एक बाण, उम्र भर का बोझ
One arrow, a lifetime’s burden — Daśaratha’s arrow that killed a blind couple’s son
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क्षत्रियोऽहं दशरथो नाहं पुत्रो महात्मनः ।
जय श्री राम।
हम सबके भीतर एक बंद संदूक़ होता है।
उसमें कोई पुरानी ग़लती रखी होती है। बरसों पुरानी। कॉलेज के दिनों में किसी का दिल दुखाया था। जवानी के जोश में गाड़ी तेज़ चलाई, और किसी को चोट लगी। किसी के भरोसे को तोड़ा। माँ-बाप से कोई बात कही, जो अब वापस नहीं ली जा सकती।
दिन में हम उसे भूल जाते हैं। पर रात को, जब नींद नहीं आती, वो संदूक़ अपने आप खुल जाता है।
आज उस राजा की कथा, जिसने जवानी में एक बाण चलाया था। और वो बाण, बरसों बाद, लौटकर उसी के दिल में लगा।
राजा दशरथ। श्रीराम वन जा चुके हैं। और ये छठी रात है। आधी रात। राजा सो नहीं पा रहे।
और उस रात दशरथ ने कौसल्या से वो बात कही, जो शायद उन्होंने कभी किसी से नहीं कही थी।
पहले एक मिसाल दी — "कोई आदमी आम का बाग़ काटकर पलाश के पेड़ सींचता है। पलाश के लाल-लाल फूल देखकर सोचता है, क्या शानदार फल आएँगे! और जब फल आने का समय आता है… तो पछताता है।"
सोऽहमाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च न्यषेचयम् ।
रामं फलागमे त्यक्त्वा पश्चाच्छोचामि दुर्मतिः ॥
"कौसल्या, मैं वही हूँ। मैंने आम का बाग़ काटकर पलाश सींचे। फल के समय मैंने राम को त्याग दिया। और अब पछता रहा हूँ।"
पलाश के फूल बहुत सुंदर होते हैं, लाल-लाल, आग जैसे। पर उनसे खाने लायक़ फल नहीं आता। जवानी में हम भी अक्सर पलाश के फूलों के पीछे भागते हैं — दिखावा, जोश, नाम। और आम के बाग़ — रिश्ते, धीरज, सच — काट देते हैं।
और फिर बोले — "ये दुख मेरा अपना कमाया हुआ है। सुनो, कैसे।"
"तब तुम्हारा विवाह भी नहीं हुआ था। मैं युवराज था। और मेरी एक ख़ास बात मशहूर थी — मैं आवाज़ सुनकर निशाना लगा लेता था। 'शब्दवेधी'।"
जवानी का घमंड! अँधेरे में भी बस आवाज़ सुनी, और बाण छोड़ दिया।
बरसात का मौसम था। सुहावना। मैं धनुष-बाण लेकर रथ पर सरयू के किनारे गया। सोचा, रात में घाट पर कोई भैंसा, कोई हाथी पानी पीने आएगा, उसे मारूँगा।
अँधेरा था। कुछ दिख नहीं रहा था। तभी पानी में घड़ा भरने की आवाज़ आई। गुड़-गुड़-गुड़। मुझे लगा, हाथी पानी पी रहा है।
मैंने बाण निकाला। आवाज़ की ओर निशाना साधा। और छोड़ दिया।
और अँधेरे से एक इंसानी आवाज़ आई — "हाय! हाय! मुझ जैसे तपस्वी पर कौन बाण चलाएगा? मैं तो रात में पानी लेने आया था। मैंने किसका क्या बिगाड़ा है?"
दशरथ के हाथ से धनुष-बाण ज़मीन पर गिर पड़ा।
भागकर किनारे पहुँचे। एक युवा तपस्वी। जटाएँ बिखरी। घड़े का पानी बिखरा। धूल और ख़ून से सना शरीर।
और उसने जो पहली बात कही, वो अपने लिए नहीं थी —
एकेन खलु बाणेन मर्मण्यभिहते मयि ।
द्वावन्धौ निहतौ वृद्धौ माता जनयिता च मे ॥
"राजा, तुम्हारे एक बाण ने… दो और लोगों को मार दिया। मेरे बूढ़े, अंधे माँ-बाप। वो प्यासे बैठे हैं, मेरी राह देख रहे हैं।"
"मुझे अपनी मौत का उतना दुख नहीं। मुझे उनका दुख है। अब उन्हें कौन पालेगा?"
