विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 9 / 108 · नौवें श्लोक के ग्यारह नाम
किसी ने कद्र नहीं की?
वो कुछ नहीं भूलता
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ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥
ईश्वर, विक्रमी, धन्वी, मेधावी, विक्रम, क्रम; अनुत्तम, दुराधर्ष, कृतज्ञ, कृति, आत्मवान्।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
किसी के लिए बहुत किया… और उसने कद्र तक नहीं की?
कल हमने कहा था — आज एक ऐसा नाम आएगा… जो आपकी दी हुई छोटी-सी चीज़ भी कभी नहीं भूलता। वो नाम… नौवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज नौवाँ दिन। आज के ग्यारह नाम।
पहले कल का हाल — कल तीन लम्बी साँसें लीं? हर साँस में प्राण कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… नौवाँ मनका।
पहले छह नाम — ईश्वर, विक्रमी, धन्वी, मेधावी, विक्रम… और क्रम। जो सब पर राज करते हैं। जिनका संकल्प अटल है। धन्वी — धनुष वाले। मेधावी — बुद्धिमान। विक्रम — ख़ुद पराक्रम। और क्रम — जिनसे हर चीज़ अपने सही क्रम में चलती है।
फिर — अनुत्तम और दुराधर्ष। जिनसे ऊपर कोई नहीं… और जिन्हें कोई हरा नहीं सकता।
और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — कृतज्ञ। कृत — जो किया गया। ज्ञ — जो जानता है, याद रखता है। कृतज्ञ — जो आपकी दी हुई हर चीज़ याद रखते हैं।
इसकी एक कहानी भागवत में है। कृष्ण के एक बचपन के मित्र थे — सुदामा। बहुत ग़रीब। फटे कपड़े। घर में खाने को कुछ नहीं।
पत्नी ने कहा — "आपके मित्र तो स्वयं लक्ष्मीपति हैं… उनके पास जाइए।" पर ख़ाली हाथ कैसे जाते? पत्नी ने पड़ोसियों से चार मुट्ठी चिउड़े माँगे… एक कपड़े में बाँधे… और दे दिए।
सुदामा द्वारका पहुँचे। कृष्ण ने उन्हें दूर से देखा… तुरन्त उठे… और गले लगा लिया। भागवत कहती है — उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बह चले। उन्होंने ख़ुद अपने मित्र के पाँव धोए।
फिर पूछा — "मेरे लिए घर से क्या लाए हो?" सुदामा शर्म से सिर झुकाए रहे। महलों में… चिउड़े की पोटली कैसे दें?
तो कृष्ण ने ख़ुद पोटली खींच ली। और बोले — "मित्र, तुम तो मेरे लिए सबसे प्यारी चीज़ लाए हो! ये चिउड़े मुझे… और मेरे साथ सारे विश्व को तृप्त कर देंगे।"
और लौटते हुए सुदामा ने जो कहा… वही कृतज्ञ का अर्थ है। "अपना दिया हुआ — कितना भी बड़ा हो — वो थोड़ा मानते हैं। और मित्र का किया — कितना भी छोटा हो — वो बहुत मानते हैं।"
गीता में भी कृष्ण यही कहते हैं — "जो प्रेम से मुझे एक पत्ता, एक फूल, एक फल… या थोड़ा-सा जल देता है — मैं उसे स्वीकार करता हूँ।"
तो जिस दर्द से हमने शुरू किया था — कि किसी ने कद्र नहीं की… एक है, जो कद्र करता है। हर छोटी चीज़ की।
और आख़िरी दो नाम — कृति… और आत्मवान्। कृति — जो ख़ुद हर काम का फल हैं। और आत्मवान् — जो पूरी तरह अपने वश में हैं।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — भगवान को बड़ी चीज़ नहीं चाहिए। चार मुट्ठी चिउड़े… प्रेम से दिए हुए।
दूसरी — जो दुनिया भूल जाती है… कृतज्ञ याद रखते हैं।
तीसरी — उनसे सीखिए। अपना किया थोड़ा मानिए… दूसरों का किया बहुत।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज भगवान को कुछ भी छोटा-सा अर्पित कीजिए — एक फूल, एक पत्ता… या बस थोड़ा-सा जल। और देते हुए मन में कहिए — कृतज्ञः।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — दसवाँ श्लोक। एक हाथी की कहानी… जिसे पानी में मगर ने पकड़ लिया था। सब साथ छोड़ गए… और तब उसने एक नाम पुकारा। वो नाम… कल।
कृतज्ञ… वो कुछ नहीं भूलता।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.भगवान को बड़ी चीज़ नहीं चाहिए। चार मुट्ठी चिउड़े… प्रेम से दिए हुए।
- 2.जो दुनिया भूल जाती है… कृतज्ञ याद रखते हैं।
- 3.उनसे सीखिए। अपना किया थोड़ा मानिए… दूसरों का किया बहुत।