भाई हो तो भरत जैसा
If a brother, then like Bharata — Bharata refuses the kingdom and rules with Śrī Rāma’s sandals on the throne
एतत्ते रक्षितं राजन्राज्यं निर्यातितं मया ।
जय श्री राम।
आज एक बहुत घरेलू बात से शुरू करते हैं।
पिताजी चले गए। तेरहवीं हो गई। रिश्तेदार लौट गए। और फिर… घर के WhatsApp ग्रुप में एक मैसेज आता है — "वसीयत की कॉपी सब देख लें।"
बस। उसी दिन से भाई-भाई की बात बंद। बहन को लगता है उसका हक़ मारा गया। बड़ा भाई कहता है, "मैंने माँ-बाप की सेवा की।" छोटा कहता है, "मैंने पैसे भेजे।" और जो आँगन कभी सबके खेलने की जगह था… वहाँ अब वकील की तारीख़ें पड़ती हैं।
कितने घर हमने ऐसे टूटते देखे हैं। शायद अपना भी।
आज उस भाई की कथा सुनाता हूँ, जिसके हाथ में पूरा राज्य रख दिया गया था। काग़ज़ पर सब उसका था। और उसने क्या किया? सुनिए।
अयोध्या। राजा दशरथ का देहांत हो चुका है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन में हैं। और भरत, जो ननिहाल में थे, लौटकर आए हैं।
वाल्मीकि बताते हैं — चौदहवें दिन सुबह, राज्य के बड़े लोग इकट्ठे हुए। अभिषेक की सारी सामग्री सजा दी गई। और सबने भरत से कहा — "आज आप हमारे राजा बनिए। ये बाप-दादों का राज्य है, ले लीजिए।"
अब सोचिए। कोई विरोध नहीं। कोई मुक़दमा नहीं। माँ ने वर माँग लिया था, पिता ने दे दिया था। काग़ज़ बिल्कुल साफ़ था।
भरत ने क्या किया? पहले अभिषेक की उस सारी सामग्री की परिक्रमा की। जैसे किसी पूज्य चीज़ की करते हैं। और फिर बोले —
ज्येष्ठस्य राजता नित्यमुचिता हि कुलस्य नः ।
नैवं भवन्तो मां वक्तुमर्हन्ति कुशला जनाः ॥
"हमारे कुल में सदा बड़ा भाई ही राजा बनता आया है। आप समझदार लोग हैं। मुझसे ऐसी बात मत कहिए।"
रामः पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपतिः ।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च ॥
"राजा राम होंगे। और वन में चौदह बरस… मैं रहूँगा!"
और वाल्मीकि लिखते हैं — ये सुनकर सभा में बैठे बुज़ुर्गों की आँखों से ख़ुशी के आँसू गिरने लगे।
अब ज़रा इस बात का मज़ा लीजिए। भरत ने कहा, "सेना तैयार करो, रास्ता बनाओ।" और अभिषेक की सामग्री? "वो भी साथ चलेगी।"
सोचिए, एक आदमी राजतिलक का सारा सामान बाँधकर जंगल ले जा रहा है… अपने लिए नहीं। भाई का तिलक वन में ही कर देने के लिए!
चित्रकूट पहुँचे। भाइयों का मिलन हुआ। भरत ने हर तरह से मनाया। सिर झुकाकर विनती की। "आप नहीं लौटेंगे, तो मैं भी आपके साथ वन चलूँगा।"
पर श्रीराम पिता के वचन पर अटल थे।
तब भरत ने एक ऐसा काम किया, जो हम सोच भी नहीं सकते। सारथि सुमन्त्र से कहा — "यहीं ज़मीन पर कुश बिछाओ। जब तक भैया मान नहीं जाते, मैं बिना खाए, आँखें मूँदे, उनकी कुटिया के सामने लेटा रहूँगा।"
सुमन्त्र हिचके, श्रीराम की ओर देखते रहे। तो भरत ने ख़ुद कुश उठाया, और ख़ुद ज़मीन पर बिछा दिया।
आज हम हक़ के लिए धरना देते हैं। भरत ने हक़ छोड़ने के लिए धरना दिया।
श्रीराम ने बड़े प्यार से उठाया। "भरत, मैंने ऐसा क्या बुरा किया कि मेरे सामने धरना दोगे?"
