तिनका नहीं उठा

The blade of grass that would not move — The Kena Upaniṣad’s Yakṣa: Agni cannot burn a straw

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तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
केन 1.5

जय श्री कृष्ण।

ऑफ़िस की पार्टी। प्रमोशन हुआ है। केक कटा, तालियाँ बजीं। और फिर माइक हाथ में आया।

"दोस्तों, ये सफ़र आसान नहीं था। मैंने दिन-रात मेहनत की। मैंने रिस्क लिया। मैंने ये टीम खड़ी की। मैंने…"

मैं, मैं, मैं। और पीछे खड़ी वो लड़की, जिसने रात-रात भर बैठकर रिपोर्ट बनाई… उसका नाम कहीं नहीं आया। और घर पर बैठी माँ, जिसने बीस साल सुबह पाँच बजे उठकर टिफ़िन बनाया… उसका भी नहीं।

हम सब कभी न कभी ये भाषण देते हैं। ज़ोर से नहीं, तो मन में। "सब मैंने किया।"

और फिर कभी ज़िंदगी एक छोटा-सा झटका देती है। बीमारी के बाद पहली बार उठे, तो पानी की बोतल का ढक्कन नहीं खुला। जो आदमी कल तक कहता था "सब मैंने किया"… आज उससे एक ढक्कन नहीं खुलता।

या वो पल, जब बरसों का अनुभव, सारी डिग्रियाँ, सारी पहचान होते हुए भी… एक इंटरव्यू में दिमाग़ ख़ाली हो गया। या बच्चे को बुख़ार है, और शहर का सबसे बड़ा डॉक्टर भी कह रहा है, "देखते हैं।" उस पल समझ आता है कि अपने हाथ में कितना कम है।

आज की कथा उसी ढक्कन की है। बस, ढक्कन की जगह… एक तिनका है।

ये कथा केन उपनिषद् में है। और केन उपनिषद् की शुरुआत ही एक प्रश्न से होती है।

केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केन 1.1

"किसके भेजने से ये मन दौड़ता है? किसके जोड़ने से पहली साँस चलती है?" आँख कौन देखती है? कान कौन सुनता है?

और उत्तर आता है —

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः ।
1.2

"वो कान का कान है। मन का मन। वाणी की वाणी। प्राण का प्राण।"

यानी आप जो सुन रहे हैं… उस सुनने के पीछे भी कोई सुन रहा है। और उसी को समझाने के लिए, उपनिषद् एक कथा सुनाता है।

बहुत पहले की बात। एक बार देवताओं की बड़ी जीत हुई।

पर उपनिषद् एक बात साफ़ कहता है, ध्यान दीजिए। पहली बात —

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये ।
3.1

"ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय पाई।" जीता ब्रह्म ने। देवताओं के लिए।

पर देवता क्या सोचने लगे?

त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ।
3.2

"ये जीत हमारी है! ये महिमा हमारी है!" बिल्कुल वही पार्टी वाला भाषण। मैंने किया, मैंने किया।

और ब्रह्म ने उनके मन की बात जान ली। और उनके सामने प्रकट हुआ। पर किस रूप में? एक अजीब-से, अनजाने रूप में। देवता देखते रह गए — "ये यक्ष क्या है? कौन है ये?"

देवताओं ने सबसे पहले भेजा अग्नि देवता को। "जातवेद, तुम जाओ। पता करो ये कौन है।"

अग्नि अकड़कर गए। "जातवेद" — यानी जो हर पैदा हुई चीज़ को जानता है! और आज उसी को एक अनजान का पता लगाने भेजा गया।

यक्ष ने पूछा — "तुम कौन हो?"

"मैं अग्नि हूँ! मैं जातवेद हूँ!"

"अच्छा। तुममें क्या ताक़त है?"

अपीदꣳ सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥
3.5

"धरती पर जो कुछ है… सब जला सकता हूँ!"

