बहुत देर हो गई?

Is it too late? — Ajāmila calls his son “Nārāyaṇa”, and Yama’s messengers turn back

पछतावा 18 Oct 2026 · 12 min
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क्व चाहं कितवः पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रपः । क्व च नारायणेत्येतद्भगवन्नाम मङ्गलम् ॥
भागवत 6.2.34

जय श्री कृष्ण।

रात के दो बजे हैं। नींद नहीं आ रही। और दिमाग़ में एक फ़िल्म चल रही है। पुरानी फ़िल्म।

वो बात जो माँ को कही थी, और फिर कभी माफ़ी नहीं माँगी। वो पैसा जो ग़लत तरीक़े से आया। वो दोस्त जिसका भरोसा तोड़ा। वो साल, जो बस यूँ ही बर्बाद कर दिए।

और फिर एक आवाज़ आती है — "अब क्या फ़ायदा? बहुत देर हो गई। भगवान भी अब क्या सुनेंगे, इतने पापों के बाद?"

अगर ये आवाज़ आपने कभी सुनी है… तो आज की कथा आपके लिए है। ये एक ऐसे आदमी की कथा है, जिसके पास सचमुच देर हो चुकी थी। अट्ठासी साल की देर।

कान्यकुब्ज नगर में एक ब्राह्मण रहता था। नाम था अजामिल।

और पहली चौंकाने वाली बात — वो शुरू से बुरा नहीं था! भागवत कहता है, जवानी में वो बड़ा विद्वान था। सच बोलने वाला। माता-पिता की सेवा करने वाला। गुरु, अतिथि, बड़ों का आदर करने वाला। कम बोलता था, किसी में दोष नहीं ढूँढता था।

एक अच्छा लड़का। जैसे हमारे घरों में होते हैं।

एक दिन पिता ने उसे जंगल भेजा — फल, फूल, कुश लाने। लौटते समय रास्ते में उसने एक दृश्य देखा। एक आदमी, एक स्त्री के साथ, नशे में, हँसता-गाता हुआ। और उस एक पल में… उसका मन फिसल गया।

भागवत ईमानदारी से बताता है — उसने अपने आप को रोकने की पूरी कोशिश की। पर मन नहीं रुका।

और फिर एक-एक करके सब छूटता गया। पिता का दिया धन उसी में गया। अपनी युवा पत्नी को छोड़ दिया। और सबसे दर्दनाक — बूढ़े माता-पिता, जिनका कोई और सहारा नहीं था… उन्हें भी छोड़ दिया।

फिर रोज़ी के लिए क्या किया? लोगों को बाँधकर लूटना। जुआ। छल। चोरी।

एक पल की फिसलन। और पूरी ज़िंदगी की ढलान।

ये किसी की भी कहानी हो सकती है। एक बुरी संगत। एक लत। एक ग़लत फ़ैसला। और फिर लौटने का रास्ता दिखना बंद हो जाता है।

अब उसी घर में बच्चे हुए। दस बेटे। और सबसे छोटा… बूढ़े पिता की आँखों का तारा।

तस्य प्रवयसः पुत्रा दश तेषां तु योऽवमः । बालो नारायणो नाम्ना पित्रोश्च दयितो भृशम् ॥
6.1.24

उस छोटे बच्चे का नाम था — नारायण।

तोतली बोली बोलता था। बूढ़ा अजामिल उसके खेल देखकर निहाल हो जाता। ख़ुद खाता, तो उसे खिलाता। ख़ुद पीता, तो उसे पिलाता। "नारायण, इधर आ!" "नारायण, खाना खा ले!" "नारायण, कहाँ गया?"

दिन में सौ बार। पर भगवान के लिए नहीं — बेटे के लिए।

और भागवत कहता है — उस प्यार में डूबे बूढ़े को पता ही नहीं चला… कि मृत्यु दरवाज़े पर आ चुकी है।

अट्ठासी साल की उम्र। आख़िरी घड़ी।

और उसने देखा — तीन भयानक आकृतियाँ। हाथ में फंदे। टेढ़े मुँह, खड़े रोंगटे। यम के दूत। उसे ले जाने आए थे।

वो घबरा गया। और उस घबराहट में उसकी नज़र गई… दूर खेलते अपने छोटे बेटे पर।

दूरे क्रीडनकासक्तं पुत्रं नारायणाह्वयम् । प्लावितेन स्वरेणोच्चैराजुहावाकुलेन्द्रियः ॥
6.1.29

काँपती, खिंची हुई आवाज़ में… ज़ोर से पुकारा —

"नारायण…!"

