दुःख माँगने वाली माँ
The mother who asked for sorrow — Kuntī asks for troubles, so that she keeps seeing Kṛṣṇa
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ॥
जय श्री कृष्ण।
कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसा दौर आता है… कि एक के बाद एक चोट लगती है। पहले नौकरी गई। फिर पिताजी बीमार पड़े। फिर गाड़ी का एक्सीडेंट। और जब लगा अब सँभल रहे हैं, तो घर में झगड़ा।
और अस्पताल के गलियारे में बैठे-बैठे, एक सवाल बार-बार मन में उठता है — "मेरे साथ ही क्यों? मैंने किसका क्या बिगाड़ा? भगवान, सब मेरे ही हिस्से में क्यों?"
ये सवाल पूछना ग़लत नहीं है। हम सबने पूछा है।
पर आज मैं आपको एक ऐसी स्त्री के बारे में बताऊँगा, जिसके हिस्से में शायद हम सबसे ज़्यादा दुःख आए… और जिसने भगवान से एक ऐसी चीज़ माँगी, जो सुनकर आप चौंक जाएँगे।
उसने माँगा… और दुःख।
महाभारत का युद्ध ख़त्म हो चुका है। अठारह दिन। लाखों लोग मारे गए। पाण्डव जीत गए हैं, पर किसी के चेहरे पर ख़ुशी नहीं।
सब गंगा किनारे आए हैं, अपने मरे हुए संबंधियों को जल देने। धृतराष्ट्र, गान्धारी — जिनके सौ बेटे गए। द्रौपदी — जिसके बेटे गए। और कुन्ती।
श्रीकृष्ण ने सबको सँभाला। समझाया कि काल सब पर चलता है। युधिष्ठिर को राज्य दिलाया। और अब, सब काम पूरा करके, वो द्वारका लौटने के लिए रथ पर चढ़े।
और तभी… एक युवती दौड़ती हुई आई। अभिमन्यु की विधवा, उत्तरा। गर्भवती। डर से काँपती हुई।
पाहि पाहि महायोगिन्देवदेव जगत्पते ।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम् ॥
"बचाइए! बचाइए, प्रभु! इस दुनिया में, जहाँ हर कोई एक-दूसरे की मौत बना है… आपके सिवा मुझे कोई अभय देने वाला नहीं दिखता। एक जलता हुआ बाण मेरी ओर आ रहा है। मुझे जला दे, पर मेरे गर्भ को बचा लीजिए।"
अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा था। पाण्डवों के वंश को मिटाने के लिए। और श्रीकृष्ण ने, अपनी माया से, उत्तरा के गर्भ को भीतर से ढक लिया। वो अस्त्र, जिसका कोई काट नहीं था… शांत हो गया।
वो बच्चा बचा। उसी से कुरुवंश आगे चला।
और अब… श्रीकृष्ण फिर जाने लगे।
तब कुन्ती आगे आईं। हाथ जोड़े। और जो स्तुति उन्होंने की, वो भागवत की सबसे प्रसिद्ध स्तुतियों में से एक है।
पर पहले एक बात जान लीजिए। ये पहली चौंकाने वाली बात है। कुन्ती, श्रीकृष्ण की कौन थीं?
