मन हवा जैसा

A mind like the wind — Arjuna says the mind is as hard to hold as the wind; practice and dispassion

The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
गीता 6.35

जय श्री कृष्ण।

सुबह पूजा का समय। दीया जलाया, अगरबत्ती लगाई, आँखें बंद कीं। "ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…"

और तीसरे ही "ॐ नमः शिवाय" पर मन कहाँ पहुँच गया? "दूध वाले को पैसे देने हैं।" "आज मीटिंग में क्या बोलूँगा?" "कल उसने वो बात क्यों कही?" "फ़ोन पर कोई मैसेज तो नहीं आया?"

और फिर अचानक होश आता है — "अरे! माला तो पूरी हो गई, और मुझे पता ही नहीं चला कि मैंने क्या जपा!"

और फिर एक अपराध-बोध। "मैं कैसा भक्त हूँ? पाँच मिनट मन नहीं टिकता। शायद भगवान मेरी पूजा स्वीकार ही नहीं करते होंगे।"

अगर आपके साथ ऐसा होता है… तो आज मैं आपको एक राज़ बताता हूँ। यही शिकायत, एक बार, भगवान श्रीकृष्ण से भी की गई थी। और करने वाला था… दुनिया का सबसे एकाग्र धनुर्धर।

कुरुक्षेत्र। गीता का छठा अध्याय। भगवान अर्जुन को ध्यान समझा रहे हैं। मन को साधना, सुख-दुःख में सम रहना।

और अर्जुन बीच में बोल पड़ते हैं —

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
गीता 6.34

"कृष्ण, ये मन बड़ा चंचल है। मथ डालता है। बलवान है, ज़िद्दी है। इसे रोकना मुझे ऐसा लगता है… जैसे हवा को मुट्ठी में रोकना।"

सुना आपने? हम सबकी बात! हवा को मुट्ठी में बंद करके देखिए। जितना कसेंगे, उतनी निकल जाएगी।

अब यहाँ एक बहुत दिलचस्प बात है। ये बात कह कौन रहा है? अर्जुन।

चलिए, ज़रा अर्जुन के बचपन में चलते हैं। हस्तिनापुर। गुरु द्रोण का आश्रम।

एक दिन द्रोणाचार्य ने एक नक़ली पक्षी बनवाया और पेड़ की चोटी पर रखवा दिया। सब राजकुमारों को बुलाया। "धनुष उठाओ, उस पक्षी पर निशाना लगाओ।"

पहले युधिष्ठिर आए। धनुष ताना। गुरु ने पूछा — "क्या देख रहे हो?"

"गुरुदेव, मैं पेड़ देख रहा हूँ। आपको देख रहा हूँ। अपने भाइयों को देख रहा हूँ। और पक्षी भी।"

"हट जाओ। तुमसे ये निशाना नहीं लगेगा।"

फिर दुर्योधन, भीम, और बाक़ी सब राजकुमार। सबका एक ही जवाब — "हम सब कुछ देख रहे हैं।" और सबको डाँटकर हटा दिया गया।

और फिर आए अर्जुन।

धनुष गोल खींचा। पक्षी पर नज़र। गुरु ने पूछा — "अर्जुन, क्या तुम पेड़ देखते हो? मुझे देखते हो?"

पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत । न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ॥
आदिपर्व 143.5

"गुरुदेव, मैं केवल पक्षी देखता हूँ। न पेड़, न आप।"

द्रोण मन ही मन ख़ुश हुए। फिर पूछा — "अच्छा, पक्षी को देखते हो? तो बताओ, क्या देखते हो?"

शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥
143.7

"मैं पक्षी का सिर देखता हूँ। शरीर नहीं!"

द्रोण के रोंगटे खड़े हो गए। "छोड़ो!" और बाण… सीधा पक्षी का सिर काटता हुआ।

अब सोचिए। जिस अर्जुन को पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक पक्षी का सिर दिखता था… वही अर्जुन, कुरुक्षेत्र में, भगवान से कह रहा है — "मेरा मन हवा जैसा है। रुकता ही नहीं।"

तो अगर दुनिया के सबसे एकाग्र आदमी का मन भी भागता था… तो आपका भागता है, तो इसमें शर्म कैसी?

पर एक सवाल। अर्जुन ने वो एकाग्रता पाई कैसे? क्या वो पैदा ही ऐसे हुए थे?

महाभारत एक बड़ी प्यारी बात बताता है। पहली चौंकाने वाली बात।

और इसके पीछे एक मज़ेदार राज़ है। द्रोणाचार्य ने रसोइए को एकांत में बुलाकर कहा था — "अर्जुन को कभी अँधेरे में खाना मत परोसना। और ये बात अर्जुन को बताना भी मत!" क्यों? महाभारत इसकी वजह नहीं बताता। पर आगे जो हुआ, वो ज़रूर बताता है। ध्यान से सुनिए।

पर एक रात अर्जुन खाना खा रहे थे। तभी हवा चली… और दीया बुझ गया। घुप्प अँधेरा। गुरु की योजना, हवा ने बिगाड़ दी!