बेटे को बुलाया था। बस बेटे को।

निशम्य म्रियमाणस्य ब्रुवतो हरिकीर्तनम् । भर्तुर्नाम महाराज पार्षदाः सहसाऽपतन् ॥
6.1.30

और "सहसा" — उसी क्षण — भगवान विष्णु के चार पार्षद वहाँ उतर आए! मरते हुए आदमी के मुँह से अपने स्वामी का नाम सुना… और दौड़े चले आए।

यमदूत अजामिल को खींच रहे थे। पार्षदों ने ज़ोर से रोक दिया — "रुको!"

अब जो बहस हुई, वो बड़ी दिलचस्प है।

यमदूत बोले — "तुम कौन हो? धर्मराज का आदेश रोकने वाले? ये आदमी पापी है! इसने पत्नी छोड़ी, माता-पिता छोड़े, चोरी की, लूटा। कोई प्रायश्चित्त नहीं किया। इसे दंड मिलेगा।"

और पार्षदों ने मुस्कुराकर कहा —

एतेनैव ह्यघोनोऽस्य कृतं स्यादघनिष्कृतम् । यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम् ॥
6.2.8

"इसने प्रायश्चित्त कर लिया है। जिस पल इसने 'ना-रा-य-ण' — ये चार अक्षर कहे… उसी पल।"

यमदूत बोले होंगे — पर इसने तो बेटे को पुकारा था!

पार्षदों का उत्तर सुनिए —

साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥
6.2.14

"भगवान का नाम किसी और को बुलाने में लिया जाए, मज़ाक़ में लिया जाए, गाने की तान में, या लापरवाही से भी… वो सारे पाप हर लेता है।"

और एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया। दवा। अच्छी दवा अगर अनजाने में भी पी ली जाए, तो असर करती है। दवा ये नहीं पूछती कि पीने वाले को उसका नाम पता था या नहीं।

नाम भी ऐसा ही है।

यमदूत लौट गए। अजामिल ज़मीन पर पड़ा था। ज़िंदा। उसने पार्षदों को प्रणाम किया, कुछ कहना चाहा… और वो अंतर्धान हो गए।

अब दूसरी चौंकाने वाली बात। अजामिल उस दिन मरा नहीं! उसे समय मिला। एक दूसरा मौक़ा।

और पहली बार, अट्ठासी साल में पहली बार… वो रोया। अपने लिए नहीं। उन बूढ़े माता-पिता के लिए, जिन्हें उसने छोड़ दिया था। उस पत्नी के लिए। और फिर उसने वो बात कही —

क्व चाहं कितवः पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रपः । क्व च नारायणेत्येतद्भगवन्नाम मङ्गलम् ॥
6.2.34

"कहाँ मैं — छली, पापी, बेशर्म… और कहाँ ये मंगल नाम, 'नारायण'! ये मेरी जीभ पर आया कैसे?"

उसने सब छोड़ा। गंगाद्वार गया। एक मंदिर में बैठकर मन को भगवान में लगाया। और जब समय आया, वही चार पार्षद फिर आए। इस बार उसे लेने। सोने के विमान में… उस धाम तक, जहाँ लक्ष्मीपति रहते हैं।

और अब तीसरी बात — मेरे हिसाब से इस पूरी कथा की सबसे अद्भुत बात।

हारे हुए यमदूत अपने स्वामी यमराज के पास गए। शिकायत की — "महाराज, आपका दंड अब चलता नहीं! चार लोग आए, बोले 'मत डरो', और फंदे काट दिए। बस 'नारायण' सुनते ही!"

और यमराज ने क्या कहा? मृत्यु के देवता ने?

वो नाराज़ नहीं हुए। उन्होंने मन में भगवान के चरणों को याद किया, और बोले — "मुझसे ऊपर एक और हैं। सारा जगत उनमें ऐसे बुना है, जैसे कपड़े में धागा।"

और फिर यमराज ने बारह नाम गिनाए — जो भगवान के इस गुप्त धर्म को सचमुच जानते हैं। ब्रह्मा, नारद, शंकर, सनत्कुमार, कपिल, मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, शुकदेव… और बारहवाँ नाम? "और मैं।" यमराज स्वयं!