और अब पहली अद्भुत बात। मरता हुआ लड़का उस राजा पर दया करता है, जिसने उसे मारा! वो देखता है कि राजा डरा हुआ है, अपराध-बोध से कांप रहा है। तो कहता है — "राजा, ब्रह्महत्या का डर मन से निकाल दो। मैं ब्राह्मण नहीं हूँ।" और फिर — "ये पगडंडी मेरे पिता के आश्रम तक जाती है। जाओ, उन्हें बता दो। उन्हें मना लो, ताकि वो तुम्हें शाप न दें।"
और फिर कहा, "ये बाण निकाल दो।" दशरथ ने बाण निकाला… और उस तपस्वी ने डरी हुई आँखों से उन्हें देखा, और प्राण छोड़ दिए।
अब दशरथ के सामने दो रास्ते थे। चुपचाप रथ में बैठकर अयोध्या लौट जाना। कौन देख रहा था? अँधेरी रात थी।
या उस पगडंडी पर जाना।
दशरथ ने पानी से भरा घड़ा उठाया। और पगडंडी पर चल पड़े।
आश्रम में दो बूढ़े बैठे थे। अंधे। दुबले। वाल्मीकि कहते हैं — जैसे पंख कटे दो पक्षी। और क़दमों की आहट सुनकर पिता बोले —
त्वं गतिस्त्वगतीनां च चक्षुस्त्वं हीनचक्षुषाम् ।
"बेटा, इतनी देर क्यों? पानी में खेलने लगे थे क्या? तेरी माँ घबरा रही है। तू ही तो हम बेसहारों का सहारा है। हम अंधों की आँख है। बोलता क्यों नहीं?"
और दशरथ खड़े रहे। हाथ में घड़ा। गले में आवाज़ अटकी हुई।
और फिर दशरथ ने वो किया, जो सबसे कठिन होता है। सच बोला।
क्षत्रियोऽहं दशरथो नाहं पुत्रो महात्मनः ।
सज्जनावमतं दुःखमिदं प्राप्तं स्वकर्मजम् ॥
"महात्मन्, मैं आपका बेटा नहीं हूँ। मैं दशरथ हूँ। एक क्षत्रिय। और ये दुख मेरे अपने कर्म से आया है।"
और पूरी बात बता दी। कुछ नहीं छिपाया। "अनजाने में, जल्दबाज़ी में, मैंने आपके बेटे को मार दिया। अब जो भी हो, आप मुझ पर कृपा करें।"
और अब दूसरी चौंकाने वाली बात। बूढ़े ऋषि ने रोते हुए जो पहली बात कही —
यद्येतदशुभं कर्म न त्वं मे कथयेः स्वयम् ।
फलेन्मूर्धा स्म ते राजन्सद्यः शतसहस्रधा ॥
"राजा, अगर तुमने ये बात ख़ुद आकर न बताई होती… तो तुम्हारा सिर अभी हज़ार टुकड़ों में फट जाता।"
सुना आपने? सच बोलने ने दशरथ की जान बचाई। ग़लती बड़ी थी। पर उसे ख़ुद मान लेना… उससे भी बड़ा था।
फिर दोनों बूढ़ों ने कहा, "हमें वहाँ ले चलो। हम अपने बेटे को आख़िरी बार छूना चाहते हैं।" दशरथ उन्हें ले गए। उन्होंने बेटे को छुआ, उसके ऊपर गिर पड़े।
"बेटा, आज प्रणाम क्यों नहीं करता? नाराज़ है क्या? रात के पिछले पहर कौन मुझे मीठे स्वर में पाठ सुनाएगा? कौन कंद-मूल लाकर खिलाएगा?"
