सब छोड़कर मेरी शरण

Leave everything, come to me — The Gītā’s last word: “mā śucaḥ” — do not grieve

पूजा और भक्ति 16 Nov 2026 · 12 min
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अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
गीता 18.66

जय श्री कृष्ण।

कुछ फ़ैसले ऐसे होते हैं, जो रात भर सोने नहीं देते।

नौकरी बदलूँ या नहीं? बेटी की शादी यहाँ करूँ या वहाँ? बूढ़े पिता को अपने साथ शहर ले आऊँ, या गाँव में ही रहने दूँ? घर बेचूँ या रखूँ? ऑपरेशन करवाऊँ, या दवा से ही चलाऊँ?

इधर जाओ तो एक नुक़सान। उधर जाओ तो दूसरा। हर कोई अलग सलाह देता है। इंटरनेट पर सौ बातें। रिश्तेदार अपनी राय। और आख़िर में, रात के अँधेरे में, आप अकेले रह जाते हैं — फ़ैसले के बोझ के साथ।

आज की कथा दो ऐसे फ़ैसलों की है। एक फ़ैसला, जो एक पल में हुआ। और एक, जिसमें पूरी गीता लगी।

महाभारत का युद्ध होने वाला है। दोनों पक्ष सेना जुटा रहे हैं। और दोनों को पता है — सबसे बड़ी ताक़त कहाँ है। द्वारका में। श्रीकृष्ण के पास।

और संयोग देखिए — एक ही दिन, दुर्योधन भी द्वारका पहुँचा, और अर्जुन भी!

श्रीकृष्ण सो रहे थे। दुर्योधन पहले पहुँचा। कमरे में गया, और श्रीकृष्ण के सिरहाने रखे एक बढ़िया आसन पर, ठाठ से बैठ गया।

फिर अर्जुन आए। और वो कहाँ खड़े हुए?

ततः किरीटी तस्यानु प्रविवेश महामनाः । पश्चार्धे तु स कृष्णस्य प्रह्वोऽतिष्ठत्कृताञ्जलिः ॥
उद्योग 7.9

श्रीकृष्ण के पैरों की ओर। हाथ जोड़े। सिर झुकाए। खड़े रहे।

और अब पहली दिलचस्प बात। श्रीकृष्ण जागे… तो आँख खुलते ही पहले किसे देखा? पैरों की ओर खड़े अर्जुन को! सिरहाने बैठे दुर्योधन को तो मुड़कर देखना पड़ा।

भगवान की नज़र पहले किस पर पड़ती है? जो सिरहाने बैठकर हक़ जताता है, उस पर नहीं। जो चरणों में झुककर खड़ा रहता है, उस पर।

दुर्योधन ने तुरंत कहा — "माधव, मैं पहले आया हूँ। रीति है कि जो पहले आए, उसकी मदद की जाए।"

श्रीकृष्ण मुस्कुराए। "आप पहले आए, ठीक है। पर मैंने पहले अर्जुन को देखा। और रीति ये भी है कि पहला चुनाव छोटे को मिले। इसलिए पहले अर्जुन चुनेंगे।"

और फिर उन्होंने दो विकल्प रखे —

ते वा युधि दुराधर्षा भवन्त्वेकस्य सैनिकाः । अयुध्यमानः संग्रामे न्यस्तशस्त्रोऽहमेकतः ॥
7.20

"एक तरफ़ मेरी नारायणी सेना — दस करोड़ ग्वाले, मेरे जैसे बलवान, युद्ध में जिन्हें हराना कठिन है। और दूसरी तरफ़… अकेला मैं। जो युद्ध में लड़ूँगा नहीं। हथियार रख दूँगा।"

एतद्विदित्वा कौन्तेय विचार्य च पुनः पुनः ।
7.22

"अर्जुन, बार-बार सोच लो।"

अब सोचिए। आप अर्जुन होते तो? सामने भयानक युद्ध। दुश्मन के पास भीष्म, द्रोण, कर्ण। और एक ओर दस करोड़ सैनिक, दूसरी ओर एक निहत्था आदमी! कोई भी हिसाब लगाने वाला… सेना चुनता।

और अर्जुन ने?

एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम् ॥
7.23

"युद्ध में न लड़ने वाले… केशव को चुना।"

और दुर्योधन? महाभारत बताता है — दुर्योधन बहुत ख़ुश हुआ! "श्रीकृष्ण गए, तो जाएँ। पूरी सेना तो मेरी!" ख़ुशी-ख़ुशी लौट गया।

एक ने सब कुछ चुना। एक ने "सब कुछ देने वाले" को चुना।

और एक तीसरा भी था, जिसने फ़ैसला किया। श्रीकृष्ण के बड़े भाई, बलराम। दुर्योधन उनके पास भी गया। और बलराम बोले — "मैंने कृष्ण से कहा था, दोनों से हमारा एक-सा रिश्ता है। उसने मेरी नहीं मानी। और मैं कृष्ण के बिना एक पल नहीं रह सकता। इसलिए मैं किसी का साथ नहीं दूँगा।"

देखिए, "किसी का साथ न देना" भी एक फ़ैसला है। कई बार हम भी यही करते हैं — डर से, उलझन से, बीच में खड़े रह जाते हैं। पर अर्जुन की तरह जो एक बार मन से चुन लेता है… उसका रथ आगे बढ़ता है।

और अब दूसरी बात, जो मुझे सबसे प्यारी लगती है। दुर्योधन के जाने के बाद श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर अर्जुन से पूछा — "मैं तो लड़ूँगा नहीं। फिर तुमने मुझे क्यों चुना?"

सारथ्यं तु त्वया कार्यमिति मे मानसं सदा । चिररात्रेप्सितं कामं तद्भवान्कर्तुमर्हति ॥
7.39

अर्जुन ने पहले बड़ी ईमानदारी से कहा — "प्रभु, आप अकेले भी उन सबको मार सकते हैं, और मैं भी। पर आप जहाँ हैं, वहाँ यश अपने आप आता है। और मुझे भी यश चाहिए!"

और फिर असली बात — "प्रभु, मेरे मन में बहुत दिनों से एक इच्छा थी… कि आप मेरे सारथी बनें। मेरी ये पुरानी इच्छा पूरी कर दीजिए।"

और श्रीकृष्ण ने कहा — "ठीक है। मैं तुम्हारा सारथी बनूँगा।"

सोचिए, इस एक फ़ैसले से क्या हुआ। जगत का स्वामी, एक रथ की लगाम पकड़कर बैठा। और उसी रथ पर, कुरुक्षेत्र के बीच… गीता कही गई।

अगर अर्जुन ने सेना चुनी होती… तो हमारे पास गीता नहीं होती।

पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। क्योंकि यही अर्जुन, जिसने इतना सही फ़ैसला एक पल में ले लिया था… कुरुक्षेत्र में खड़े होकर, अपने गुरु और दादा को सामने देखकर… टूट गया।

धनुष हाथ से गिर गया। शरीर काँपने लगा। "लड़ूँ या न लड़ूँ? अपनों को मारकर क्या मिलेगा? क्या सही है, क्या ग़लत?" एक बड़े फ़ैसले का बोझ।

और तब अर्जुन ने वही किया, जो द्वारका में किया था।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
गीता 2.7

"मेरा स्वभाव कमज़ोरी से दब गया है। धर्म को लेकर मैं उलझ गया हूँ। जो सचमुच भला हो, वो मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ। आपकी शरण में हूँ। मुझे सिखाइए।"

द्वारका में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को चुना था। कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को अपना फ़ैसला सौंप दिया।

और फिर अठारह अध्याय। कर्म, ज्ञान, भक्ति, ध्यान। और आख़िर में भगवान ने क्या कहा?

