ग़ुस्सा कहाँ से आता है

Where anger comes from — The Gītā’s ladder down: dwelling, attachment, desire, anger

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क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ॥
गीता 2.63

जय श्री कृष्ण।

रविवार की सुबह। घर में सब। चाय बन रही है। और पति ने बस इतना कहा — "तौलिया फिर से बिस्तर पर पड़ा है।"

बस! इतना ही।

पत्नी ने कहा — "तुम्हें बस मेरी ग़लतियाँ दिखती हैं! और तुम्हारे मोज़े जो सोफ़े पर पड़े रहते हैं?" "मोज़ों की बात कहाँ से आ गई?" "बात वहीं से आई, जहाँ से तुम्हारी माँ हर बार…" और फिर… दस साल पुरानी बातें। रिश्तेदारों की बातें। दरवाज़ा ज़ोर से बंद।

शाम तक घर में सन्नाटा। बच्चे सहमे हुए। और रात को दोनों अपने-अपने कमरे में सोच रहे हैं — "बात तो बस एक तौलिये की थी। ये सब हुआ कैसे?"

और ये सिर्फ़ पति-पत्नी की बात नहीं। बच्चे ने होमवर्क नहीं किया, और हमने चिल्लाकर उसकी पूरी शाम ख़राब कर दी। ड्राइवर ने गाड़ी ठीक से नहीं चलाई, और पूरे दिन मूड ख़राब। बात छोटी, आग बड़ी।

आज इसी सवाल का जवाब ढूँढते हैं। ग़ुस्सा आता कहाँ से है? और जाता कहाँ है?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ग़ुस्से का पूरा नक़्शा बनाकर दिया है। एक सीढ़ी। पर ये सीढ़ी ऊपर नहीं जाती। नीचे जाती है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
गीता 2.62

पहली सीढ़ी — "ध्यायतः"। किसी चीज़ के बारे में बार-बार सोचना। दूसरी — उससे लगाव। तीसरी — उसकी चाह। "ऐसा होना चाहिए।" और चौथी — जब वो चाह पूरी न हो… ग़ुस्सा।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
2.63

और फिर नीचे — ग़ुस्से से मोह, यानी धुंध। धुंध से याददाश्त गड़बड़ — भूल जाते हैं कि सामने कौन है। अपनी पत्नी, अपना बेटा, अपनी माँ। याद भूली, तो बुद्धि गई। और बुद्धि गई… तो सब गया।

अब तौलिये वाली सुबह को इस सीढ़ी पर रखकर देखिए। पति के मन में बरसों से एक "चाह" — "घर ऐसा होना चाहिए।" चाह टूटी — ग़ुस्सा। ग़ुस्से में धुंध — और याद नहीं रहा कि ये वही इंसान है, जो रात भर बुख़ार में उसकी पट्टी करती रही थी।

ग़ुस्सा अचानक नहीं आता। वो सीढ़ी पर धीरे-धीरे उतरता है।

अब इस सीढ़ी को एक कथा में देखिए। भागवत की एक बहुत प्रसिद्ध कथा। राजा अम्बरीष और ऋषि दुर्वासा।

अम्बरीष सातों द्वीपों के राजा थे। अपार वैभव। पर भागवत कहता है — उनका मन श्रीकृष्ण के चरणों में, वाणी भगवान के गुणों में, हाथ मंदिर की सफ़ाई में। सारा राज-पाट, वो सपने जैसा मानते थे।

एक बार उन्होंने साल भर का द्वादशी व्रत किया। अंत में तीन दिन का उपवास। यमुना में स्नान, भगवान का अभिषेक, ब्राह्मणों को भोजन। और अब व्रत खोलने का समय।

और ठीक उसी समय… दरवाज़े पर आए — ऋषि दुर्वासा!

राजा ने उठकर स्वागत किया, पैरों में गिरकर कहा — "भगवन्, भोजन कीजिए।" दुर्वासा बोले — "ठीक है, पहले यमुना में स्नान करके आता हूँ।"

और दुर्वासा गए… तो गए। देर होती गई। और द्वादशी तिथि ख़त्म होने वाली थी। बस आधा मुहूर्त बचा।

ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे ।
भागवत 9.4.39

अब राजा फँस गए। अतिथि से पहले खा लें, तो दोष। और तिथि में व्रत न खोलें, तो भी दोष। क्या करें?

