विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 1 / 108

रात के दो बजे… कोई है?

वो दूर नहीं

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ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

रात के दो बजे… नींद नहीं आती। और मन में बस एक सवाल — क्या कोई है… जो सब कुछ सँभाले हुए है?

हज़ारों साल पहले… यही सवाल एक राजा ने पूछा था। और उत्तर मिला… एक हज़ार नामों में। अब पहला श्लोक… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… दिन पहला। आज के नौ नाम।

और इन नौ नामों के पीछे एक कहानी है। वो कहानी शुरू होती है… एक रणभूमि में।

युद्ध ख़त्म हो चुका है। चारों तरफ़ सन्नाटा। और बाणों की शय्या पर लेटे हैं… भीष्म पितामह। शरीर में अनगिनत तीर। साँसें गिनी हुई।

और उनके सामने खड़े हैं युधिष्ठिर। हाथ जोड़े हुए। और वो पितामह से वही सवाल पूछते हैं —

"क्या कोई एक है? एक देवता, एक सहारा… जिसकी स्तुति करके इंसान हर मुश्किल से पार हो जाए?"

सोचिए। ये सवाल सिर्फ़ युधिष्ठिर का नहीं है। ये सवाल हमारा भी है। अस्पताल के गलियारे में बैठे हुए… किसी रिपोर्ट का इंतज़ार करते हुए… हम सब यही पूछते हैं — कोई है?

और भीष्म उत्तर में कोई लंबा तर्क नहीं देते। वो बस नाम गिनाने लगते हैं। एक हज़ार नाम। और पहला नाम ही… पूरा उत्तर है।

पहला नाम — विश्वम्।

यानी… ये पूरा संसार। ज़रा सोचिए। सहस्रनाम भगवान को कहीं दूर, बादलों के पार नहीं ढूँढता। पहले ही शब्द में कह देता है — जो आँखों के सामने है… वही वो है।

स्तोत्र के ध्यान में इसकी तस्वीर भी है। पृथ्वी उनके चरण हैं। आकाश उनकी नाभि। सूरज और चाँद… उनकी आँखें। दिशाएँ उनके कान। और समुद्र… उनका पेट।

तो अगली बार जब आप सुबह सूरज को देखें… याद रखिए, वो भी आपको देख रहा है।

दूसरा नाम — विष्णु। जो हर जगह फैला हुआ है।

पर एक बात ध्यान दीजिए। पहले कहा — वो संसार है। फिर तुरंत कहा — वो हर जगह फैला है। क्यों? क्योंकि संसार उसका रूप है… पर संसार में वो ख़त्म नहीं हो जाता।

जैसे समुद्र की लहरें। हर लहर में पूरा समुद्र है। पर समुद्र… किसी एक लहर में बँधा नहीं।

तीसरा नाम थोड़ा अनोखा है — वषट्कार।

यज्ञ में जब आहुति डाली जाती है, तो एक शब्द बोला जाता है — "वषट्"। और सहस्रनाम कहता है… वो पुकार भी वही है।

मतलब? जब माँ बच्चे के लिए पहली रोटी अलग रखती है… जब कोई चुपचाप मंदिर में एक दीया जला देता है… वो अर्पण भी वही है। और जिसे अर्पण किया… वो भी वही।

चौथा नाम — भूत-भव्य-भवत्-प्रभु।

जो बीत गया… जो आने वाला है… और जो अभी, इसी पल हो रहा है। तीनों का स्वामी।

हम कितना जीते हैं… बीते हुए कल में। "काश वैसा न किया होता।" और कितना डरते हैं… आने वाले कल से। "अब क्या होगा?"

ये नाम कहता है — दोनों उसके हाथ में हैं। तो आप… बस आज को सँभालिए।

अब आते हैं आख़िरी पाँच नाम। और इन पाँचों में एक ही शब्द बार-बार आता है — भूत। यहाँ भूत का मतलब डरावनी चीज़ नहीं… भूत यानी हर जीव। हर प्राणी। आप, मैं, वो चिड़िया, वो पेड़।

भूतकृत् — जो सबको बनाता है।

भूतभृत् — जो सबको पालता है। स्तोत्र के अंत में भीष्म कहते हैं — सूरज, चाँद, तारे, धरती, महासागर… सब उसी की शक्ति से टिके हैं। और उसी शक्ति से… आपकी अगली साँस भी।

भाव — जो ख़ुद "होना" है। हर चीज़ के होने में… जो "है", वो वही है।

भूतात्मा — जो हर प्राणी के भीतर आत्मा बनकर बैठा है। आपके भीतर भी।

और भूतभावन — जो सबको जन्म देता है… और फिर बढ़ने देता है। जैसे माली बीज बोकर, रोज़ पानी देता है।

तो देखिए… युधिष्ठिर ने पूछा था — "कोई एक है?" और पहले श्लोक ने ही उत्तर दे दिया।

वो संसार है। वो संसार से बड़ा भी है। हर अर्पण में वो है। समय उसके हाथ में है। वो बनाता है… पालता है… और हम सबके भीतर रहता है।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — भगवान दूर नहीं हैं। जो सामने है, उसी में हैं।

दूसरी — बीता कल और आने वाला कल, दोनों उनके हाथ में हैं। आप बस आज जी लीजिए।

तीसरी — जिसे आप पुकार रहे हैं… वो आपके भीतर बैठा है।

और आज के लिए एक छोटा-सा काम। दिन में बस एक बार… सूरज की तरफ़ देखिए, और मन में कहिए — विश्वं… विष्णुः। बस इतना।

और नीचे कमेंट में लिखिए… इन नौ नामों में से कौन-सा नाम आपके दिल को छू गया। और श्लोक जो मैंने गाकर सुनाया… वो आपको कैसा लगा? ये भी ज़रूर लिखिए।

एक आख़िरी बात, जो बहुत सुंदर है। स्तोत्र के अंत में भगवान स्वयं कहते हैं — "जो मेरी हज़ार नामों से स्तुति करना चाहता है… उसके एक ही श्लोक से… मेरी स्तुति हो जाती है।"

एक ही श्लोक। आज आपने वो एक श्लोक सुन लिया।

पर उसी स्तोत्र में… एक और बात भी लिखी है। जो हर दिन, भक्ति से भरकर, इन हज़ार नामों से स्तुति करता है… वो हर कठिनाई को जल्दी पार कर जाता है। हर दिन।

हज़ार में से नौ नाम… आज आपके हो गए।

कल — दूसरा श्लोक। और उसमें एक नाम है — साक्षी। गवाह। वो जो सब कुछ देखता है। तो फिर सवाल उठता है… जो सब देखता है, वो बीच में आता क्यों नहीं? कल।

रोज़ सुबह… एक नया श्लोक आएगा। कोई दिन छूटे नहीं… इसलिए चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए, और घंटी वाला बटन दबा दीजिए।

विश्वं… विष्णुः… जिसे आप पुकार रहे हैं… वो आपसे दूर नहीं है।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक एक बार फिर गाकर सुनाता हूँ… इस बार अर्थ के साथ।

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.भगवान दूर नहीं हैं। जो सामने है, उसी में हैं।
  2. 2.बीता कल और आने वाला कल, दोनों उनके हाथ में हैं। आप बस आज जी लीजिए।
  3. 3.जिसे आप पुकार रहे हैं… वो आपके भीतर बैठा है।