विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 11 / 108 · ग्यारहवें श्लोक के नौ नाम
भरोसे वाला बदल गया?
एक है जो नहीं बदलता
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः । वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥
अज, सर्वेश्वर, सिद्ध, सिद्धि, सर्वादि, अच्युत; वृषाकपि, अमेयात्मा, सर्वयोगविनिःसृत।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया… वही बदल गया?
कल हमने कहा था — आज उसका नाम आएगा… जो कभी अपनी जगह से नहीं गिरता। वो नाम… ग्यारहवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज ग्यारहवाँ दिन। आज के नौ नाम।
पहले कल का हाल — कल जब अकेलापन लगा… हाथ जोड़कर शरणम् कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… ग्यारहवाँ मनका।
पहला नाम — अज। जो कभी जन्मे ही नहीं। फिर — सर्वेश्वर। सबके ईश्वर।
फिर दो नाम साथ-साथ — सिद्ध… और सिद्धि। सिद्ध — जो पहले से पूरे हैं। और सिद्धि — जो ख़ुद हर साधना का फल हैं। और सर्वादि — सबकी शुरुआत।
और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — अच्युत। च्युत यानी — गिरा हुआ, अपनी जगह से हटा हुआ। अच्युत — जो कभी नहीं गिरता। जो कभी अपने स्वभाव से नहीं हटता।
और गीता में ये नाम कहाँ आता है… ज़रा सुनिए। गीता की शुरुआत में — अर्जुन कहता है — "हे अच्युत… मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिए।"
फिर अर्जुन घबराता है। रोता है। धनुष रख देता है। बहस करता है… सवाल पर सवाल। सात सौ श्लोक। और कृष्ण? धैर्य से सुनते रहे… हर सवाल का उत्तर देते रहे।
और बीच में… जब कृष्ण अपना विराट रूप दिखाते हैं — अर्जुन काँप जाता है। और माफ़ी माँगता है — "मैंने आपको बस एक दोस्त समझा… 'अरे कृष्ण, अरे यादव, अरे सखा' कहकर पुकारा… खेलते, सोते, खाते हुए… मज़ाक़ में आपका अपमान भी किया। हे अच्युत… मुझे क्षमा कीजिए।"
और गीता के अन्त में — अर्जुन फिर कहता है — "हे अच्युत… आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया।"
सोचिए। अर्जुन बदलता रहा — कभी हिम्मत, कभी डर, कभी मज़ाक़, कभी आँसू। पर जिसे वो पुकार रहा था… वो शुरू से आख़िर तक एक-सा रहा। अच्युत।
और कृष्ण ने गीता में ख़ुद कहा है — "कुन्तीपुत्र, पक्का जान लो… मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।"
तो जिस दर्द से हमने शुरू किया था — कि भरोसे वाला बदल गया… लोग बदलते हैं। ये उनका स्वभाव है। पर एक है… जो नहीं बदलता।
इसी श्लोक में तीन नाम और हैं। वृषाकपि — जो धर्म को सहारा देकर उठाते हैं। अमेयात्मा — जिनकी आत्मा का कोई माप नहीं। और सर्वयोगविनिःसृत — हर साधना जिन तक पहुँचाती है।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — अच्युत यानी… जो अपनी जगह से कभी नहीं गिरता।
दूसरी — आप बदलते रहें, डरें, भूलें… वो वैसे ही रहते हैं।
तीसरी — अर्जुन ने भी माफ़ी माँगी थी। कोई देर नहीं होती।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब किसी का बदला हुआ बर्ताव चुभे — उससे बहस करने से पहले… एक पल रुकिए। और मन में कहिए — अच्युत।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — बारहवाँ श्लोक। कभी लगा है… भगवान किसी को बहुत देते हैं, और किसी को कम? कल का नाम… इसका सीधा उत्तर है। कल।
अच्युत… वो नहीं बदलता।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.अच्युत यानी… जो अपनी जगह से कभी नहीं गिरता।
- 2.आप बदलते रहें, डरें, भूलें… वो वैसे ही रहते हैं।
- 3.अर्जुन ने भी माफ़ी माँगी थी। कोई देर नहीं होती।