तब भरत उठे, जल छुआ, और सबके सामने एक सच्ची गवाही दी —
न याचे पितरं राज्यं नानुशासामि मातरम् ।
"मैंने पिता से राज्य नहीं माँगा। माता से कुछ नहीं कहा।"
यदि त्ववश्यं वस्तव्यं कर्तव्यं च पितुर्वचः ।
अहमेव निवत्स्यामि चतुर्दश समा वने ॥
"और अगर किसी को वन में रहना ही है… तो मैं रहूँगा। चौदह बरस। भैया की जगह।"
सोचिए। आज कोई भाई दूसरे भाई की जगह EMI भर दे, तो बड़ी बात है। यहाँ एक भाई दूसरे की जगह वनवास भरने को तैयार है।
श्रीराम ने भरत को गोद में बिठा लिया। और वो बात कही, जो उनके स्वभाव की नींव है —
लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान्वा हिमं त्यजेत् ।
अतीयात्सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥
"चाँद से चाँदनी हट जाए, हिमालय बर्फ़ छोड़ दे, समुद्र किनारा लाँघ जाए… पर मैं पिता का वचन नहीं तोड़ूँगा।"
अब भरत समझ गए कि भैया नहीं लौटेंगे। तो उन्होंने एक छोटी-सी चीज़ माँगी। बहुत छोटी।
अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।
एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥
"भैया, इन खड़ाऊँ पर एक बार पैर रख दीजिए। अब यही सारे लोक का योग-क्षेम सँभालेंगी।"
श्रीराम उन पर चढ़े। उतरे। और खड़ाऊँ भरत के हाथ में दे दीं।
तव पादुकयोर्न्यस्तराज्यतन्त्रः परंतप ।
चतुर्दशे हि संपूर्णे वर्षेऽहनि रघूत्तम ।
न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥
"राज्य मैं आपकी खड़ाऊँ पर रख दूँगा। ख़ुद जटा और छाल पहनूँगा, फल-मूल खाऊँगा। पर सुन लीजिए, भैया… चौदहवाँ बरस पूरा होने के दिन अगर आप न दिखे… तो मैं आग में प्रवेश कर लूँगा।"
और अब एक बात, जो बहुत कम लोग ध्यान से सुनते हैं।
विदा करते समय श्रीराम ने भरत से आख़िरी बात क्या कही? राज्य कैसे चलाना? सेना कैसे रखनी? नहीं।
"अपनी माता कैकेयी की रक्षा करना। उन पर क्रोध मत करना। मैं और सीता, दोनों तुम्हें इसकी शपथ देते हैं।"
और यह कहकर, आँसुओं से भरी आँखों से, भाई को विदा किया।
जिसकी वजह से चौदह बरस का वनवास मिला… उसी की रक्षा की शपथ। घर ऐसे बचते हैं।
भरत लौटे। खड़ाऊँ सिर पर रखकर। अयोध्या पहुँचे… पर महल में नहीं रुके।
वो नन्दिग्राम गए, नगर के बाहर। वहाँ गुरुओं से कहा —
छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ ।
"इन खड़ाऊँ पर राजछत्र लगाओ। ये मेरे बड़े भाई के चरण हैं।"
भ्रात्रा हि मयि संन्यासो निक्षिप्तः सौहृदादयम् ।
तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति ॥
"भाई ने प्रेम से ये धरोहर मेरे पास रखी है। जब तक राघव लौटते नहीं, मैं इसकी रखवाली करूँगा।"
ध्यान दीजिए, भरत "राज्य" शब्द कम बोलते हैं। बार-बार कहते हैं — "संन्यास", यानी धरोहर। अमानत। जैसे कोई पड़ोसी अपना ताला-चाबी आपको दे जाए, और कहे, "मेरे लौटने तक देखते रहना।"
और फिर भरत ने गुरुओं से अपने मन की ख़ुशी भी बताई। "जिस दिन भैया का अभिषेक होगा, और लोग ख़ुशी से झूमेंगे… उस दिन मुझे राज्य पाने से चौगुनी ख़ुशी होगी।"
राज्य मिलने से एक गुना। राज्य लौटाने से चार गुना! भरत का हिसाब ही उल्टा था।