उन्होंने ब्राह्मणों से पूछा, और बीच का रास्ता निकाला — "केवल जल पी लेता हूँ। शास्त्र कहते हैं, जल पीना खाना भी है, और नहीं भी।" एक घूँट पानी। और फिर हाथ जोड़कर, भगवान को याद करते हुए, दुर्वासा की राह देखने लगे।

दुर्वासा लौटे। और अपनी शक्ति से उन्होंने जान लिया — राजा ने पानी पी लिया है।

मन्युना प्रचलद्गात्रो भ्रुकुटीकुटिलाननः । बुभुक्षितश्च सुतरां कृताञ्जलिमभाषत ॥
9.4.43

ग़ुस्से से शरीर काँप रहा है। भौंहें चढ़ी हैं, मुँह टेढ़ा। और भागवत एक बहुत छोटी, बहुत सच्ची बात जोड़ता है — "बुभुक्षितश्च सुतराम्" — और ऊपर से बहुत भूखे भी थे!

सुना आपने? भूखा आदमी, और ग़ुस्सा! आज के ज़माने में इसका एक नाम भी है। पहली दिलचस्प बात — हज़ारों साल पहले भागवत ने लिख दिया था, कि भूख ग़ुस्से की आग में घी का काम करती है।

और सामने हाथ जोड़े खड़े राजा पर बरस पड़े — "देखो इस घमंडी को! मुझे बुलाया, और मुझसे पहले खा लिया! अभी इसका फल दिखाता हूँ!"

और ग़ुस्से में अपनी एक जटा उखाड़ी… और उससे एक भयानक कृत्या पैदा की। प्रलय की आग जैसी, हाथ में तलवार लिए, धरती को कँपाती हुई… राजा की ओर दौड़ी।

और राजा अम्बरीष ने क्या किया?

तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां पदा भुवम् । वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्नृपः ॥
9.4.47

"न चचाल पदात्" — अपनी जगह से हिले तक नहीं। न भागे, न लड़े, न उलटा ग़ुस्सा किया।

और तभी… भगवान का सुदर्शन चक्र, जो पहले से राजा की रक्षा में था, प्रकट हुआ! उसने कृत्या को ऐसे जला दिया, जैसे आग साँप को। और फिर… मुड़ा दुर्वासा की ओर!

दुर्वासा भागे! दिशाओं में, आकाश में, पाताल में, समुद्रों में, स्वर्ग में।

यतो यतो धावति तत्र तत्र सुदर्शनं दुष्प्रसहं ददर्श ॥
9.4.51

"जहाँ-जहाँ भागे, वहाँ-वहाँ चक्र सामने।"

और यही है दूसरी बात। ग़ुस्से का स्वभाव। आप उसे किसी और पर फेंकते हैं… और वो लौटकर आपका पीछा करता है। जहाँ जाओ, वहाँ।

दुर्वासा ब्रह्मा के पास गए — "बचाइए!" ब्रह्मा बोले — "मुझसे नहीं होगा।" शिव के पास गए — शिव बोले — "उन्हीं की शरण जाओ।" आख़िर में वैकुण्ठ, स्वयं भगवान विष्णु के चरणों में गिरे।

और भगवान ने जो कहा, वो भागवत के सबसे प्यारे वचनों में है —

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥
9.4.63

"ब्राह्मण, मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ। जैसे मेरी अपनी कोई स्वतंत्रता ही नहीं। साधुओं ने मेरा हृदय पकड़ रखा है।"

साधुषु प्रहितं तेजः प्रहर्तुः कुरुतेऽशिवम् ॥
9.4.69

"और सुनो — सज्जन पर चलाया हुआ तेज… चलाने वाले का ही अहित करता है। तुम्हारा प्रहार तुम्हीं पर लौट आया है। जाओ, उसी राजा से क्षमा माँगो।"

और दुर्वासा लौटे। अम्बरीष के पास। और उनके पैर पकड़ लिए।

और राजा? उन्हें पैर छूए जाने से शर्म आई। करुणा से भर गए। और जिस ऋषि ने उन्हें मारने के लिए कृत्या भेजी थी… उसके लिए हाथ जोड़कर सुदर्शन से प्रार्थना की —

सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय । सर्वास्त्रघातिन्विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते ॥
9.5.4

"हे सुदर्शन, तुम्हें नमस्कार। इस ब्राह्मण का कल्याण करो।"

और चक्र शांत हो गया।

अब तीसरी बात, जो इस कथा की सबसे बड़ी बात है। दुर्वासा जब भाग रहे थे, उसमें कितना समय लगा?

