विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 5 / 108 · पाँचवें श्लोक के नौ नाम
सब ख़त्म हो जाएगा?
जो शुरू नहीं हुआ, वो ख़त्म नहीं होता
Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥
स्वयम्भू, शम्भु, आदित्य; पुष्कराक्ष, महास्वन; अनादि-निधन, धाता, विधाता, धातुओं में उत्तम।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
Kept on this device.
आज का सत्संग, पढ़कर
कभी ये डर लगा है… कि एक दिन सब ख़त्म हो जाएगा? लोग, घर… हम ख़ुद?
कल हमने कहा था — एक नाम है जो रोज़ आपके सामने उगता है… और एक, जिसका न आदि है, न अंत। दोनों… पाँचवें श्लोक में हैं। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज पाँचवाँ दिन। आज के नौ नाम।
पहले कल का हाल — कल किसी मंदिर के आगे सिर झुकाया? मन में शिवः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… पाँचवाँ मनका।
पहला नाम — स्वयम्भू। जो अपने आप हैं। उन्हें किसी ने बनाया नहीं। हम सब किसी से जन्मे हैं — माता-पिता से, उनके माता-पिता से… पर इस पूरी कड़ी की शुरुआत में जो हैं… वो स्वयम्भू हैं।
फिर — शम्भु। कल हमने शिव नाम देखा था, आज शम्भु। मंगल का स्रोत। जहाँ से सारा भला निकलता है।
और अब वो नाम… जो रोज़ आपके सामने उगता है — आदित्य। यानी सूर्य।
गीता में कृष्ण कहते हैं — "ज्योतियों में मैं किरणों वाला सूर्य हूँ।" और आगे कहते हैं — "सूर्य में जो तेज है… जो सारे संसार को रोशनी देता है… उस तेज को मेरा जानो।"
सोचिए — सूर्य हर दिन उगता है। बिना थके, बिना कुछ माँगे। अमीर हो या ग़रीब… सबको एक-सी रोशनी।
तो अगली बार जब धूप आपके चेहरे पर पड़े… वो उन्हीं की रोशनी है।
फिर — पुष्कराक्ष। कमल जैसी आँखों वाले। और महास्वन — जिनकी आवाज़ वेदों में गूँजती है।
और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — अनादि-निधन। अनादि — जिसकी कोई शुरुआत नहीं। निधन — अंत। अनादि-निधन — जिसका न आदि है, न अंत।
सोचिए। जो कभी शुरू ही नहीं हुआ… वो ख़त्म कैसे होगा?
और गीता एक और बात कहती है। आपके भीतर जो है — वो भी न जन्मता है, न मरता है। "शरीर के मारे जाने पर भी… यह नहीं मारा जाता।"
कृष्ण कहते हैं — जैसे हम पुराने कपड़े उतारकर… नए कपड़े पहन लेते हैं। वैसे ही। कपड़ा बदलता है… पहनने वाला वही रहता है।
तो जिस डर से हमने शुरू किया था — कि सब ख़त्म हो जाएगा… बदलता बहुत कुछ है। पर जो असल में है… वो ख़त्म नहीं होता।
और आख़िरी तीन नाम — धाता, विधाता… और धातुरुत्तम। धाता — जो हर कर्म का फल बाँटते हैं। विधाता — जो सब तय करते हैं। और धातुरुत्तम — जो कुछ भी सँभाला हुआ है… उनमें सबसे ऊँचे।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — सूर्य की रोशनी… उन्हीं का तेज है।
दूसरी — जो कभी शुरू नहीं हुआ, वो ख़त्म नहीं होता। और आपके भीतर का आत्मा भी।
तीसरी — हर कर्म का हिसाब… धाता के पास है। कुछ भी खोता नहीं।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब भी धूप आप पर पड़े… एक पल रुकिए। आँखें बंद कीजिए… और मन में कहिए — आदित्यः।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — छठा श्लोक। मन बात नहीं मानता? बार-बार वहीं भागता है जहाँ नहीं जाना चाहिए? कल का नाम बताएगा… कि मन की लगाम किसके हाथ में है। कल।
अनादि-निधन… न आदि… न अंत।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.सूर्य की रोशनी… उन्हीं का तेज है।
- 2.जो कभी शुरू नहीं हुआ, वो ख़त्म नहीं होता। और आपके भीतर का आत्मा भी।
- 3.हर कर्म का हिसाब… धाता के पास है। कुछ भी खोता नहीं।