विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 3 / 108 · तीसरे श्लोक के सात नाम

हर दरवाज़ा बंद लगे तो?

वो रास्ता बनाता है

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योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥

योग योगविदां प्रधान-पुरुषेश्वर नारसिंह-वपु श्रीमान् केशव पुरुषोत्तम

योग और योगियों के नेता; प्रकृति-पुरुष के ईश्वर; नरसिंह-रूप धारण करने वाले, श्रीमान् केशव और पुरुषोत्तम।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

क्या कभी ऐसा लगा है… कि हर दरवाज़ा बंद है? कोई रास्ता बचा ही नहीं?

कल हमने पूछा था — भगवान को आधा शेर, आधा इंसान क्यों बनना पड़ा? आज जवाब… तीसरे श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज तीसरा दिन। आज के सात नाम।

पहले कल का हाल — कल का श्लोक एक बार गाया? पूरा सहस्रनाम सुना? तो आज आपकी माला में… तीसरा मनका।

पहले दो नाम — योग… और योगविदां नेता। योग यानी जोड़ना। भगवान ख़ुद वो डोर हैं… जो हमें उनसे जोड़ती है। और जो योग जानते हैं… उनके नेता भी वही।

फिर — प्रधान-पुरुषेश्वर। प्रकृति के भी ईश्वर… और पुरुष के भी। जो दिखता है, वो भी उनका। जो देखता है, वो भी उनका।

और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — नारसिंह-वपु। नर और सिंह का शरीर।

कहानी भागवत में है। एक असुर राजा था — हिरण्यकशिपु। उसने ब्रह्मा से एक वर माँगा। "मेरी मृत्यु न भीतर हो, न बाहर। न दिन में, न रात में। न किसी अस्त्र-शस्त्र से। न पृथ्वी पर, न आकाश में। न मनुष्य से… न पशु से।"

सोचिए। हर दरवाज़ा बंद। और ये वर पाकर… वो ख़ुद को भगवान मानने लगा।

पर उसी के घर में… उसका बेटा था — प्रह्लाद। जिसने बचपन में ही खिलौने छोड़ दिए थे… और जिसका मन हर पल भगवान में लगा रहता था।

एक दिन पिता गुस्से से पूछता है — "तू मेरे सिवा जिस भगवान की बात करता है… वो कहाँ है? अगर वो हर जगह है… तो इस खम्भे में क्यों नहीं दिखता?"

और वो तलवार लेकर सिंहासन से कूदता है… और उस खम्भे पर ज़ोर से घूँसा मारता है।

उसी पल… खम्भे में ऐसी गर्जना हुई… मानो ब्रह्माण्ड फट गया हो। और खम्भे के बीच से… एक रूप निकला। न पूरा पशु… न मनुष्य।

भागवत बताती है कि भगवान ऐसे क्यों आए। अपने सेवक प्रह्लाद की बात सच करने के लिए। और ये दिखाने के लिए… कि वो हर चीज़ में हैं। खम्भे में भी।

और वर? वो न मनुष्य थे, न पशु। उसे सभा के द्वार पर ले गए — न भीतर, न बाहर। अपनी जाँघों पर रखा — न पृथ्वी, न आकाश। और कोई अस्त्र नहीं… बस नख। वर एक भी नहीं टूटा। पर रास्ता निकल आया।

और अब कहानी का सबसे कोमल हिस्सा। उस उग्र रूप के पास… ब्रह्मा और रुद्र भी न जा सके। लक्ष्मी जी भी पास जाने से डरीं। तब ब्रह्मा ने उस छोटे-से बालक को भेजा।

प्रह्लाद उनके चरणों में गिर पड़ा। और भगवान ने करुणा से भरकर… उसे उठाया… और उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया।

प्रह्लाद ने कहा — "मैं आपके इस रूप से नहीं डरता।" जो दुनिया को डरा रहा था… वो एक बच्चे के सिर पर हाथ रखे बैठा था।

इसी श्लोक में तीन नाम और हैं। श्रीमान् — जिनके साथ श्री हैं, यानी लक्ष्मी। जो तेज और सौभाग्य से भरे हैं।

केशव — सुंदर केशों वाले। और इसका एक अर्थ ये भी बताया जाता है — क, ईश और व। ब्रह्मा, शिव और विष्णु… तीनों एक साथ।

और आख़िरी नाम — पुरुषोत्तम। कल हमने गीता में दो पुरुष देखे थे — क्षर और अक्षर। आज वो नाम आ गया… जो दोनों से ऊपर है। पुरुषोत्तम।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — जब लगे कि हर दरवाज़ा बंद है… प्रह्लाद की कहानी याद कीजिए। वर एक भी नहीं टूटा… फिर भी रास्ता निकला।

दूसरी — बुराई के लिए वो उग्र है। पर अपने भक्त के सिर पर… उसका हाथ बहुत कोमल है।

तीसरी — वो हर जगह है। खम्भे में भी।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। प्रह्लाद ने भगवान से कहा था — लोग डर से छूटने के लिए… आपके इस रूप को याद करेंगे। तो आज जब भी डर लगे… बस मन में इतना कहिए — नारसिंहवपुः।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — चौथा श्लोक। और उसमें एक ऐसा नाम है… जो सुनकर आप चौंक जाएँगे। विष्णु के हज़ार नामों में… एक नाम है — शिव। विष्णु का नाम… शिव क्यों? कल।

नारसिंहवपुः… खम्भे में भी… वो है।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.जब लगे कि हर दरवाज़ा बंद है… प्रह्लाद की कहानी याद कीजिए। वर एक भी नहीं टूटा… फिर भी रास्ता निकला।
  2. 2.बुराई के लिए वो उग्र है। पर अपने भक्त के सिर पर… उसका हाथ बहुत कोमल है।
  3. 3.वो हर जगह है। खम्भे में भी।