस उस वचन की एक तस्वीर है।

और तीसरी। जब तक बारिश चले, नज़र उनके चेहरे पर रखिए। ओले गिनने से ओले कम नहीं होते। नाम लेने से डर कम होता है।

तो अगली बार, जब एक के बाद एक मुसीबत बरसे… जब लगे, ये बारिश अब कभी नहीं रुकेगी…

तो व्रज को याद कीजिए। खंभे जितनी मोटी धाराएँ। काँपती गायें। और सिर के ऊपर एक पहाड़… एक बच्चे के हाथ पर।

सात दिन की छतरी। "डरो मत, मेरे हाथ से ये नहीं गिरेगा।"

जय श्री कृष्ण।

क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः । वीक्ष्यमाणो दधाराद्रिं सप्ताहं नाचलत्पदात् ॥
भागवत 10.25.23

इस सत्संग के श्लोक

भागवत 10.25.18 10.25.2 10.25.10 10.25.13 10.25.18 10.25.19 10.25.20 10.25.21 10.25.23 10.26.3 10.27.13 10.27.23 गीता 9.22 भागवत 10.25.23