अनजाने में शिवरात्रि

A Śivarātri kept without knowing — A hunter in a tree drops bilva leaves all night, and Śiva is pleased

The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.

अज्ञानात्स व्रतं चैतत् कृत्वा सायुज्यमाप्तवान्।
शिव पुराण, कोटिरुद्र 40.97

हर हर महादेव।

शिवरात्रि का दिन। फ़ोन खोला, तो हर तरफ़ तस्वीरें। किसी ने रुद्राभिषेक कराया, पंडित जी पूरे विधि-विधान से। किसी ने चारों प्रहर की पूजा की, सब मंत्र कंठस्थ। किसी ने ग्यारह किलो दूध चढ़ाया।

और आप? ऑफ़िस से थककर लौटे। मंदिर गए, तो भीड़ में धक्के खाते हुए, बस एक लोटा जल चढ़ा पाए। मंत्र? याद ही नहीं। "ॐ नमः शिवाय" के आगे कुछ आता नहीं।

और मन में एक छोटी-सी आवाज़ — "मेरी पूजा तो पूजा ही नहीं है। मुझे तो विधि भी नहीं आती। भोलेनाथ मेरी क्या सुनेंगे?"

आज की कथा उसी आवाज़ का जवाब है। एक ऐसे आदमी की कथा, जिसे ये भी नहीं पता था कि आज शिवरात्रि है।

बहुत पुराने समय की बात है। एक घने जंगल में एक भील रहता था। नाम था — गुरुद्रुह।

पुरा कश्चिद्वने भिल्लो नाम्ना ह्यासीद् गुरुद्रुहः। कुटुम्बी बलवान्क्रूरः क्रूरकर्मपरायणः॥
40.4

बलवान। कठोर। रोज़ जंगल जाकर हिरन मारता था। चोरी भी करता था। शिव पुराण साफ़ कहता है — बचपन से उसने एक भी शुभ काम नहीं किया था।

पर उसका एक परिवार था। बूढ़े माँ-बाप, पत्नी, बच्चे। सब उसी पर निर्भर।

और एक दिन… शिवरात्रि आई। पर उस जंगल में रहने वाले भील को पता ही नहीं था।

उस दिन घर में खाने को कुछ नहीं था। भूखे माँ-बाप और पत्नी ने कहा — "कुछ खाने को लाओ।"

वो धनुष उठाकर निकल पड़ा। पूरा जंगल छान मारा। और उस दिन… एक भी शिकार नहीं मिला। सूरज डूब गया।

वो बहुत दुखी हुआ। "मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? घर में बच्चे भूखे हैं, माँ-बाप भूखे हैं। ख़ाली हाथ घर नहीं जा सकता।"

सोचिए। कोई भक्ति नहीं। कोई व्रत नहीं। बस एक पिता, एक बेटा, जो ख़ाली हाथ घर नहीं लौटना चाहता।

वो एक तालाब के पास गया। जहाँ जानवर पानी पीने आते थे। सोचा, "यहाँ ज़रूर कोई आएगा।"

इति मत्वा स वै वृक्षमेकं बिल्वेति संज्ञकम्। समारुह्य स्थितस्तत्र जलमादाय भिल्लकः॥
40.15

थोड़ा पानी साथ लिया, और पास के एक पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। वो पेड़ था — बेल का पेड़।

भूखा। प्यासा। रात भर जागता हुआ, शिकार की राह में।

और अब पहली बात, जो उसे नहीं पता थी। उस पेड़ के ठीक नीचे… एक शिवलिंग था।

रात का पहला प्रहर। एक हिरनी आई, प्यासी, डरी हुई। भील ख़ुश हुआ। झट से धनुष पर बाण चढ़ाया।

इत्येवं कुर्वतस्तस्य जलं बिल्वदलानि च। पतितानि ह्यधस्तत्र शिवलिङ्गमभूत्ततः॥
40.19

और बाण चढ़ाते हुए, हिलने से… उसके पानी में से कुछ बूँदें और कुछ बेलपत्र… नीचे गिर पड़े। सीधे शिवलिंग पर।

यामस्य प्रथमस्यैव पूजा जाता शिवस्य च।
40.20

शिव पुराण कहता है — इस तरह, पहले प्रहर की शिव-पूजा हो गई। बिना मंत्र। बिना विधि। बिना इरादे के।

हिरनी ने आवाज़ सुनी, ऊपर देखा। "शिकारी! तुम क्या करना चाहते हो?"