खड़ाऊँ सिंहासन पर। छत्र और चँवर भरत ख़ुद पकड़ते। और भरत? छाल पहने, जटा बाँधे, मुनि के वेश में।
और वाल्मीकि एक बहुत सुंदर बारीकी लिखते हैं। जो भी काम आता, जो भी क़ीमती भेंट आती… भरत पहले उसे खड़ाऊँ के सामने रखकर निवेदन करते। फिर काम करते।
चौदह साल। हर फ़ाइल, हर फ़ैसला… पहले भैया के चरणों में।
और एक बात। बरसों बाद जब हनुमान नन्दिग्राम पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि भरत के मन्त्री, पुरोहित, सेनापति — सब गेरुए कपड़े पहने हैं। क्योंकि जब राजकुमार छाल पहने बैठा हो, तो नगर के लोगों का मन सुख भोगने को करता ही नहीं था।
एक आदमी के त्याग ने पूरे नगर का रंग बदल दिया।
और फिर आया वो दिन। चौदह बरस पूरे। पुष्पक विमान उतरा।
भरत आगे बढ़े। खड़ाऊँ अपने हाथ में ली… और अपने हाथों से श्रीराम के चरणों में पहना दी। फिर हाथ जोड़कर बोले —
एतत्ते रक्षितं राजन्राज्यं निर्यातितं मया ।
अद्य जन्म कृतार्थं मे संवृत्तश्च मनोरथः ॥
"राजन्, ये आपका राज्य है। मैंने इसे सँभालकर रखा। आज लौटाता हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ।"
और अगली पंक्ति में ऐसी बात है, जिस पर आज का हर बैंक मैनेजर हैरान हो जाए —
भवतस्तेजसा सर्वं कृतं दशगुणं मया ॥
"ख़ज़ाना देख लीजिए, अन्न-भंडार देख लीजिए, नगर, सेना… आपके तेज से मैंने सब दस गुना कर दिया है।"
अमानत लौटाई… ब्याज समेत! दस गुना!
और वाल्मीकि कहते हैं, ये देखकर वानर रो पड़े। विभीषण भी रो पड़े। और श्रीराम ने हर्ष से भरत को गोद में बिठा लिया।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। जो आपके पास है, उसे "मेरा" नहीं, "अमानत" समझिए। भरत ने राज्य को धरोहर कहा। पिता का घर, दुकान, खेत… सब किसी की अमानत है। अमानत पर झगड़ा नहीं होता। उसकी रक्षा होती है।
दूसरी। जिसकी वजह से घर में दरार आई, उस पर ग़ुस्सा मत पालिए। श्रीराम ने वनवास देने वाली माँ की रक्षा की शपथ दिलाई। दरार भरने वाला हमेशा वही होता है, जो पहले झुक जाए।
और तीसरी। भगवान को अपने घर के सिंहासन पर बिठाइए। हर फ़ैसला पहले उनके चरणों में रखिए। फिर देखिए, घर में कोई "मेरा-तेरा" नहीं बचता। सब "उनका" हो जाता है।
तो अगली बार, जब वसीयत की बात पर मन कड़वा हो… जब किसी भाई-बहन से बात बंद करने का मन करे…
तो नन्दिग्राम के उस आश्रम को याद कीजिए। छाल पहने एक राजा। और सिंहासन पर… दो खड़ाऊँ।
भाई हो तो भरत जैसा।
जय श्री राम।
एतत्ते रक्षितं राजन्राज्यं निर्यातितं मया ।
अद्य जन्म कृतार्थं मे संवृत्तश्च मनोरथः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.जो आपके पास है, उसे "मेरा" नहीं, "अमानत" समझिए। भरत ने राज्य को धरोहर कहा। पिता का घर, दुकान, खेत… सब किसी की अमानत है। अमानत पर झगड़ा नहीं होता। उसकी रक्षा होती है।
- 2.जिसकी वजह से घर में दरार आई, उस पर ग़ुस्सा मत पालिए। श्रीराम ने वनवास देने वाली माँ की रक्षा की शपथ दिलाई। दरार भरने वाला हमेशा वही होता है, जो पहले झुक जाए।
- 3.भगवान को अपने घर के सिंहासन पर बिठाइए। हर फ़ैसला पहले उनके चरणों में रखिए। फिर देखिए, घर में कोई "मेरा-तेरा" नहीं बचता। सब "उनका" हो जाता है।