विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 10 / 108 · दसवें श्लोक के दस नाम

सब साथ छोड़ गए?

एक नाम बचता है

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥

सुरेश शरण शर्म विश्वरेता प्रजाभव अहः संवत्सर व्याल प्रत्यय सर्वदर्शन

सुरेश, शरण, शर्म, विश्वरेता, प्रजाभव; अहः, संवत्सर, व्याल, प्रत्यय, सर्वदर्शन।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

सब साथ छोड़ गए? कोई सहारा नहीं बचा?

कल हमने कहा था — आज एक हाथी की कहानी होगी… जिसे पानी में मगर ने पकड़ लिया था। और उसने जो नाम पुकारा… वो दसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज दसवाँ दिन। आज के दस नाम।

पहले कल का हाल — कल भगवान को कुछ छोटा-सा अर्पित किया? एक फूल… थोड़ा जल? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… दसवाँ मनका।

पहला नाम — सुरेश। देवताओं के स्वामी।

और अब वो नाम… जो उस हाथी ने पुकारा था — शरण। शरण यानी… जहाँ जाकर कोई सुरक्षित हो जाए। सहारा। आसरा।

भागवत में कहानी है — गजेन्द्र की। एक बड़ा, बलवान हाथी। उसके साथ उसका पूरा झुंड — हाथी, हथिनियाँ, बच्चे। एक दिन धूप से थककर… वो एक सरोवर में पानी पीने उतरा।

और तभी… एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वो पूरी ताक़त से लड़ा। भागवत कहती है — ये लड़ाई इतनी लम्बी चली… कि देवता भी हैरान रह गए।

धीरे-धीरे हाथी थकने लगा। उसका बल घटता गया… और पानी में मगर का बल बढ़ता गया।

और तब गजेन्द्र ने सोचा — "मेरे अपने साथी हाथी मुझे नहीं छुड़ा सकते… तो और कौन छुड़ाएगा?" "मैं उन्हीं की शरण लेता हूँ… जिनके डर से मृत्यु भी भागती है।"

और उसने मन को एक जगह टिकाया… और प्रार्थना करने लगा।

भगवान ने उसकी पुकार सुनी। गरुड़ पर बैठकर… हाथ में चक्र लिए… वो तुरन्त वहाँ आए।

गजेन्द्र ने उन्हें आकाश में देखा। और बड़ी मुश्किल से… अपनी सूँड़ में एक कमल उठाया… और बोला — "नारायण… जगद्गुरु… आपको नमस्कार।"

भगवान तुरन्त नीचे उतरे। गजेन्द्र को मगर समेत पानी से बाहर खींचा… और उसे छुड़ा लिया।

तो जिस दर्द से हमने शुरू किया था — कि सब साथ छोड़ गए… गजेन्द्र का झुंड भी उसे नहीं बचा सका। पर एक नाम बचा था। शरण।

और गीता में कृष्ण का आख़िरी वचन भी यही है — "सब छोड़कर… केवल मेरी शरण में आओ। शोक मत करो।"

इसी श्लोक में और नाम भी हैं। शर्म — जो ख़ुद आनन्द हैं। विश्वरेता — पूरे विश्व का बीज। प्रजाभव — जिनसे सब प्राणी पैदा होते हैं।

फिर तीन नाम समय के — अहः, संवत्सर, व्याल। अहः — दिन। संवत्सर — साल। और व्याल — कुण्डली मारे साँप की तरह लिपटा हुआ समय।

और आख़िरी दो — प्रत्यय और सर्वदर्शन। प्रत्यय — पक्का भरोसा। सर्वदर्शन — जो सब कुछ देखते हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — अपने लोग भी कभी-कभी नहीं बचा पाते। ये उनकी कमी नहीं… बस उनकी सीमा है।

दूसरी — जब कुछ न बचे… एक नाम बचता है — शरण।

तीसरी — बड़ी प्रार्थना नहीं चाहिए। एक कमल… एक पुकार।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब भी अकेलापन लगे… या लगे कि कोई साथ नहीं — दोनों हाथ जोड़िए… और मन में बस इतना कहिए — शरणम्।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — ग्यारहवाँ श्लोक। लोग बदल जाते हैं… वादे टूट जाते हैं। कल का नाम उसका है… जो कभी अपनी जगह से नहीं गिरता। कल।

शरण… जब कुछ न बचे।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.अपने लोग भी कभी-कभी नहीं बचा पाते। ये उनकी कमी नहीं… बस उनकी सीमा है।
  2. 2.जब कुछ न बचे… एक नाम बचता है — शरण।
  3. 3.बड़ी प्रार्थना नहीं चाहिए। एक कमल… एक पुकार।