दो उँगल छोटी रस्सी
A rope two fingers short — Yaśodā tries to bind the child Kṛṣṇa, and every rope falls short
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः कृपयासीत्स्वबन्धने ॥
जय श्री कृष्ण।
जिनके घर में छोटे बच्चे हैं, वो आज की कथा सुनकर मुस्कुराएँगे।
दीवार पर क्रेयॉन की चित्रकारी। फ़्रिज का दरवाज़ा खुला। सोफ़े के पीछे से झाँकती दो शरारती आँखें। और माँ, हाथ में बेलन, आवाज़ में ग़ुस्सा… और होंठों पर छिपी मुस्कान।
पर बड़े होते बच्चों के साथ ये शरारत कभी-कभी चिंता बन जाती है। बेटा बात नहीं सुनता। बेटी हाथ से निकलती लगती है। माँ-बाप हर तरकीब आज़मा लेते हैं — डाँट, समझाना, सज़ा, इनाम… और फिर भी लगता है, कुछ पकड़ में नहीं आ रहा।
आज की कथा एक ऐसी माँ की है, जिसने अपने बच्चे को बाँधने के लिए घर की सारी रस्सियाँ जोड़ दीं। और हर रस्सी… दो उँगल छोटी पड़ गई।
गोकुल। सुबह का समय। घर की दासियाँ दूसरे कामों में लगी हैं, तो माँ यशोदा ख़ुद दही मथने बैठी हैं।
और भागवत एक बहुत प्यारी बात कहता है —
यानि यानीह गीतानि तद्बालचरितानि च ।
दधिनिर्मन्थने काले स्मरन्ती तान्यगायत ॥
दही मथते हुए वो अपने लल्ला की शरारतों के गीत गा रही थीं। जो-जो उसने किया था, सब याद करके गुनगुना रही थीं।
सोचिए उस दृश्य को। रस्सी खींचते-खींचते बाँहें थक गई हैं, कंगन खनक रहे हैं, माथे पर पसीना, बालों से मालती के फूल गिर रहे हैं। और होंठों पर बेटे के गीत।
तभी लल्ला आया। भूखा। मथानी पकड़कर रोक दी — "माँ, पहले दूध!" माँ ने गोद में लिया, दूध पिलाने लगीं, बेटे का मुस्कुराता चेहरा देखती रहीं…
और तभी चूल्हे पर रखा दूध उफनने लगा! माँ ने बच्चे को अधूरा ही छोड़ा और दौड़ीं।
अब लल्ला को ग़ुस्सा आया! लाल होंठ दाँतों से दबाए, पास पड़ा पत्थर उठाया, और… दही का मटका फोड़ दिया! फिर झूठे आँसू बहाते हुए अंदर गया, और छिपकर ताज़ा मक्खन खाने लगा।
माँ लौटीं। टूटा मटका देखा। और भागवत कहता है — वो हँस पड़ीं! समझ गईं, किसका काम है।
ढूँढा तो देखा — लल्ला उलटी ओखली पर चढ़ा है, छींके पर टँगा मक्खन बंदरों को बाँट रहा है… और चोर की तरह इधर-उधर देख रहा है कि कोई आ तो नहीं रहा!
माँ छड़ी लेकर धीरे से पीछे से आईं। लल्ला ने देखा… और भागा! माँ पीछे दौड़ीं।
गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनां क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मनः ॥
और भागवत यहाँ मुस्कुराकर कहता है — जिसे बड़े-बड़े योगी तप करके भी पकड़ नहीं पाते… उसके पीछे एक माँ दौड़ रही है, छड़ी लेकर।
भागते-भागते माँ के बाल खुल गए, फूल गिरते गए… और आख़िर में पकड़ लिया।
कृतागसं तं प्ररुदन्तमक्षिणी कषन्तमञ्जन्मषिणी स्वपाणिना ।
अब लल्ला रो रहा है। छोटे-छोटे हाथों से आँखें मल रहा है, काजल गालों पर फैल गया है। डरी-डरी आँखों से ऊपर माँ को देख रहा है।
और माँ ने क्या किया?