संवत्सरोऽत्यगात्तावद्यावता नागतो गतः । मुनिस्तद्दर्शनाकाङ्क्षो राजाब्भक्षो बभूव ह ॥
9.5.23

पूरा एक साल। और उस पूरे साल… राजा अम्बरीष ने भोजन नहीं किया। केवल जल पीकर, उस ऋषि के लौटने की राह देखते रहे।

जिसने उन्हें मारना चाहा था… उसके बिना खाना नहीं खाया। और जब दुर्वासा लौटे, तो पहले उन्हें प्यार से भोजन कराया।

दुर्वासा बोले — "आज मैंने भगवान के दासों की महिमा देखी। राजन्, तुम अपराधी का भी मंगल चाहते हो।"

और दुर्वासा के जाने के बाद, अम्बरीष ने इस पूरी घटना पर सोचा। क्या उन्होंने सोचा, "देखा, मैं जीत गया"? नहीं। भागवत कहता है — उसमें जो बल दिखा, उसे उन्होंने भगवान का माना। अपना नहीं। जीतकर भी अहंकार नहीं। तभी तो ग़ुस्सा उन तक पहुँच ही नहीं पाया।

गीता कहती है —

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
गीता 16.21

"काम, क्रोध, लोभ — ये नरक के तीन दरवाज़े हैं। अपना ही नाश करते हैं।"

दुर्वासा के लिए नरक कोई दूर की जगह नहीं था। एक साल की भागदौड़ थी, जिसमें हर दिशा में अपना ही ग़ुस्सा पीछा कर रहा था।

तो घर की कलह के लिए, आज तीन बातें।

पहली। सीढ़ी को पहचानिए। ग़ुस्सा तौलिये से नहीं आता। बरसों की "ऐसा होना चाहिए" से आता है। जब पहली सीढ़ी पर हों, तभी रुकिए। चौथी पर रुकना बहुत कठिन है।

दूसरी। भूखे पेट बहस मत कीजिए! भागवत ने भी कहा है — "बुभुक्षितश्च"। पहले खाना, फिर बात।

और तीसरी। अम्बरीष बनिए। जब कोई आप पर ग़ुस्सा फेंके, तो अपनी जगह पर टिके रहिए। उलटा मत फेंकिए। और जब वो लौटकर आए, शर्मिंदा होकर… तो उसके पैर मत छुआइए। गले लगाइए। और साथ बैठकर खाना खाइए।

तो अगली बार, जब घर में किसी छोटी-सी बात पर आवाज़ ऊँची होने लगे… जब मन सीढ़ी उतरने लगे…

तो एक पल रुकिए। और उस ऋषि को याद कीजिए, जो एक साल तक अपने ही ग़ुस्से से भागता रहा।

ग़ुस्सा कहाँ से आता है? अपने ही अंदर से। और लौटकर भी… वहीं आता है।

जय श्री कृष्ण।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
गीता 2.63

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.सीढ़ी को पहचानिए। ग़ुस्सा तौलिये से नहीं आता। बरसों की "ऐसा होना चाहिए" से आता है। जब पहली सीढ़ी पर हों, तभी रुकिए। चौथी पर रुकना बहुत कठिन है।
  2. 2.भूखे पेट बहस मत कीजिए! भागवत ने भी कहा है — "बुभुक्षितश्च"। पहले खाना, फिर बात।
  3. 3.अम्बरीष बनिए। जब कोई आप पर ग़ुस्सा फेंके, तो अपनी जगह पर टिके रहिए। उलटा मत फेंकिए। और जब वो लौटकर आए, शर्मिंदा होकर… तो उसके पैर मत छुआइए। गले लगाइए। और साथ बैठकर खाना खाइए।

इस सत्संग के श्लोक

गीता 2.63 गीता 2.62 2.63 भागवत 9.4.39 9.4.43 9.4.47 9.4.51 9.4.63 9.4.69 9.5.4 9.5.23 गीता 16.21