विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 7 / 108 · सातवें श्लोक के नौ नाम
किसी ने रंग पर कुछ कहा?
सबसे प्यारा साँवला है
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥
अग्राह्य, शाश्वत, कृष्ण, लोहिताक्ष, प्रतर्दन; प्रभूत, त्रिककुब्धाम — पवित्र और परम मङ्गल।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
कभी किसी ने आपके रंग पर कुछ कहा है? "थोड़ा साँवला है…" — और आप चुप रह गए?
कल हमने कहा था — आज वो नाम आएगा जो आप रोज़ लेते हैं… पर शायद उसका अर्थ नहीं जानते। वो नाम… सातवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज सातवाँ दिन। आज के नौ नाम।
पहले कल का हाल — कल जब मन भागा… तो हृषीकेश कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… सातवाँ मनका।
पहला नाम — अग्राह्य। जिन्हें इन्द्रियों से पकड़ा नहीं जा सकता। कल हमने इन्द्रियों के स्वामी को देखा था… आज वही — जो इन्द्रियों की पकड़ से बाहर हैं।
फिर — शाश्वत। जो हमेशा एक-से रहते हैं।
और अब वो नाम… जो आप रोज़ लेते हैं — कृष्ण। हम कहते हैं — जय श्री कृष्ण। पर कृष्ण का अर्थ क्या है?
कृष्ण के दो अर्थ हैं। पहला — साँवला। श्याम रंग वाला। और दूसरा — जो सबको अपनी ओर खींच लेता है। जैसे चुम्बक लोहे को खींचता है… बिना ज़ोर लगाए, बिना कुछ कहे। बस पास आते ही… लोहा अपने आप खिंच जाता है।
और ये नाम उन्हें मिला कैसे? भागवत में कहानी है। गोकुल में नन्द बाबा के घर गर्ग ऋषि आए। कंस का डर था… इसलिए नामकरण चुपचाप हुआ — एकान्त में।
गर्ग ऋषि ने बालक को देखा और कहा — "यह बालक हर युग में शरीर धारण करता है। कभी इसका रंग श्वेत रहा, कभी लाल, कभी पीला… इस बार यह कृष्ण वर्ण का हुआ है।"
और गर्ग ने आगे कहा — "इसके गुणों और कर्मों के अनुसार… इसके अनेक नाम हैं।" उन्हीं नामों में से एक हज़ार… हम रोज़ गा रहे हैं।
तो जिस सवाल से हमने शुरू किया था — रंग पर कोई कुछ कहे… तो याद रखिए। जिसे दुनिया सबसे ज़्यादा प्यार करती है… जिसके लिए गोपियाँ सब छोड़ देती थीं… वो साँवला था। और उसी का नाम है — कृष्ण।
इसी श्लोक में और नाम भी हैं। लोहिताक्ष — लाल आँखों वाले। प्रतर्दन — जो समय के अंत में सब समेट लेते हैं। प्रभूत — जो हर जगह भरपूर हैं। त्रिककुब्धाम — तीनों दिशाओं के आधार।
और आख़िर में — पवित्र… और मंगलं परम्। जो पवित्र करते हैं… और जो सबसे ऊँचा मंगल हैं।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — कृष्ण यानी साँवला… और वो जो सबको अपनी ओर खींच लेता है।
दूसरी — रंग से कोई छोटा नहीं होता। सबसे प्यारा नाम… एक साँवले का है।
तीसरी — उनके नाम अनेक हैं। हर नाम… एक गुण।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब भी आप जय श्री कृष्ण कहें — एक पल रुकिए… और याद कीजिए — वो जो सबको अपनी ओर खींचता है… मुझे भी खींच रहा है।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — आठवाँ श्लोक। उसमें एक नाम है… जो इस वक़्त भी आपके भीतर चल रहा है। हर पल… बिना रुके। क्या है वो? कल।
कृष्ण… जो सबको अपनी ओर खींच लेता है।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.कृष्ण यानी साँवला… और वो जो सबको अपनी ओर खींच लेता है।
- 2.रंग से कोई छोटा नहीं होता। सबसे प्यारा नाम… एक साँवले का है।
- 3.उनके नाम अनेक हैं। हर नाम… एक गुण।