"मेरा परिवार भूखा है। तुझे मारकर उन्हें खिलाऊँगा।"

और हिरनी ने जो कहा, वो सुनिए। "अगर मेरे इस शरीर से तुम्हारे परिवार का पेट भरता है, तो मैं धन्य हूँ। पर मेरे बच्चे घर पर अकेले हैं। उन्हें किसी को सौंपकर, मैं लौट आऊँगी। वचन देती हूँ।"

स्थिता सत्येन धरणी सत्येनैव च वारिधिः। सत्येन जलधाराश्च सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
40.29

"सत्य से धरती टिकी है। सत्य से समुद्र टिका है। सत्य से ही बादल बरसते हैं। सब कुछ सत्य पर टिका है।"

पर भील इतनी आसानी से कहाँ मानने वाला! "चली जाएगी, फिर नहीं आएगी।" तो हिरनी ने शपथें खाईं। एक के बाद एक, जैसे कचहरी में हलफ़नामा भर रही हो — "अगर न लौटूँ, तो मुझे कृतघ्न का पाप लगे। विश्वासघाती का पाप लगे। धर्म तोड़ने वाले का पाप लगे।"

तब भील ने भरोसा किया। जाने दिया।

दूसरा प्रहर। उसकी बहन आई, दूसरी हिरनी, उसे ढूँढते हुए। फिर बाण चढ़ा, फिर पानी और बेलपत्र गिरे। दूसरे प्रहर की पूजा हो गई। और उसने भी वही कहा — "बच्चों को सौंपकर लौट आऊँगी।"

तीसरा प्रहर। एक हट्टा-कट्टा हिरन आया। फिर बाण, फिर पत्ते। तीसरे प्रहर की पूजा।

और हिरन बोला — "मैं धन्य हूँ! आज तुम्हारा परिवार तृप्त होगा।"

यस्याङ्गं नोपकारार्थं तस्य सर्वं वृथा गतम्॥
40.56

"जिसका शरीर किसी के काम न आए… उसका सब कुछ बेकार गया। बस, बच्चों को उनकी माँ के पास छोड़कर आता हूँ।"

अब भील हँसा होगा। "जो आया, सबने यही कहा, और कोई नहीं लौटा।" पर उसने उसे भी जाने दिया।

और फिर… चौथा प्रहर। भोर होने वाली है।

और तालाब के रास्ते पर… तीनों आते दिखे। दोनों हिरनियाँ और हिरन। वचन निभाने।

शिव पुराण बताता है, घर पर तीनों में बहस हुई थी। हिरनी बोली, "मैंने वचन दिया है, मैं जाऊँगी।" छोटी बोली, "नहीं, मैं जाऊँगी।" हिरन बोला, "बच्चों को माँ चाहिए, मैं जाऊँगा।" और आख़िर में तीनों चल पड़े।

ते बाला अपि सर्वे वै विलोक्यानु समागताः। एतेषां या गतिः स्याद्वै ह्यस्माकं सा भवत्विति॥
40.76

और पीछे-पीछे… उनके छोटे-छोटे बच्चे भी चले आए। "जो इनका होगा, वही हमारा।"

भील ने बाण चढ़ाया। और चौथी बार… पानी और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे। चौथे प्रहर की पूजा पूरी हुई।

रात भर जागरण। रात भर बिना खाए। चारों प्रहर की पूजा। शिवरात्रि का पूरा व्रत… अनजाने में।

और तीनों बोले — "आओ शिकारी, हमारे शरीर को सफल करो।"

और उस पल… भील के अंदर कुछ बदल गया। शिव पुराण कहता है, शिव-पूजा के प्रभाव से उसे दुर्लभ ज्ञान हुआ।

मानुष्यं जन्म संप्राप्य साधितं किं मयाधुना। परकायं च संपीड्य शरीरं पोषितं मया॥
40.82

"मनुष्य का जन्म पाकर मैंने आज तक क्या किया? दूसरों के शरीर को दुःख देकर, अपना शरीर पाला। ये जानवर… बिना ज्ञान के भी… अपने शरीर से दूसरों का भला कर रहे हैं।"

गम्यतां च मृगश्रेष्ठा धन्याः स्थ इति चाब्रवीत्॥
40.85

और उसने बाण उतार दिया। "जाओ। तुम धन्य हो।"

और उसी पल… भगवान शंकर प्रकट हुए!