भागवत बताता है — कुन्ती का असली नाम था पृथा। और वो वसुदेव की बहन थीं! यानी श्रीकृष्ण की सगी बुआ।
और बचपन में ही उनके पिता ने उन्हें अपने निःसंतान मित्र कुन्ति को दे दिया था। इसीलिए वो "कुन्ती" कहलाईं। अपने घर से बचपन में ही दूर।
अब सोचिए इस दृश्य को। एक बुआ… अपने भतीजे के सामने हाथ जोड़कर खड़ी है। क्योंकि वो जानती हैं, कि ये भतीजा कौन है।
और कुन्ती ने अपनी ज़िंदगी का हिसाब गिनाया।
विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शनादसत्सभाया वनवासकृच्छ्रतः ।
मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षिताः ॥
"प्रभु! विष से… बड़ी आग से… राक्षसों से… दुष्टों की सभा से… वनवास के कष्टों से… हर युद्ध में बड़े-बड़े महारथियों के अस्त्रों से… और अब अश्वत्थामा के अस्त्र से… हर बार, आपने हमें बचाया।"
सुनिए इस सूची को। ज़हर। आग। राक्षस। भरी सभा का अपमान। तेरह साल का वनवास। अठारह दिन का युद्ध। एक ज़िंदगी में।
अगर किसी को पूछने का हक़ था, "मेरे साथ ही क्यों?"… तो कुन्ती को था।
और फिर कुन्ती ने वो माँगा।
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥
"हे जगद्गुरु… हम पर विपत्तियाँ आती रहें। बार-बार। जहाँ-तहाँ।"
क्या? कोई माँ अपने बच्चों के लिए विपत्ति माँगेगी?
और फिर कारण बताया — "क्योंकि हर विपत्ति में… आपके दर्शन होते हैं। और आपके दर्शन के बाद, फिर जन्म नहीं लेना पड़ता।"
समझिए इस बात को। कुन्ती ने अपनी ज़िंदगी पीछे मुड़कर देखी। और उसे क्या दिखा? हर बड़ी विपत्ति के बीच में… श्रीकृष्ण खड़े थे। आग में, सभा में, वन में, युद्ध में।
सुख के दिनों में वो इतने पास नहीं दिखे थे। दुःख के दिनों में, हर बार, वही सामने थे।
इसलिए कुन्ती कहती है — अगर दुःख की क़ीमत तुम्हारा साथ है… तो वो क़ीमत मैं ख़ुशी से दूँगी।
और अगला श्लोक, दूसरी चौंकाने वाली बात —
जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान् ।
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम् ॥
"जिसका घमंड ऊँचे कुल से, ऐश्वर्य से, विद्या से, धन से बढ़ रहा है… वो आपका नाम भी नहीं ले पाता। आप तो उन्हें मिलते हैं, जिनके पास कुछ नहीं।"
सच है न? जब सब ठीक चल रहा हो, तो पूजा में दो मिनट भी भारी लगते हैं। "बाद में कर लेंगे।" और जब अस्पताल का गलियारा हो… तब पूरी रात हनुमान चालीसा चलती है।
कुन्ती कहती है — ये बुरा नहीं है। ख़ाली हाथ ही उन्हें पकड़ पाते हैं।
और फिर एक बात आती है जो "मेरे साथ ही क्यों" का सीधा उत्तर है —
न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम् ॥
"आपका न कोई ख़ास प्यारा है, न कोई दुश्मन। भेदभाव तो इंसानों की बुद्धि में है।"
यानी भगवान ने आपको चुनकर दुःख नहीं दिया। वो किसी से नाराज़ नहीं हैं। दुःख आया है, क्योंकि ये संसार है। पर उस दुःख में साथ कौन खड़ा होगा… ये उन्होंने चुना है।
और अब कुन्ती की स्तुति का सबसे प्यारा हिस्सा। तीसरी बात।
जो बुआ अभी-अभी भतीजे को "जगद्गुरु", "आदिपुरुष" कह रही थीं… अचानक उन्हें कुछ याद आता है। और वो मुस्कुरा देती हैं।
गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद्
या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम् ।
"प्रभु, मुझे वो दृश्य मोह लेता है… जब तुमने शरारत की थी, और यशोदा ने रस्सी उठाई थी। और तुम डरकर, मुँह नीचे किए खड़े थे… आँखों से आँसू बह रहे थे… और आँसुओं से काजल फैल गया था।"
फिर एक पंक्ति — "जिससे ख़ुद डर भी डरता है… वो एक माँ की रस्सी से डर गया!"
देखिए, कुन्ती क्या कह रही हैं। जो सारे जगत को बचाता है, वो भी एक माँ के प्यार में बँध जाता है। तो क्या वो आपके आँसू नहीं देखेगा?