मृत्यु के देवता ख़ुद भक्त हैं। और उन्होंने अपने दूतों को एक आदेश दिया —

तान् नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान् ।
6.3.27

"जो भगवान की शरण में हैं… उनके पास जाना भी मत। वो हरि की गदा से सुरक्षित हैं। उन्हें दंड देने की ताक़त न हममें है, न काल में।"

और फिर… यमराज ने हाथ जोड़े। और अपने दूतों की ग़लती के लिए स्वयं भगवान से माफ़ी माँगी —

तत् क्षम्यतां स भगवान् पुरुषः पुराणो नारायणः स्वपुरुषैर्यदसत्कृतं नः ।
6.3.30

"हे नारायण, मेरे सेवकों ने जो भूल की, उसे क्षमा करें। हम आपके ही हैं, अनजान हैं, हाथ जोड़े खड़े हैं।"

सोचिए। एक पापी के लिए… मृत्यु के देवता ने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी।

और भागवत कहता है — उस दिन से यमदूत, भगवान के शरणागतों की ओर देखने से भी डरते हैं।

भगवान ने गीता में यही वचन दिया है —

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
गीता 9.30

"कोई बहुत बुरे आचरण वाला भी हो… पर अगर वो पूरे मन से मुझे भजने लगे, तो उसे साधु ही मानो। क्योंकि उसने सही निर्णय कर लिया है।"

"सम्यग्व्यवसितः" — सही फ़ैसला। भगवान बीता हुआ कल नहीं देखते। वो आज का फ़ैसला देखते हैं।

तो रात के दो बजे जब वो आवाज़ आए — "बहुत देर हो गई" — तो तीन बातें याद रखिए।

पहली। अट्ठासी साल। आख़िरी साँस। ग़लत कारण से लिया नाम। अगर उसके लिए देर नहीं हुई… तो आपके लिए कैसे हो सकती है?

दूसरी। भागवत ख़ुद कहता है — अजामिल ने तो बेटे के बहाने नाम लिया और धाम पहुँच गया। "किं पुनः श्रद्धया गृणन्" — तो जो श्रद्धा से ले, उसका क्या कहना!

और तीसरी। अजामिल को दूसरा मौक़ा मिला, तो उसने सबसे पहले क्या याद किया? माता-पिता। पत्नी। जिनका दिल दुखाया था। आपको भी आज ये मौक़ा मिला है। एक फ़ोन कीजिए। एक माफ़ी माँगिए। पछतावे को आँसू से आगे, काम तक ले जाइए।

तो अगली बार, जब बीता हुआ कल रात भर सोने न दे…

तो उस बूढ़े आदमी को याद कीजिए, जिसने काँपती आवाज़ में अपने बेटे को पुकारा था।

"नारायण…"

और भगवान ने ये नहीं पूछा कि किसे बुलाया था। बस आ गए।

बहुत देर हो गई? नहीं। अभी नहीं।

जय श्री कृष्ण।

म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् । अजामिलोऽप्यगाद्धाम किं पुनः श्रद्धया गृणन् ॥
भागवत 6.2.49

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.अट्ठासी साल। आख़िरी साँस। ग़लत कारण से लिया नाम। अगर उसके लिए देर नहीं हुई… तो आपके लिए कैसे हो सकती है?
  2. 2.भागवत ख़ुद कहता है — अजामिल ने तो बेटे के बहाने नाम लिया और धाम पहुँच गया। "किं पुनः श्रद्धया गृणन्" — तो जो श्रद्धा से ले, उसका क्या कहना!
  3. 3.अजामिल को दूसरा मौक़ा मिला, तो उसने सबसे पहले क्या याद किया? माता-पिता। पत्नी। जिनका दिल दुखाया था। आपको भी आज ये मौक़ा मिला है। एक फ़ोन कीजिए। एक माफ़ी माँगिए। पछतावे को आँसू से आगे, काम तक ले जाइए।

इस सत्संग के श्लोक

भागवत 6.2.34 6.1.24 6.1.29 6.1.30 6.2.8 6.2.14 6.2.34 6.3.27 6.3.30 गीता 9.30 भागवत 6.2.49