विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 6 / 108 · छठे श्लोक के दस नाम

मन बात नहीं मानता?

लगाम उसे सौंप दो

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥

अप्रमेय हृषीकेश पद्मनाभ अमरप्रभु विश्वकर्मा मनु त्वष्टा स्थविष्ठ स्थविर ध्रुव

अप्रमेय, हृषीकेश, पद्मनाभ, अमरप्रभु; विश्वकर्मा, मनु, त्वष्टा; स्थविष्ठ, स्थविर, ध्रुव।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

मन बात नहीं मानता? बार-बार वहीं भागता है… जहाँ नहीं जाना चाहिए?

कल हमने कहा था — आज एक ऐसा नाम आएगा… जो बताएगा कि मन की लगाम किसके हाथ में है। वो नाम… छठे श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज छठा दिन। आज के दस नाम।

पहले कल का हाल — कल धूप में एक पल रुके? मन में आदित्यः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… छठा मनका।

पहला नाम — अप्रमेय। जिन्हें मापा नहीं जा सकता। न तराज़ू से, न तर्क से।

और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — हृषीकेश। हृषीक यानी इन्द्रियाँ — आँख, कान, जीभ… और ईश — स्वामी। इन्द्रियों के स्वामी।

और ये नाम गीता में बार-बार आता है। याद है, युद्ध से ठीक पहले अर्जुन ने क्या कहा था? "हे अच्युत… मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिए।" और गीता कहती है — हृषीकेश ने रथ को बीच में खड़ा कर दिया।

सोचिए। अर्जुन का रथ… और लगाम भगवान के हाथ में।

अब कठ उपनिषद की एक बात सुनिए। वो कहता है — ये शरीर एक रथ है। इन्द्रियाँ उसके घोड़े हैं। मन लगाम है। और बुद्धि सारथी।

जिसका मन बेलगाम है… उसकी इन्द्रियाँ ऐसे भागती हैं — जैसे बिगड़ैल घोड़े। और जिसका मन वश में है… उसकी इन्द्रियाँ — जैसे सधे हुए घोड़े।

तो सवाल ये नहीं कि घोड़े भागते क्यों हैं। सवाल ये है… लगाम किसके हाथ में है।

और ये उलझन सिर्फ़ हमारी नहीं है। अर्जुन ने ख़ुद कृष्ण से कहा था — "मन चंचल है, बलवान है… इसे वश में करना हवा को रोकने जैसा कठिन है।"

और कृष्ण ने मना नहीं किया। बोले — हाँ, मन चंचल है… मुश्किल से वश में होता है। पर अभ्यास से… और वैराग्य से… ये वश में होता है।

अभ्यास — यानी रोज़ थोड़ा-थोड़ा। जैसे आप रोज़ एक श्लोक गा रहे हैं।

इसी श्लोक में और नाम भी हैं। पद्मनाभ — जिनकी नाभि के कमल से ब्रह्मा प्रकट होते हैं। अमरप्रभु — देवताओं के स्वामी। विश्वकर्मा — पूरे विश्व को रचने वाले। मनु और त्वष्टा — जो हर रूप को गढ़ते हैं।

और आख़िर में — स्थविष्ठ, स्थविर… और ध्रुव। सबसे विशाल, सबसे पुराने… और ध्रुव — अटल। जो अपनी जगह से कभी नहीं हटते।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े… और लगाम सौंपने के लिए एक नाम है — हृषीकेश।

दूसरी — मन का भागना कोई पाप नहीं। अर्जुन का मन भी भागता था।

तीसरी — अभ्यास से वश में होता है। रोज़ थोड़ा-थोड़ा।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब भी मन वहाँ भागे… जहाँ नहीं जाना चाहिए — बस एक पल रुकिए… और मन में कहिए — हृषीकेश।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — सातवाँ श्लोक। उसमें एक नाम है… जो आप रोज़ लेते हैं। पर क्या आप जानते हैं… उस नाम का अर्थ क्या है? कल।

हृषीकेश… लगाम आपके हाथ में।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े… और लगाम सौंपने के लिए एक नाम है — हृषीकेश।
  2. 2.मन का भागना कोई पाप नहीं। अर्जुन का मन भी भागता था।
  3. 3.अभ्यास से वश में होता है। रोज़ थोड़ा-थोड़ा।