ताक़त ख़त्म, तब पुकार

When strength runs out, call — Gajendra, alone in the lake after a thousand years, lifts one lotus

0:00
नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥
भागवत 8.3.32

जय श्री कृष्ण।

आज की बात उन लोगों के लिए है… जो लड़ते-लड़ते थक गए हैं।

जो सालों से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं। जिनका केस कोर्ट में दस साल से चल रहा है। जो हर महीने सोचते हैं, "इस बार कर्ज़ उतर जाएगा," और हर महीने वो बढ़ जाता है। जिन्होंने हर डॉक्टर, हर वकील, हर रिश्तेदार का दरवाज़ा खटखटा लिया है।

अगर आप उनमें से हैं… तो ये कथा आपकी है।

बहुत सुंदर जगह से शुरू करते हैं। त्रिकूट पर्वत। चाँदी, लोहे और सोने की तीन चोटियाँ। चारों ओर दूध जैसा समुद्र। आम, कटहल, चंदन, कदम्ब के पेड़। और बीच में एक बड़ा सरोवर, सुनहरे कमलों से भरा।

उस जंगल में एक गजराज रहता था। हाथियों का सरदार। इतना बलवान कि उसकी गंध से ही शेर और बाघ भाग जाते थे।

एक दोपहर, धूप से तपा हुआ, वो अपने पूरे परिवार के साथ सरोवर पर आया। हथिनियाँ, छोटे-छोटे बच्चे।

और अब भागवत एक बहुत प्यारी बात कहता है। गजराज ने सूँड़ में पानी भरा और फुहारें छोड़-छोड़कर हथिनियों को नहलाने लगा, बच्चों को पानी पिलाने लगा… "यथा गृही" — बिल्कुल एक प्यार करने वाले गृहस्थ की तरह।

वो हम हैं। हम सब। परिवार में मगन, बच्चों की ख़ुशी में ख़ुश। और भागवत कहता है — उस मस्ती में वो बेचारा… आने वाली विपत्ति को नहीं देख पाया।

अचानक, पानी के भीतर से, एक बलवान ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया।

गजराज ने पूरी ताक़त लगाई। खींचा। हथिनियाँ चिंघाड़ने लगीं। साथी हाथी दौड़े, पीछे से खींचने लगे। पर कोई छुड़ा नहीं पाया।

और फिर भागवत एक ऐसी संख्या बताता है, जो सुनकर दिल बैठ जाता है।

समाः सहस्रं व्यगमन्महीपते सप्राणयोश्चित्रममंसतामराः ॥
8.2.29

हज़ार वर्ष। हज़ार वर्ष तक वो लड़ाई चलती रही। कभी हाथी ग्राह को किनारे खींचता, कभी ग्राह हाथी को पानी में। देवता भी देखकर हैरान थे।

आपकी बीमारी कितने साल से है? आपका संघर्ष कितना पुराना है? हज़ार साल का संघर्ष… उसे आप समझ सकते हैं।

और फिर एक बहुत गहरी बात। भागवत कहता है — इस लंबे समय में हाथी का मन, बल और तेज घटता गया। और ग्राह का? उल्टा। उसका बल बढ़ता गया।

क्यों? क्योंकि वो पानी में था। अपने घर में। और हाथी पराई ज़मीन पर लड़ रहा था।

यही होता है न? चिंता अपने घर में है, हमारे मन में। वो रोज़ मोटी होती जाती है। और हम रोज़ पतले।

और फिर, एक दिन… थका, टूटा, आधा डूबा हुआ गजराज रुक गया। और उसने सोचा।

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम् ।
8.2.32

"ये मेरे अपने हाथी… मुझे नहीं छुड़ा सकते। तो ये बेचारी हथिनियाँ क्या करेंगी?"

ये कड़वा सच है। रिश्तेदार प्यार करते हैं। दोस्त चिंता करते हैं। पर कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं… जिनमें वो चाहकर भी आपका पैर नहीं छुड़ा सकते।

पर उस विचार के बाद, गजराज के मन में दूसरा विचार आया —

ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतोऽप्यहं च तं यामि परं परायणम् ॥
8.2.32

"मैं उसकी शरण जाता हूँ… जो सबका परम आश्रय है।"

अब यहाँ एक बड़ा अद्भुत रहस्य है। एक हाथी को भगवान की स्तुति आती कैसे थी? हाथी ने वेद कहाँ पढ़े?