उन्होंने उस भील को प्यार से छुआ। "मैं इस व्रत से प्रसन्न हूँ। वर माँगो।"

और भील उनके चरणों में गिर पड़ा। "प्रभु, मुझे सब मिल गया।"

और अब दूसरी बात, जो सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे। शिवजी ने उसे एक नया नाम दिया। "गुह।"

गृहे रामस्तव व्याध समायास्यति निश्चितम्॥
40.91

"शृंगवेरपुर में तुम्हारी राजधानी होगी। और सुनो, व्याध — एक दिन तुम्हारे घर स्वयं श्रीराम आएँगे। और तुमसे मित्रता करेंगे!"

वही गुह, निषादों का राजा, जिसने वनवास जाते श्रीराम का शृंगवेरपुर में स्वागत किया, और उन्हें गंगा पार कराई। शिव पुराण कहता है, वो गुह… यही भील था। एक अनजानी शिवरात्रि का फल।

और वो हिरन परिवार? भगवान के दर्शन से वो भी मुक्त होकर, दिव्य शरीर पाकर, स्वर्ग चले गए। और शिवजी वहाँ "व्याधेश्वर" नाम से प्रकट हुए।

अब तीसरी बात, जो शिव पुराण ख़ुद कहता है —

अज्ञानात्स व्रतं चैतत् कृत्वा सायुज्यमाप्तवान्। किं पुनर्भक्तिसंपन्ना यान्ति तन्मयतां शुभाम्॥
40.97

"उसने अनजाने में ये व्रत किया, और शिव में मिल गया। तो जो भक्ति से करते हैं… उनकी क्या बात!"

और ये भी देखिए — रात भर भूखा जागा, क्योंकि शिकार की राह देख रहा था। पर गिनती हुई "उपवास" और "जागरण" की! भोलेनाथ ने ये नहीं पूछा कि क्यों जागे थे। बस ये देखा कि मेरे पास जागे थे।

सोचिए, कैसा भोला है भोलेनाथ का हिसाब। पानी गिरा — गिनती हुई। पत्ता गिरा — गिनती हुई। रात भर भूखे जागे — गिनती हुई। नीयत पूजा की नहीं थी, फिर भी पूजा मान ली गई।

तो जिन्हें लगता है, "मुझे पूजा-विधि नहीं आती," उनके लिए तीन बातें।

पहली। विधि सीखिए, अच्छी बात है। पर विधि न आने से रुकिए मत। एक लोटा जल, एक बेलपत्र, एक "ॐ नमः शिवाय"। भोलेनाथ के लिए इतना काफ़ी है।

दूसरी। अपने वचन को सत्य रखिए। उस रात सबसे बड़ी पूजा पत्तों की नहीं थी। उन जानवरों के सत्य की थी, जो मरने के लिए भी वचन निभाने लौटे।

और तीसरी। जो काम आप परिवार के लिए करते हैं, ईमानदारी से… वो भी बेकार नहीं जाता। वो भील अपने भूखे बच्चों के लिए पेड़ पर बैठा था। और भगवान ने उसी पेड़ के नीचे उसका इंतज़ार किया।

तो अगली शिवरात्रि पर, जब फ़ोन पर बड़ी-बड़ी पूजाओं की तस्वीरें देखें… और अपना छोटा-सा लोटा हाथ में हो…

तो उस बेल के पेड़ को याद कीजिए।

अनजाने में गिरा एक पत्ता… और भगवान ने उसे शिवरात्रि मान लिया।

हर हर महादेव।

अज्ञानात्स व्रतं चैतत् कृत्वा सायुज्यमाप्तवान्। किं पुनर्भक्तिसंपन्ना यान्ति तन्मयतां शुभाम्॥
शिव पुराण, कोटिरुद्र 40.97

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.विधि सीखिए, अच्छी बात है। पर विधि न आने से रुकिए मत। एक लोटा जल, एक बेलपत्र, एक "ॐ नमः शिवाय"। भोलेनाथ के लिए इतना काफ़ी है।
  2. 2.अपने वचन को सत्य रखिए। उस रात सबसे बड़ी पूजा पत्तों की नहीं थी। उन जानवरों के सत्य की थी, जो मरने के लिए भी वचन निभाने लौटे।
  3. 3.जो काम आप परिवार के लिए करते हैं, ईमानदारी से… वो भी बेकार नहीं जाता। वो भील अपने भूखे बच्चों के लिए पेड़ पर बैठा था। और भगवान ने उसी पेड़ के नीचे उसका इंतज़ार किया।

इस सत्संग के श्लोक

शिव पुराण, कोटिरुद्र 40.97 40.4 40.15 40.19 40.20 40.29 40.56 40.76 40.82 40.85 40.91 40.97