विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 4 / 108 · चौथे श्लोक के बारह नाम
शिव को मानूँ या विष्णु को?
चुनना नहीं पड़ता
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥
सर्व, शर्व, शिव, स्थाणु; भूतों के आदि-कारण, अव्यय निधि; सम्भव, भावन, भर्ता, प्रभव, प्रभु, ईश्वर।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
कभी मन में ये सवाल आया है… शिव को मानूँ… या विष्णु को? क्या किसी एक को चुनना पड़ेगा?
कल हमने कहा था — विष्णु के हज़ार नामों में… एक नाम है — शिव। आज वो नाम… चौथे श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज चौथा दिन। आज के बारह नाम।
पहले कल का हाल — कल डर लगा, तो मन में नारसिंहवपुः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… चौथा मनका।
पहला नाम — सर्व। सर्व यानी सब कुछ। जो कुछ है… सब वही।
और ठीक उसके बाद… दो नाम एक साथ — शर्व… और शिव। शर्व — जो समय के अंत में सब समेट लेते हैं। और शिव — यानी मंगल… कल्याण करने वाले।
सोचिए। विष्णु के हज़ार नामों की सूची… और चौथे ही श्लोक में — शिव। क्यों?
इसका जवाब भी भागवत में है। दक्ष प्रजापति ने एक बार… भरी सभा में शिव का अपमान किया था। और फिर उनका यज्ञ ही नष्ट हो गया।
पर शिव ने उन्हें क्षमा कर दिया। दक्ष ने ख़ुद माना — "मैंने उनका अपमान किया… और उन्होंने करुणा भरी नज़र से मुझे बचा लिया।"
यज्ञ फिर शुरू हुआ। और तब… गरुड़ पर बैठकर, स्वयं विष्णु प्रकट हुए। सब देवता उठ खड़े हुए — ब्रह्मा, इन्द्र… और तीन आँखों वाले शिव भी।
और विष्णु ने दक्ष से जो कहा… वही आज का उत्तर है। "मैं, ब्रह्मा और शिव… इस जगत के परम कारण हैं।" "जैसे कोई अपने ही सिर और हाथ को पराया नहीं मानता… वैसे ही मेरा भक्त किसी को पराया नहीं मानता।" "हम तीनों एक ही स्वरूप हैं। जो हममें भेद नहीं देखता… वह शान्ति पाता है।"
तो शिव को मानें या विष्णु को — चुनना पड़ता ही नहीं। यह बात विष्णु ने ख़ुद कही है।
और कल का केशव याद है? क, ईश और व — ब्रह्मा, शिव और विष्णु… एक ही नाम में। बात वही है।
अगला नाम — स्थाणु। स्थाणु यानी… खम्भा। कल भगवान खम्भे से निकले थे। आज का नाम कहता है — वो ख़ुद खम्भा हैं। अचल… जो कभी नहीं हिलता। जब सब हिल रहा हो… उसे पकड़ लीजिए।
फिर — भूतादि। सब प्राणियों का पहला कारण। और निधि-अव्यय — ऐसा ख़ज़ाना… जो कभी ख़त्म नहीं होता।
और आख़िरी पंक्ति में छह नाम — सम्भव, भावन, भर्ता, प्रभव, प्रभु… और ईश्वर।
सम्भव — जो अपनी इच्छा से प्रकट होते हैं। गीता में कृष्ण कहते हैं — "सम्भवामि युगे युगे।" सज्जनों की रक्षा के लिए… मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। वही शब्द… वही नाम।
भावन — जो हर कर्म का फल देते हैं। भर्ता — जो सबको सँभालते हैं। प्रभव — सबका स्रोत। प्रभु — स्वामी। और ईश्वर — जो सब पर शासन करते हैं।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — शिव और विष्णु में चुनना नहीं पड़ता। भागवत में विष्णु ख़ुद कहते हैं — हम तीनों एक हैं।
दूसरी — जिसका अपमान हुआ था… उसी ने क्षमा किया। शिव का अर्थ ही है — कल्याण।
तीसरी — जब सब हिल रहा हो… वो स्थाणु है। अचल।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज किसी भी मंदिर के आगे से गुज़रें — शिव का हो या विष्णु का — एक ही भाव से सिर झुकाइए… और मन में कहिए — शिवः।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — पाँचवाँ श्लोक। उसमें एक नाम है… जो रोज़ सुबह आपके सामने उगता है। और एक नाम ऐसा… जिसका न आदि है, न अंत। जो कभी शुरू ही नहीं हुआ… वो ख़त्म कैसे होगा? कल।
सर्वः… शर्वः… शिवः… सब वही है।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.शिव और विष्णु में चुनना नहीं पड़ता। भागवत में विष्णु ख़ुद कहते हैं — हम तीनों एक हैं।
- 2.जिसका अपमान हुआ था… उसी ने क्षमा किया। शिव का अर्थ ही है — कल्याण।
- 3.जब सब हिल रहा हो… वो स्थाणु है। अचल।