विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 2 / 108 · दूसरे श्लोक के आठ नाम
भगवान सब देख रहे हैं… फिर चुप क्यों?
वो साथ है
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥
पूतात्मा, परमात्मा, और मुक्तों की परम गति; अव्यय पुरुष, साक्षी, क्षेत्रज्ञ और स्वयं अक्षर।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
Kept on this device.
आज का सत्संग, पढ़कर
क्या कभी ऐसा लगा है… कि भगवान सब देख रहे हैं… फिर भी चुप हैं?
कल हमने यही सवाल अधूरा छोड़ा था। आज उसका जवाब… दूसरे श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज दूसरा दिन। आज के आठ नाम।
पर पहले… कल का हाल पूछ लूँ। कल का पहला श्लोक… आपने एक बार गाया? अगर गाया है… तो आपकी माला का पहला मनका पूरा हो गया। और अगर नहीं… कोई बात नहीं। आज से शुरू कीजिए।
आज के श्लोक में आठ नाम हैं। और उनमें से एक नाम… कल वाले सवाल का जवाब है। पर पहले बाकी नाम।
पहले दो नाम — पूतात्मा… और परमात्मा। पूतात्मा — जो पूरी तरह पवित्र है। और परमात्मा — सबसे ऊँची आत्मा। गीता में भगवान कहते हैं — इस शरीर में जो परम पुरुष है… वही परमात्मा कहलाता है। यानी वो कहीं दूर नहीं… इसी शरीर में है।
फिर एक नाम — मुक्तानां परमा गतिः। जो मुक्त हो चुके हैं… उनकी आख़िरी मंज़िल। यानी हर यात्रा… आख़िर में उसी तक पहुँचती है।
अव्यय — जो कभी घटता नहीं। हम थकते हैं, बूढ़े होते हैं… वो नहीं।
फिर दो नाम — पुरुष… और अक्षर। गीता के पंद्रहवें अध्याय में भगवान कहते हैं — दुनिया में दो पुरुष हैं। क्षर… और अक्षर। सब प्राणी क्षर हैं — जो बदलते हैं, मिटते हैं। और जो कभी नहीं बदलता… वो अक्षर। और इन दोनों से भी ऊपर… वो पुरुषोत्तम।
एक नाम और — क्षेत्रज्ञ। क्षेत्र यानी खेत। गीता कहती है — ये शरीर ही खेत है। और जो इस खेत को जानता है… वो क्षेत्रज्ञ। और भगवान कहते हैं — हर खेत में… जानने वाला मैं हूँ।
और अब… वो नाम जिसका हमें इंतज़ार था — साक्षी। गवाह। जो सब देखता है।
तो सवाल वही है — जो सब देखता है… वो बीच में आता क्यों नहीं?
मुण्डक उपनिषद में… इसकी एक बहुत सुंदर तस्वीर है। एक पेड़ है। उस पर दो पक्षी बैठे हैं। दोनों दोस्त हैं… हमेशा साथ रहने वाले। एक पक्षी… पेड़ के फल खाता है। दूसरा… कुछ नहीं खाता। बस देखता है।
जो पक्षी फल खा रहा है… वो हम हैं। खाते-खाते… वो उलझ जाता है। और अपनी लाचारी पर दुखी हो जाता है। और जो बस देख रहा है… वो साक्षी है। वो भगवान है। वो कहीं गया नहीं। उसी पेड़ पर है। हमारे साथ।
और उपनिषद आगे कहता है — जिस पल वो दुखी पक्षी… मुड़कर दूसरे को देख लेता है… उसकी महिमा को देख लेता है… उसी पल उसका दुख चला जाता है।
तो वो बीच में क्यों नहीं आता? गीता कहती है — भगवान किसी का पाप नहीं लेते… न पुण्य। हमारे कर्म… हमारे ही रहते हैं।
पर उसी गीता में भगवान ये भी कहते हैं — "मैं सबमें बराबर हूँ… पर जो मुझे प्रेम से भजते हैं… वो मुझमें हैं… और मैं उनमें।" यानी वो चुप नहीं है। वो इंतज़ार कर रहा है… कि हम मुड़कर उसे देखें।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — आप अकेले नहीं हैं। आपके साथ… एक साक्षी हमेशा बैठा है।
दूसरी — सब कुछ बदलता है। पर वो अव्यय है… कभी घटता नहीं।
तीसरी — दुख से निकलने का रास्ता… बस मुड़कर उसकी तरफ़ देखना है।
और इसी मुड़कर देखने के लिए… ये एक सौ आठ दिन की साधना है। रोज़ एक श्लोक। रोज़ माला का एक मनका। एक सौ आठ दिन बाद… पूरी माला। पूरे हज़ार नाम।
तो रोज़ क्या करना है? कम से कम इतना — ये वीडियो देखिए… और आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए। बस दस मिनट। सहस्रनाम में भगवान ख़ुद कहते हैं — एक श्लोक से भी… उनकी स्तुति हो जाती है।
और अगर मन करे… तो पूरा एक घंटा। ये वीडियो… और उसके बाद पूरा विष्णु सहस्रनाम, गाया हुआ। लगभग पचास मिनट। उसका लिंक नीचे है। सहस्रनाम ख़ुद कहता है — "जो इसे रोज़ सुनता है… उसे कुछ अशुभ नहीं मिलता… न इस लोक में, न परलोक में।"
पर सुनना कैसे है — ये भी वही बताता है। "पवित्र होकर… मन उन्हीं में लगाकर।" तो इसे काम करते-करते… पीछे चलाकर मत सुनिए। बैठिए। अगर हो सके… एक दीया जला लीजिए। सुबह उठकर… या रात सोने से पहले। ये गाया हुआ पाठ है — धीमा… ध्यान वाला। बस आँखें बंद कीजिए… और सुनिए।
और रोज़ कमेंट में बस इतना लिखिए — गाया… या सुना। या दोनों। ताकि आपकी माला… आपको दिखती रहे।
कल — तीसरा श्लोक। और उसमें एक नाम है — नारसिंह-वपु। आधा शेर… आधा इंसान। भगवान को ऐसा रूप क्यों लेना पड़ा? कल। घंटी दबा दीजिए… ताकि ये मनका छूटे नहीं।
पूतात्मा… परमात्मा… साक्षी… वो देख रहा है… और साथ है।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.आप अकेले नहीं हैं। आपके साथ… एक साक्षी हमेशा बैठा है।
- 2.सब कुछ बदलता है। पर वो अव्यय है… कभी घटता नहीं।
- 3.दुख से निकलने का रास्ता… बस मुड़कर उसकी तरफ़ देखना है।