और उसी समय, वो युवा तपस्वी दिव्य रूप में, इन्द्र के साथ, स्वर्ग से प्रकट हुआ। और माँ-बाप को तसल्ली दी — "आपकी सेवा से मुझे बड़ा स्थान मिला है। आप भी जल्दी मेरे पास आएँगे।"
फिर पिता ने दशरथ से कहा — "जैसे आज मैं बेटे के वियोग में मर रहा हूँ… वैसे ही, राजा, तुम भी बेटे के शोक में मरोगे।" और दोनों ने चिता पर देह त्याग दी।
और अब, बरसों बाद, उस छठी रात… दशरथ कौसल्या से कहते हैं — "वो शाप आज सच हो रहा है।"
"कौसल्या, मुझे तुम दिखाई नहीं दे रहीं। मुझे छुओ।" "काश राम मुझे एक बार छू ले।" और आधी रात के बाद… राजा दशरथ चले गए।
पर एक बात देखिए। मरते हुए भी दशरथ ने किसी और पर दोष नहीं डाला। कहा — "राम के साथ मैंने जो किया, वो मेरे लायक़ था। और राम ने मेरे साथ जो किया, वो उसके लायक़ था।" यानी, "ग़लती मेरी। राम निर्दोष।"
एतन्मे सदृशं देवि यन्मया राघवे कृतम् ।
सदृशं तत्तु तस्यैव यदनेन कृतं मयि ॥
जो आदमी जवानी में अँधेरे में बाण चला बैठा था… वो बुढ़ापे में, आख़िरी साँसों में, राम के बारे में भी बिना बहाने के अपनी ग़लती मान रहा था। यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
अब इस पुराने बोझ का क्या करें? गीता में भगवान कहते हैं —
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥
"अगर तुम सबसे बड़े पापी भी हो… तो भी ज्ञान की नाव से सारे पाप पार कर जाओगे।"
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
"जैसे जलती आग लकड़ियों को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की आग कर्मों को।" बोझ कितना भी पुराना हो, भगवान के पास उसे जलाने की आग है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। अपनी ग़लती ख़ुद मान लीजिए। दशरथ अँधेरे में लौट सकते थे। वो पगडंडी पर गए। और ऋषि ने कहा — "ख़ुद न बताते, तो सिर फट जाता।" जो ग़लती छिपाई जाती है, वो भीतर फटती है।
दूसरी। जिसे चोट पहुँचाई, उसके परिवार तक पहुँचिए। दशरथ पानी का घड़ा लेकर उन माँ-बाप तक गए। आज भी देर नहीं हुई है। एक फ़ोन, एक मुलाक़ात, एक "माफ़ कीजिए"। और जो लौटाया जा सके, लौटाइए।
और तीसरी। बोझ को भगवान को सौंप दीजिए। दशरथ का बाण अनजाने में चला था, फिर भी बोझ उम्र भर रहा। रोज़ भगवान से कहिए — "मेरा ये संदूक़ आपके चरणों में है।" ज्ञान की आग उसे राख कर देगी।
तो आज रात, जब वो पुराना संदूक़ फिर खुले… जब कोई पुरानी ग़लती नींद उड़ा दे…
तो सरयू के उस किनारे को याद कीजिए। अँधेरी रात। बिखरा घड़ा। और एक युवराज, जो भाग सकता था… पर पानी का घड़ा उठाकर पगडंडी पर चल पड़ा।
"मैं आपका बेटा नहीं हूँ… मैं दशरथ हूँ।" सच का पहला शब्द ही बोझ का पहला हल्कापन है।
जय श्री राम।
यद्येतदशुभं कर्म न त्वं मे कथयेः स्वयम् ।
फलेन्मूर्धा स्म ते राजन्सद्यः शतसहस्रधा ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.अपनी ग़लती ख़ुद मान लीजिए। दशरथ अँधेरे में लौट सकते थे। वो पगडंडी पर गए। और ऋषि ने कहा — "ख़ुद न बताते, तो सिर फट जाता।" जो ग़लती छिपाई जाती है, वो भीतर फटती है।
- 2.जिसे चोट पहुँचाई, उसके परिवार तक पहुँचिए। दशरथ पानी का घड़ा लेकर उन माँ-बाप तक गए। आज भी देर नहीं हुई है। एक फ़ोन, एक मुलाक़ात, एक "माफ़ कीजिए"। और जो लौटाया जा सके, लौटाइए।
- 3.बोझ को भगवान को सौंप दीजिए। दशरथ का बाण अनजाने में चला था, फिर भी बोझ उम्र भर रहा। रोज़ भगवान से कहिए — "मेरा ये संदूक़ आपके चरणों में है।" ज्ञान की आग उसे राख कर देगी।