तीसरी बात, जिस पर बहुत कम ध्यान जाता है —

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
18.63

"मैंने तुम्हें सब बता दिया। अब इस पर पूरा विचार करो… और जैसा तुम चाहो, वैसा करो।"

भगवान ने फ़ैसला छीना नहीं। अर्जुन को सोचने की पूरी आज़ादी दी। वो कभी हमें मजबूर नहीं करते।

पर फिर… जैसे कोई पिता, बेटे को सब समझाकर, आख़िर में उसका हाथ पकड़ ले —

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
18.64

"एक बार फिर सुनो, सबसे गुप्त बात। क्योंकि तुम मुझे बहुत प्यारे हो।"

"मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो। तुम मुझ तक पहुँचोगे — ये मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ। क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।"

सुनिए — भगवान दो बार कह रहे हैं, "तुम मुझे प्यारे हो।" शरण की बात कहने से पहले, प्यार जताते हैं। ताकि अर्जुन को डर न लगे कि वो कुछ खो रहा है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
18.66

"सब उलझनें छोड़कर… बस मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें हर पाप से छुड़ा लूँगा। मा शुचः। शोक मत करो।"

"मा शुचः।" पूरी गीता का आख़िरी वचन, अर्जुन के लिए। चिंता मत करो। बोझ मत उठाओ। मैं हूँ।

और अर्जुन ने क्या कहा?

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥
18.73

"मेरा मोह मिट गया। मुझे अपनी याद लौट आई। मैं खड़ा हूँ, बिना किसी संदेह के। आप जो कहेंगे, वही करूँगा।"

और उसने धनुष उठा लिया।

और ध्यान दीजिए — "मा शुचः" का मतलब ये नहीं कि अर्जुन के सामने की लड़ाई आसान हो गई। युद्ध वही था, सामने वही लोग थे। बस अब उसका बोझ अर्जुन अकेले नहीं उठा रहा था।

और फ़ैसले के बाद का पछतावा भी यहीं ख़त्म होता है। "काश वो वाली नौकरी ले लेता।" "काश उस दिन ऑपरेशन करा लेते।" जो फ़ैसला भगवान को सौंपकर लिया गया… उस पर फिर शोक नहीं। "मा शुचः।"

तो जब कोई फ़ैसला भारी लगे, तीन बातें याद रखिए।

पहली। पहले "किसे" चुनना है, ये तय कीजिए — फिर "क्या" अपने आप आसान होता है। अर्जुन ने सेना नहीं, सारथी चुना। जो भी फ़ैसला लें, भगवान को अपने रथ पर बिठाकर लें।

दूसरी। भगवान आपकी सोच नहीं छीनते। "यथेच्छसि तथा कुरु।" पूरा विचार कीजिए, सलाह लीजिए, हिसाब लगाइए। वो सब आपका काम है।

और तीसरी। और जब सब कर लिया… फिर भी मन काँपे… तो फ़ैसला उनके चरणों में रख दीजिए। "शाधि मां त्वां प्रपन्नम्" — मुझे सिखाइए, मैं आपकी शरण में हूँ। और फिर, जो भी हो, शोक मत कीजिए। "मा शुचः।"

तो आज रात, जब कोई फ़ैसला छत की तरह आपके ऊपर टँगा हो… जब इधर भी डर हो, उधर भी…

तो उस रथ को याद कीजिए, जिसकी लगाम स्वयं भगवान के हाथ में थी।

सब छोड़कर मेरी शरण… मा शुचः।

जय श्री कृष्ण।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
गीता 18.66

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.पहले "किसे" चुनना है, ये तय कीजिए — फिर "क्या" अपने आप आसान होता है। अर्जुन ने सेना नहीं, सारथी चुना। जो भी फ़ैसला लें, भगवान को अपने रथ पर बिठाकर लें।
  2. 2.भगवान आपकी सोच नहीं छीनते। "यथेच्छसि तथा कुरु।" पूरा विचार कीजिए, सलाह लीजिए, हिसाब लगाइए। वो सब आपका काम है।
  3. 3.और जब सब कर लिया… फिर भी मन काँपे… तो फ़ैसला उनके चरणों में रख दीजिए। "शाधि मां त्वां प्रपन्नम्" — मुझे सिखाइए, मैं आपकी शरण में हूँ। और फिर, जो भी हो, शोक मत कीजिए। "मा शुचः।"

इस सत्संग के श्लोक

गीता 18.66 उद्योग 7.9 7.20 7.22 7.23 7.39 गीता 2.7 18.63 18.64 18.66 18.73