भागवत कहता है — बेटे को डरा हुआ देखकर, बच्चों से प्यार करने वाली उस माँ ने… छड़ी फेंक दी।
सज़ा देनी थी। पर बच्चे का डर देखकर सज़ा का मन चला गया। कौन-सी माँ अपने बच्चे की डरी हुई आँखें देखकर छड़ी उठाए रख सकती है? तो सोचा, "चलो, कुछ देर बाँध देती हूँ, ताकि और शरारत न करे।"
और अब वो अद्भुत बात। भागवत रुककर हमें याद दिलाता है कि यशोदा बाँधने किसे जा रही थीं —
न चान्तर्न बहिर्यस्य न पूर्वं नापि चापरम् ।
पूर्वापरं बहिश्चान्तर्जगतो यो जगच्च यः ॥
"जिसका न कोई भीतर है, न बाहर। न आगे, न पीछे। जो पूरी दुनिया का भीतर-बाहर है… और जो ख़ुद दुनिया है।"
उसे एक माँ रस्सी से ओखली में बाँधने चली है! "मेरा बेटा है, बाँधूँगी!"
तद्दाम बध्यमानस्य स्वार्भकस्य कृतागसः ।
द्व्यङ्गुलोनमभूत्तेन सन्दधेऽन्यच्च गोपिका ॥
रस्सी लपेटी… दो उँगल छोटी! माँ ने दूसरी रस्सी जोड़ी… फिर दो उँगल छोटी! तीसरी जोड़ी… फिर दो उँगल!
घर की सारी रस्सियाँ आ गईं। एक के बाद एक जुड़ती गईं। और हर बार — दो उँगल छोटी।
गोपीनां सुस्मयन्तीनां स्मयन्ती विस्मिताभवत् ॥
पड़ोस की गोपियाँ खड़ी-खड़ी मुस्कुरा रही हैं। माँ ख़ुद भी मुस्कुरा रही हैं… और हैरान भी हैं। "ये हो क्या रहा है?"
और फिर… लल्ला ने अपनी माँ को देखा।
स्वमातुः स्विन्नगात्राया विस्रस्तकबरस्रजः ।
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः कृपयासीत्स्वबन्धने ॥
माँ का पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ। बाल बिखरे। फूल गिरे हुए। थकी हुई। और ये देखकर… श्रीकृष्ण ने कृपा करके… ख़ुद को बँध जाने दिया।
रस्सी लंबी नहीं हुई। बच्चा पिघल गया। माँ जीत गई, क्योंकि बेटे ने उसे जिताया।
भगवान को किसी रस्सी ने नहीं बाँधा। माँ की थकान ने बाँधा। माँ के पसीने ने बाँधा। माँ के प्रेम ने बाँधा।
एवं सन्दर्शिता ह्यङ्ग हरिणा भृत्यवश्यता ।
भागवत कहता है — इस तरह भगवान ने दिखा दिया कि वो अपने भक्तों के वश में हैं। जो सारी दुनिया को वश में रखता है… वो प्रेम के वश में है।
नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिकासुतः ।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥
"ये ग्वालिन का बेटा… बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी उतनी आसानी से नहीं मिलता, जितनी आसानी से प्रेम करने वालों को मिलता है।"
ज्ञानी उसे समझने की कोशिश करते हैं। माँ उसे बस प्यार करती है। और रस्सी माँ की ही काम आई।
और फिर एक और बात — ये कृपा, जो एक ग्वालिन माँ को मिली… न ब्रह्मा को मिली, न शिव को, न लक्ष्मी जी को। इसीलिए श्रीकृष्ण का एक नाम है — दामोदर। जिसके उदर पर दाम, यानी रस्सी, बँधी हो।
और कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती! माँ घर के काम में लग गईं। और बँधे हुए लल्ला ने आँगन में दो जुड़वाँ अर्जुन के पेड़ देखे।
वो पेड़ असल में कुबेर के दो बेटे थे — नलकूवर और मणिग्रीव। धन के घमंड में चूर होकर उन्होंने नारद जी का अपमान किया था, और नारद जी ने करुणा से उन्हें पेड़ बना दिया था, कि कभी भगवान के दर्शन से इनका उद्धार हो।