पर अर्जुन खाते रहे। हाथ अँधेरे में भी सीधा मुँह तक जाता रहा। एक बार भी नहीं भटका।

और अर्जुन रुक गए। सोचा — "अरे! अँधेरे में भी हाथ मुँह तक पहुँच रहा है। ये क्यों? क्योंकि रोज़ का अभ्यास है।"

और उस रात से… अर्जुन अँधेरे में धनुष चलाने का अभ्यास करने लगे! रात को डोरी की टंकार सुनकर गुरु द्रोण उठकर आए, अर्जुन को गले लगा लिया, और बोले — "मैं ऐसा करूँगा कि दुनिया में कोई धनुर्धर तुम्हारे बराबर न हो।"

यानी पक्षी का सिर दिखना कोई जादू नहीं था। वो अँधेरी रातों का अभ्यास था।

और अब सुनिए, भगवान ने अर्जुन को क्या उत्तर दिया —

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
गीता 6.35

सबसे पहला शब्द देखिए — "असंशयम्"। "बिल्कुल ठीक कहते हो, अर्जुन।"

भगवान ने ये नहीं कहा, "तुम ग़लत हो, मन तो आसानी से रुकता है।" उन्होंने माना। "हाँ, मन बहुत कठिन है। चंचल है।" भगवान हमारी कमज़ोरी पर हँसते नहीं। पहले उसे मानते हैं।

"पर" — "तु" — "अभ्यास से, और वैराग्य से… ये पकड़ में आता है।"

दो चाबियाँ। अभ्यास — यानी बार-बार लौटना। वैराग्य — यानी जिन चीज़ों के पीछे मन भागता है, उनकी पकड़ थोड़ी ढीली करना।

अब वैराग्य का मतलब ये नहीं कि घर छोड़कर जंगल चले जाइए। बस पूजा के समय फ़ोन दूसरे कमरे में रख दीजिए! जिस चीज़ की घंटी बार-बार बजती है, मन उसी की ओर भागता है। घंटी कम, तो भागना कम। छोटा-सा वैराग्य, बड़ा-सा फ़र्क़।

और अभ्यास करना कैसे है? भगवान ने इसी अध्याय में बहुत सीधा तरीक़ा बताया था —

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
गीता 6.26

"जहाँ-जहाँ ये चंचल मन भागे… वहाँ-वहाँ से इसे वापस ले आओ।"

बस! भगवान ये नहीं कहते कि मन भागेगा नहीं। वो कहते हैं — भागेगा। सौ बार भागेगा। तो सौ बार लौटा लाओ।

जैसे छोटा बच्चा चलना सीखता है। गिरता है, उठता है, गिरता है, उठता है। कोई माँ ये नहीं कहती, "ये गिरता है, इसलिए चलने लायक़ नहीं।" हर बार उठाकर फिर खड़ा कर देती है।

पूजा में मन भागा? कोई बात नहीं। लौटा लाइए। वो लौटाना ही पूजा है।

और अब दूसरी चौंकाने वाली बात। भागवत में एक अवधूत की कथा है, जिसने चौबीस गुरु बनाए। और उनमें से एक गुरु था — एक बाण बनाने वाला कारीगर।

यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तमिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥
भागवत 11.9.13

वो अपनी दुकान पर बैठा, एक बाण की नोक सीधी कर रहा था। और उसकी दुकान के ठीक बगल से… राजा की पूरी सवारी निकल गई। हाथी, घोड़े, बाजे, भीड़।

और उसे पता ही नहीं चला! इतना डूबा था अपने काम में।

अवधूत कहते हैं — मन ऐसे ही टिकता है। लड़कर नहीं। प्रेम से। जिस चीज़ में प्रेम हो, मन वहाँ अपने आप रुक जाता है।

और तीसरी बात, जो सबसे ज़्यादा राहत देती है। अर्जुन ने अगला सवाल पूछा — "और अगर कोई कोशिश करे, पर पूरा न हो पाए? मन बीच में भटक जाए? उसका क्या होगा?"

और भगवान ने कहा —

न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥
गीता 6.40

"तात" — बेटा। "भला करने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती।"

यानी आपकी अधूरी पूजा, भटकती माला, बीच में टूटा ध्यान… कुछ भी बेकार नहीं जाता। हर बार का लौटना… जमा होता जाता है।

तो जिनका मन पूजा में नहीं लगता, उनके लिए तीन बातें।

पहली। अपने आप को दोष मत दीजिए। अर्जुन का मन भी भागता था। भगवान ने भी कहा, "असंशयम्" — सच है। मन का भागना स्वभाव है। लौटाना साधना है।

दूसरी। अँधेरे वाले दीये को याद कीजिए। रोज़, एक ही समय, थोड़ा-सा। पाँच मिनट से शुरू कीजिए। अर्जुन ने भी पहले दिन पक्षी का सिर नहीं देखा था।

और तीसरी। बाण बनाने वाले की तरह, पूजा में प्रेम डालिए। भगवान को एक दोस्त की तरह बात सुनाइए। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मन को बाँधना नहीं पड़ता। वो ख़ुद रुक जाता है।

तो कल सुबह, जब फिर दीया जलाएँ… और तीसरे ही नाम पर मन दूध वाले के हिसाब में चला जाए…

तो मुस्कुराइए। और उसे धीरे से लौटा लाइए।

मन हवा जैसा है… पर हवा भी, धीरे-धीरे, बाँसुरी में सुर बन जाती है।

जय श्री कृष्ण।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
गीता 6.35

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.अपने आप को दोष मत दीजिए। अर्जुन का मन भी भागता था। भगवान ने भी कहा, "असंशयम्" — सच है। मन का भागना स्वभाव है। लौटाना साधना है।
  2. 2.अँधेरे वाले दीये को याद कीजिए। रोज़, एक ही समय, थोड़ा-सा। पाँच मिनट से शुरू कीजिए। अर्जुन ने भी पहले दिन पक्षी का सिर नहीं देखा था।
  3. 3.बाण बनाने वाले की तरह, पूजा में प्रेम डालिए। भगवान को एक दोस्त की तरह बात सुनाइए। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मन को बाँधना नहीं पड़ता। वो ख़ुद रुक जाता है।

इस सत्संग के श्लोक

गीता 6.35 गीता 6.34 आदिपर्व 143.5 143.7 गीता 6.26 भागवत 11.9.13 गीता 6.40