विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 8 / 108 · आठवें श्लोक के दस नाम

घबराहट हो रही है?

साँस आपको सँभाले है

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥

ईशान प्राणद प्राण ज्येष्ठ श्रेष्ठ प्रजापति हिरण्यगर्भ भूगर्भ माधव मधुसूदन

ईशान, प्राणद, प्राण, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, प्रजापति; हिरण्यगर्भ, भूगर्भ, माधव, मधुसूदन।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

घबराहट हो रही है? दिल तेज़… साँस छोटी-छोटी?

कल हमने कहा था — आज एक ऐसा नाम आएगा… जो इस वक़्त भी आपके भीतर चल रहा है। हर पल, बिना रुके। वो नाम… आठवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज आठवाँ दिन। आज के दस नाम।

पहले कल का हाल — कल जय श्री कृष्ण कहते हुए… उस नाम का अर्थ याद आया? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… आठवाँ मनका।

पहला नाम — ईशान। जो सब पर शासन करते हैं।

और अब वो दो नाम… जिनका कल वादा किया था — प्राणद… और प्राण। प्राणद — साँस देने वाले। और प्राण — ख़ुद साँस।

एक पल रुकिए। अभी… इस वक़्त… आपकी साँस चल रही है। आपने उसे चलाया नहीं। वो अपने आप चल रही है। सोते हुए भी… जब आपको कुछ पता नहीं होता… तब भी कोई आपकी साँस चला रहा है।

प्रश्न उपनिषद में इसकी एक कहानी है। एक बार शरीर के सारे देवता आपस में बहस करने लगे — वाणी, मन, आँख, कान… हर कोई बोला — "इस शरीर को मैं थामे हुए हूँ।"

सब अपनी-अपनी बड़ाई कर रहे थे। तब प्राण ने कहा — "भ्रम में मत पड़ो। मैं ही इस शरीर को थामता हूँ।" किसी ने विश्वास नहीं किया।

तो प्राण ज़रा-सा उठने लगा… शरीर छोड़ने के लिए। और जैसे ही वो उठा — बाक़ी सबको भी उसके साथ उठना पड़ा। जब वो ठहरा… तो सब ठहर गए।

उपनिषद कहता है — जैसे रानी मधुमक्खी उड़ती है… तो सारी मधुमक्खियाँ उड़ जाती हैं। वो बैठती है… तो सब बैठ जाती हैं।

तब सबने मान लिया। और प्राण से एक प्रार्थना की — "जैसे माँ अपने बच्चों की रक्षा करती है… वैसे हमारी रक्षा करो।"

तो जब घबराहट हो… याद कीजिए — जिस साँस को आप सँभाल नहीं पा रहे… वो साँस आपको सँभाले हुए है। और उस साँस का नाम है — प्राण।

इसी श्लोक में और नाम भी हैं। ज्येष्ठ — सबसे बड़े। श्रेष्ठ — सबसे उत्तम। प्रजापति — सब प्राणियों के स्वामी। हिरण्यगर्भ — जिनके भीतर सोने के अण्डे-सा पूरा ब्रह्माण्ड है। और भूगर्भ — जिनके भीतर पृथ्वी है।

और आख़िरी दो — माधव… और मधुसूदन। माधव — लक्ष्मी जी के पति। मधुसूदन — जिन्होंने मधु नाम के असुर का अंत किया।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — आपकी हर साँस… प्राणद की दी हुई है।

दूसरी — वाणी, मन, आँख, कान… सब उसी के सहारे टिके हैं।

तीसरी — घबराहट में… बस अपनी साँस को देखिए।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज किसी भी समय… तीन बार धीरे-धीरे लम्बी साँस लीजिए। हर साँस भीतर जाते हुए… मन में कहिए — प्राण।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — नौवाँ श्लोक। कभी किसी के लिए बहुत किया… और उसने कद्र नहीं की? कल का नाम ऐसा है… जो आपकी दी हुई एक छोटी-सी चीज़ भी कभी नहीं भूलता। कल।

प्राण… हर साँस में।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.आपकी हर साँस… प्राणद की दी हुई है।
  2. 2.वाणी, मन, आँख, कान… सब उसी के सहारे टिके हैं।
  3. 3.घबराहट में… बस अपनी साँस को देखिए।