लल्ला ओखली घसीटता हुआ दोनों पेड़ों के बीच से निकला। ओखली अटकी। एक झटका… और दोनों विशाल पेड़ जड़ से उखड़कर गिर पड़े! उनमें से दो चमकते हुए पुरुष निकले, और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।
और भगवान ने, अब भी ओखली से बँधे-बँधे, हँसकर उनसे कहा —
ज्ञातं मम पुरैवैतदृषिणा करुणात्मना ।
यच्छ्रीमदान्धयोर्वाग्भिर्विभ्रंशोऽनुग्रहः कृतः ॥
"मैं पहले से जानता था। करुणामय नारद ने तुम्हें जो शाप दिया था… वो शाप नहीं, कृपा थी। धन के नशे में अंधे थे तुम, तो उन्होंने तुम्हें गिराया, ताकि उठ सको।"
माता-पिता के लिए ये भी एक सबक़ है। कभी-कभी बच्चे को रोकना, उसका गिरना… वो भी प्रेम ही होता है। नारद का शाप भी, यशोदा की रस्सी भी।
सोचिए। ख़ुद बँधे हैं… और दूसरों को मुक्त कर रहे हैं। माँ की रस्सी में बँधकर भी, दुनिया के बंधन खोल रहे हैं।
पेड़ गिरने की आवाज़ से सारे गोप दौड़े आए। "किसने गिराए?" बच्चों ने कहा, "इसी ने! हमने देखा, ये बीच से निकला, ओखली अटकी, इसने खींचा, और पेड़ों में से दो आदमी भी निकले!" और बड़ों ने बच्चों की बात नहीं मानी। "इतना छोटा बालक दो पेड़ उखाड़ेगा? हुँह!"
और जब नन्द बाबा आए और देखा कि बेटा रस्सी से बँधा ओखली घसीट रहा है… तो हँस पड़े, और खोल दिया।
तो आज माता-पिता के लिए घर ले जाने को तीन बातें।
पहली। शरारत के गीत गाइए। यशोदा दही मथते हुए बेटे की शरारतें गा रही थीं। बच्चों की हरकतों में से कुछ याद रखने लायक़ भी चुनिए। हर शरारत शिकायत नहीं, कुछ गीत भी हैं।
दूसरी। छड़ी फेंकने का पल पहचानिए। जब बच्चा डरा हुआ हो, आँखें मल रहा हो… तब सज़ा नहीं, गोद चाहिए। यशोदा ने ग़ुस्सा नहीं छोड़ा, छड़ी छोड़ी। फ़र्क़ समझिए।
और तीसरी, सबसे ज़रूरी। बच्चे रस्सियों से नहीं बँधते। नियम, सज़ाएँ, ताले, पासवर्ड… हर रस्सी दो उँगल छोटी पड़ेगी। बच्चा तब बँधता है, जब वो आपकी थकान देखता है। आपका प्रेम देखता है। वो दो उँगल की दूरी… रस्सी से नहीं, प्रेम से भरती है।
तो अगली बार, जब बच्चा हाथ से निकलता लगे… जब सारी तरकीबें छोटी पड़ जाएँ…
तो गोकुल के उस आँगन को याद कीजिए। एक थकी हुई माँ। पसीना, बिखरे बाल, घर की सारी रस्सियाँ।
और एक बच्चा, जिसने माँ की थकान देखी… और ख़ुद बँध गया।
भगवान भी ऐसे ही बँधते हैं। रस्सी से नहीं। प्रेम से।
जय श्री कृष्ण।
स्वमातुः स्विन्नगात्राया विस्रस्तकबरस्रजः ।
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः कृपयासीत्स्वबन्धने ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.शरारत के गीत गाइए। यशोदा दही मथते हुए बेटे की शरारतें गा रही थीं। बच्चों की हरकतों में से कुछ याद रखने लायक़ भी चुनिए। हर शरारत शिकायत नहीं, कुछ गीत भी हैं।
- 2.छड़ी फेंकने का पल पहचानिए। जब बच्चा डरा हुआ हो, आँखें मल रहा हो… तब सज़ा नहीं, गोद चाहिए। यशोदा ने ग़ुस्सा नहीं छोड़ा, छड़ी छोड़ी। फ़र्क़ समझिए।
- 3., सबसे ज़रूरी। बच्चे रस्सियों से नहीं बँधते। नियम, सज़ाएँ, ताले, पासवर्ड… हर रस्सी दो उँगल छोटी पड़ेगी। बच्चा तब बँधता है, जब वो आपकी थकान देखता है। आपका प्रेम देखता है। वो दो उँगल की दूरी… रस्सी से नहीं, प्रेम से भरती है।