यक्ष ने कुछ नहीं कहा। बस, उसके सामने एक तिनका रख दिया।

तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाक दग्धुम् ।
3.6

"इसे जलाओ।"

अग्नि पूरी ताक़त से उस पर लपके। "सर्वजवेन" — पूरे वेग से! और वो तिनका… जला ही नहीं।

एक सूखा तिनका।

अग्नि वहीं से लौट आए। और देवताओं से क्या कहा? "पता नहीं चला, ये यक्ष कौन है।"

ध्यान दीजिए — ये नहीं कहा कि "मुझसे एक तिनका नहीं जला।" बस इतना कहा कि "पता नहीं चला।" हम भी ऐसे ही हैं न? हारकर लौटते हैं, तो कहानी थोड़ी बदल देते हैं। "सिस्टम ख़राब था।" "टाइमिंग ठीक नहीं थी।"

अब भेजा वायु को। "तुम जाओ।"

वायु दौड़कर गए। "मैं वायु हूँ! मातरिश्वा हूँ! धरती पर जो कुछ है, सब उड़ा ले जाऊँ!"

यक्ष ने फिर वही तिनका रख दिया। "इसे उड़ाओ।"

तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाकादातुम् ।
3.10

वायु पूरे वेग से झपटे। और तिनका… हिला तक नहीं।

जो आँधी पेड़ उखाड़ दे, छतें उड़ा दे… वो एक तिनके के आगे हार गई।

वायु भी लौट आए। "पता नहीं चला।"

अब सोचिए, ये हुआ क्यों? अग्नि की आग कहाँ गई? वायु का ज़ोर कहाँ गया?

गीता में भगवान ख़ुद इसका उत्तर देते हैं —

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
गीता 15.12

"जो तेज सूरज में है, जो चाँद में है, जो आग में है… वो मेरा तेज है।"

आग में जलाने की ताक़त आग की अपनी नहीं थी। उधार की थी। और जिस पल देने वाले ने हाथ खींचा… आग एक तिनका नहीं जला सकी।

आपकी आँखों की रोशनी, आपकी बुद्धि, आपकी मेहनत करने की ताक़त, आपकी साँस… सब उधार की है।

अब देवताओं ने भेजा अपने राजा को। इन्द्र। "मघवन्, अब तुम जाओ।"

इन्द्र दौड़कर गए… और यक्ष ग़ायब हो गया!

अब यहाँ दूसरी बात, बहुत गहरी। अग्नि और वायु से तो यक्ष ने बात की थी। तिनका रखा था। इन्द्र के सामने से वो छिप ही गया। शायद राजा का अभिमान सबसे बड़ा था।

पर इन्द्र की एक बात अलग थी। वो लौटा नहीं। वहीं खड़ा रहा। उसी आकाश में।

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाꣳ हैमवतीम् ।
3.12

और उसी आकाश में उसे एक स्त्री दिखी। अत्यंत तेजस्विनी, अत्यंत सुंदर। हिमालय की बेटी — उमा हैमवती।

इन्द्र ने हाथ जोड़कर पूछा — "माँ, ये यक्ष कौन था?"

सा ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ।
4.1

"वो ब्रह्म था। और तुम जिस जीत पर इतरा रहे हो… वो ब्रह्म की जीत थी। तुम्हें तो बस उसकी महिमा मिली थी।"

सोचिए! देवताओं के राजा को सबसे बड़ा रहस्य किसने बताया? एक स्त्री ने। माँ उमा ने।

और वो ब्रह्म कैसा है? उपनिषद् कहता है — जैसे बिजली कौंधी, "अहा!" जैसे पलक झपकी, "अहा!" एक पल दिखा, और छिप गया। पर उस एक पल में सब बदल गया।

और अब तीसरी बात, जो सबसे सुंदर है।

उपनिषद् कहता है — इसके बाद अग्नि, वायु और इन्द्र बाक़ी सब देवताओं से ऊपर माने गए। क्यों?

ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः ।
4.2

"क्योंकि उन्होंने उसे सबसे पास से छुआ।"

सुनिए इस बात को। वो हारे थे! तिनका नहीं जला, तिनका नहीं उड़ा। फिर भी बड़े माने गए। क्योंकि वो भगवान के सामने गए थे। उनके इतने पास गए, कि अपनी हार देख ली।

जो अपनी हार भगवान के सामने देख ले… वही सबसे ऊपर उठता है।

और उपनिषद् उस ब्रह्म को एक बहुत प्यारा नाम देता है —

तद्ध तद्वनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् ।
4.6

"तद्वन" — प्रियतम। "उसे प्रियतम मानकर पूजो। जो ऐसा करता है, उसे सब प्राणी प्यार करते हैं।"

जिस ब्रह्म के सामने आग बुझ गई, आँधी थम गई… उसका नाम है "प्रियतम"। वो डराने नहीं आया था। अपने बच्चों का घमंड उतारने आया था। जैसे माँ, बच्चे के गिरने से पहले उसका हाथ पकड़ लेती है।

गीता में भगवान कहते हैं —

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
गीता 3.27

"सारे काम प्रकृति की शक्तियों से हो रहे हैं। पर अहंकार से भरमाया आदमी सोचता है — 'करने वाला मैं हूँ।'"

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। अगली बार जब कोई तारीफ़ करे, तो मन में एक पल रुकिए। "ब्रह्मणो विजये" — ये जीत उसकी है। मुझे बस इसकी महिमा मिली है। फिर उस लड़की का नाम ज़रूर लीजिए, जिसने रात भर रिपोर्ट बनाई। और माँ का भी।

दूसरी। जब ताक़त जवाब दे जाए, बीमारी में, बुढ़ापे में, हार में… तो शर्मिंदा मत होइए। अग्नि और वायु भी हारे थे। और वही सबसे ऊपर माने गए। क्योंकि हार ने उन्हें भगवान के पास पहुँचाया।

और तीसरी। इन्द्र की तरह, जब जवाब न मिले, तो लौटिए मत। वहीं खड़े रहिए। उसी आकाश में। माँ आएगी। रास्ता बताएगी। अग्नि और वायु लौट आए, इसलिए उत्तर नहीं मिला। इन्द्र रुका रहा, इसलिए उसे माँ मिली। प्रार्थना में भी, जल्दी उठकर मत चले जाइए। थोड़ा रुकिए।

तो अगली बार, जब मन में वो भाषण चलने लगे… "मैंने किया, मैंने किया"…

तो एक तिनके को याद कीजिए। सूखा, हल्का, छोटा-सा तिनका।

जिसे आग नहीं जला सकी… और आँधी नहीं उड़ा सकी।

क्योंकि उस पल, ताक़त देने वाले ने… बस ताक़त अपने पास रख ली थी।

जय श्री कृष्ण।

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूꣳषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
केन 1.7

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.अगली बार जब कोई तारीफ़ करे, तो मन में एक पल रुकिए। "ब्रह्मणो विजये" — ये जीत उसकी है। मुझे बस इसकी महिमा मिली है। फिर उस लड़की का नाम ज़रूर लीजिए, जिसने रात भर रिपोर्ट बनाई। और माँ का भी।
  2. 2.जब ताक़त जवाब दे जाए, बीमारी में, बुढ़ापे में, हार में… तो शर्मिंदा मत होइए। अग्नि और वायु भी हारे थे। और वही सबसे ऊपर माने गए। क्योंकि हार ने उन्हें भगवान के पास पहुँचाया।
  3. 3.इन्द्र की तरह, जब जवाब न मिले, तो लौटिए मत। वहीं खड़े रहिए। उसी आकाश में। माँ आएगी। रास्ता बताएगी। अग्नि और वायु लौट आए, इसलिए उत्तर नहीं मिला। इन्द्र रुका रहा, इसलिए उसे माँ मिली। प्रार्थना में भी, जल्दी उठकर मत चले जाइए। थोड़ा रुकिए।

इस सत्संग के श्लोक

केन 1.5 केन 1.1 1.2 3.1 3.2 3.5 3.6 गीता 15.12 3.12 4.1 4.2 4.6 गीता 3.27 केन 1.7