भागवत आगे जाकर बताता है। वो गजराज पिछले जन्म में एक राजा था। पाण्ड्य देश का राजा, इन्द्रद्युम्न। बड़ा भक्त। एक दिन वो पूजा में ऐसा डूबा था कि अगस्त्य मुनि आए और राजा उठकर स्वागत नहीं कर पाया। मुनि ने शाप दे दिया — "जा, हाथी बन जा।"

हर्यर्चनानुभावेन यद्गजत्वेऽप्यनुस्मृतिः ॥
8.4.12

पर भागवत कहता है — हाथी की योनि सब भुला देती है। फिर भी, भगवान की पूजा के प्रभाव से… हाथी बनकर भी उसे भगवान याद रहे।

सुनिए इस बात को। जो पूजा आप आज करते हैं, जो नाम आप आज लेते हैं… वो कहीं नहीं जाता। वो बैंक में जमा पैसे जैसा है। और जिस दिन सब ख़त्म हो जाए, उस दिन वही निकलता है।

इसलिए जो माताएँ रोज़ सुबह दीया जलाती हैं, जो दादाजी रोज़ गीता का एक श्लोक पढ़ते हैं… वो रोज़ अपने लिए एक रस्सी बुन रहे हैं। जिस दिन ग्राह पकड़ेगा, उस दिन वो रस्सी काम आएगी।

तो गजराज ने आँखें बंद कीं, मन को हृदय में टिकाया… और पिछले जन्म की सीखी हुई स्तुति गाने लगा।

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥
8.3.2

"उन भगवान को नमस्कार, जिनसे ये सारा चेतन जगत है।"

और उस स्तुति में एक पंक्ति है, जो मुझे सबसे प्यारी लगती है।

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
8.3.17

"उन्हें नमस्कार, जो मेरे जैसे शरण में आए पशु का फंदा काटते हैं। जो बहुत करुणामय हैं… और जो कभी आलस नहीं करते।"

"अलयाय" — जो कभी आलस नहीं करते। आप सो जाते हैं, वो जागते हैं। आप थक जाते हैं, वो नहीं थकते। आपने हज़ार बार पुकारा, वो हज़ार बार सुनते हैं।

अब एक और दिलचस्प बात। गजराज ने किसी एक देवता का नाम लेकर नहीं पुकारा। उसने बस कहा — "जो भी सबका आश्रय है।"

तो भागवत कहता है, ब्रह्मा और बाक़ी देवता सोचते रहे, "ये मुझे तो नहीं बुला रहा।" कोई नहीं आया!

और फिर वो आए, जो सबमें हैं। श्रीहरि।

छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमानश्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥
8.3.31

गरुड़ पर सवार, हाथ में चक्र, बड़ी तेज़ी से। और गजराज ने ऊपर आकाश में देखा।

अब इस दृश्य को अपनी आँखों में बसाइए। हज़ार साल की लड़ाई। आधा शरीर पानी में। साँस उखड़ रही है। और उस हालत में भी… उस हाथी ने सरोवर से एक कमल तोड़ा… सूँड़ ऊपर उठाई… और बड़ी मुश्किल से बोला —

नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥
8.3.32

"नारायण… जगद्गुरु… भगवन्… आपको नमस्कार।"

मरते हुए हाथी ने… भगवान को फूल चढ़ाया।

और भगवान ने क्या किया?

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
8.3.33

"सहसा अवतीर्य" — तुरंत नीचे उतर आए। गरुड़ के ज़मीन पर उतरने की राह भी नहीं देखी! और कृपा करके गजराज को… ग्राह समेत… सरोवर से बाहर खींच लाए। फिर चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर गजराज को छुड़ा लिया।

अब एक बात जो बहुत कम लोग जानते हैं। वो ग्राह कौन था?

वो भी एक शापित गन्धर्व था, हूहू। देवल ऋषि के शाप से ग्राह बना था। और भगवान के हाथ लगते ही… वो भी मुक्त हो गया। उसने भी भगवान की स्तुति गाई और अपने लोक चला गया।

सोचिए। जिसने हज़ार साल भक्त को सताया… भगवान के स्पर्श से उसका भी उद्धार हो गया। जो आपको सता रहा है, शायद वो भी किसी शाप में बँधा है। भगवान दोनों को छुड़ाते हैं।

अब कोई पूछेगा — "हज़ार साल तक भगवान ने क्यों नहीं बचाया? पहले दिन क्यों नहीं आए?"