और फिर कुन्ती का स्वर बदल जाता है। जैसे कोई बूढ़ी माँ स्टेशन पर बेटे की गाड़ी छूटते देख रही हो।
"प्रभु, क्या आज तुम हमें छोड़कर जा रहे हो? हमने सारे राजाओं से दुश्मनी मोल ले ली है। तुम्हारे चरणों के सिवा हमारा कोई सहारा नहीं।"
के वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।
भवतोऽदर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥
"तुम्हारे बिना हम पाण्डव क्या हैं? बस नाम और शरीर। जैसे आत्मा के चले जाने पर इन्द्रियाँ।"
जीत गए, राज्य मिल गया, सिंहासन मिल गया… और कुन्ती कह रही है, ये सब तुम्हारे बिना ख़ाली है।
और फिर कुन्ती ने अंतिम प्रार्थना की। सब कुछ खोने के बाद, एक माँ ने क्या माँगा?
त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत् ।
रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति ॥
"जैसे गंगा… बिना रुके, समुद्र की ओर बहती है… वैसे ही मेरा मन, किसी और ओर न जाकर, बस तुम्हारी ओर बहता रहे।"
अभी-अभी इसी गंगा के किनारे, उसने अपनों को जल दिया था। और उसी गंगा को देखकर, उसने ये माँगा।
और श्रीकृष्ण ने क्या किया?
पृथयेत्थं कलपदैः परिणूताखिलोदयः ।
मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया ॥
भगवान मंद-मंद मुस्कुराए। और बोले — "ठीक है।" और द्वारका जाने की बजाय… लौटकर हस्तिनापुर में ठहर गए।
जिसने दुःख माँगा था… उसे भगवान का साथ मिल गया।
तो जब मन पूछे, "मेरे साथ ही क्यों?" — तो तीन बातें।
पहली। अपनी ज़िंदगी को कुन्ती की तरह पीछे मुड़कर देखिए। हर बड़े दुःख के बीच, कोई न कोई हाथ आया था। कोई डॉक्टर, कोई दोस्त, कोई अचानक मिली मदद। उसे पहचानिए। वो वही थे।
दूसरी। भगवान ने आपको दुःख के लिए चुना नहीं है। "न यस्य कश्चिद्दयितः" — न कोई प्यारा, न कोई दुश्मन। पर दुःख में साथ देने के लिए उन्होंने आपको ज़रूर चुना है।
और तीसरी। हम कुन्ती जितने बड़े नहीं, कि दुःख माँगें। पर इतना तो माँग सकते हैं — "जो भी आए, उसमें तुम दिखते रहना। मेरा मन गंगा की तरह, तुम्हारी ओर बहता रहे।"
तो अगली बार, अस्पताल के उस गलियारे में… जब सवाल उठे, "मेरे साथ ही क्यों?"…
तो उस माँ को याद कीजिए, जिसने ज़हर, आग, अपमान, वनवास और युद्ध देखा… और फिर भी हाथ जोड़कर कहा —
"विपदः सन्तु… बस तुम दिखते रहना।"
जय श्री कृष्ण।
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.अपनी ज़िंदगी को कुन्ती की तरह पीछे मुड़कर देखिए। हर बड़े दुःख के बीच, कोई न कोई हाथ आया था। कोई डॉक्टर, कोई दोस्त, कोई अचानक मिली मदद। उसे पहचानिए। वो वही थे।
- 2.भगवान ने आपको दुःख के लिए चुना नहीं है। "न यस्य कश्चिद्दयितः" — न कोई प्यारा, न कोई दुश्मन। पर दुःख में साथ देने के लिए उन्होंने आपको ज़रूर चुना है।
- 3.हम कुन्ती जितने बड़े नहीं, कि दुःख माँगें। पर इतना तो माँग सकते हैं — "जो भी आए, उसमें तुम दिखते रहना। मेरा मन गंगा की तरह, तुम्हारी ओर बहता रहे।"