ईमानदारी से देखिए। पहले दिन गजराज ने किसे पुकारा था? अपनी ताक़त को। अपने परिवार को। अपने साथियों को। भगवान का नाम सबसे आख़िर में आया।

हम भी यही करते हैं न? पहले अपनी अक़्ल, फिर पैसा, फिर पहचान, फिर डॉक्टर, फिर वकील… और जब सब हार जाते हैं, तब कहते हैं, "अब तो भगवान ही बचाए।"

और सबसे सुंदर बात ये है — भगवान इसका बुरा नहीं मानते!

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
गीता 7.16

गीता में भगवान ख़ुद कहते हैं — चार तरह के पुण्यात्मा मुझे भजते हैं। और पहला नाम किसका है? "आर्त" — दुखी का। जो संकट में पुकारता है।

भगवान उसे "सुकृती" कहते हैं। पुण्यात्मा। यानी संकट में पुकारना कोई कमज़ोरी नहीं। वो भी भक्ति है।

तो जो आज लड़ते-लड़ते थक गए हैं, उनके लिए तीन बातें।

पहली। पुकार में देर मत कीजिए। हज़ार साल का इंतज़ार ज़रूरी नहीं। आज, अभी, इसी लड़ाई के बीच कहिए — "नारायण।" बाक़ी कोशिशें जारी रखिए, पर पहला नाम उनका हो।

दूसरी। आज रस्सी बुनिए। जब सब ठीक है, तब रोज़ एक नाम, एक श्लोक, एक दीया। इन्द्रद्युम्न की पूजा हाथी के जन्म में काम आई। आपकी पूजा भी बेकार नहीं जाएगी।

और तीसरी… ख़ाली हाथ मत पुकारिए। गजराज के पास कुछ नहीं था, फिर भी उसने एक कमल उठाया। आपके पास भी कुछ है। एक आँसू। एक "धन्यवाद"। एक भूखे को रोटी। वही आपका कमल है।

और भगवान ने गजराज से जाते-जाते एक वचन दिया था। आपके लिए।

ये मां स्तुवन्त्यनेनाङ्ग प्रतिबुध्य निशात्यये । तेषां प्राणात्यये चाहं ददामि विमलां मतिम् ॥
8.4.25

"जो भोर में जागकर, तुम्हारी इस स्तुति से मुझे याद करेंगे… उन्हें मैं अंतिम समय में निर्मल बुद्धि दूँगा।"

तो अगर आज आपका पैर किसी ग्राह ने पकड़ रखा है… अगर ताक़त ख़त्म हो चुकी है… अगर अपने भी कह रहे हैं, "अब हम क्या करें"…

तो सूँड़ उठाइए। एक कमल उठाइए।

और कहिए… "नारायण।"

वो आलस नहीं करते। वो सहसा उतरते हैं।

जय श्री कृष्ण।

नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥
8.3.32

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.पुकार में देर मत कीजिए। हज़ार साल का इंतज़ार ज़रूरी नहीं। आज, अभी, इसी लड़ाई के बीच कहिए — "नारायण।" बाक़ी कोशिशें जारी रखिए, पर पहला नाम उनका हो।
  2. 2.आज रस्सी बुनिए। जब सब ठीक है, तब रोज़ एक नाम, एक श्लोक, एक दीया। इन्द्रद्युम्न की पूजा हाथी के जन्म में काम आई। आपकी पूजा भी बेकार नहीं जाएगी।
  3. 3.… ख़ाली हाथ मत पुकारिए। गजराज के पास कुछ नहीं था, फिर भी उसने एक कमल उठाया। आपके पास भी कुछ है। एक आँसू। एक "धन्यवाद"। एक भूखे को रोटी। वही आपका कमल है।

इस सत्संग के श्लोक

भागवत 8.3.32 8.2.29 8.2.32 8.4.12 8.3.2 8.3.17 8.3.31 8.3.32 8.3.33 गीता 7.16 8.4.25