विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 12 / 108 · बारहवें श्लोक के दस नाम
किसी को ज़्यादा, किसी को कम?
वो सबके लिए एक-से हैं
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वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥
वसु, वसुमना, सत्य, समात्मा, असम्मित, सम; अमोघ, पुण्डरीकाक्ष, वृषकर्मा, वृषाकृति।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
कभी लगा है… भगवान किसी को बहुत देते हैं… और किसी को कम?
कल हमने कहा था — आज का नाम इसका सीधा उत्तर है। वो नाम… बारहवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज बारहवाँ दिन। आज के दस नाम।
पहले कल का हाल — कल जब किसी का बदला बर्ताव चुभा… तो अच्युत कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… बारहवाँ मनका।
पहले तीन नाम — वसु, वसुमना… और सत्य। वसु — जो चमकते हैं। वसुमना — जिनका मन शुद्ध और भला है। और सत्य — जो सच हैं।
और अब वो नाम… जिनका कल वादा किया था — समात्मा… और सम। सम यानी — बराबर। एक-सा। समात्मा — जो सबके लिए एक-से हैं।
और बीच में एक और नाम है — असम्मित। जिनकी कोई बराबरी नहीं।
सोचिए — जिनकी ख़ुद कोई बराबरी नहीं… वो सबको बराबर देखते हैं।
गीता में कृष्ण साफ़ कहते हैं — "मैं सब प्राणियों में सम हूँ। न कोई मुझे अप्रिय है… न प्रिय।" "पर जो मुझे प्रेम से भजते हैं… वो मुझमें हैं, और मैं उनमें।"
यानी फ़र्क़ एक ही है। पैसा नहीं… जाति नहीं… ओहदा नहीं। बस प्रेम।
और इसकी एक कहानी रामायण में है। पम्पा सरोवर के किनारे… जंगल में एक बूढ़ी तपस्विनी रहती थीं — शबरी। न महल, न धन, न कोई बड़ा कुल।
उनके गुरुओं ने बरसों पहले कहा था — "एक दिन राम तुम्हारे आश्रम में आएँगे।" गुरु चले गए। और शबरी इंतज़ार करती रहीं… बरसों।
और एक दिन… राम और लक्ष्मण सच में आ गए। एक राजकुमार… एक बूढ़ी वनवासी के दरवाज़े पर।
शबरी हाथ जोड़कर उठीं। उनके पाँव छुए। और राम ने बड़े आदर से पूछा — "तपस्विनी, आपका तप ठीक चल रहा है? आपके मन में सुख है?"
शबरी बोलीं — "आज आपके दर्शन से मेरा तप सफल हो गया।" और जो वन के फल-मूल उन्होंने राम के लिए जमा किए थे… प्रेम से सामने रख दिए।
तो जिस सवाल से हमने शुरू किया था — भगवान किसी को ज़्यादा, किसी को कम देते हैं? सम कहता है — वो सबके लिए एक-से हैं। जो प्रेम से बुलाता है… वहाँ वो ख़ुद चलकर जाते हैं।
इसी श्लोक में और नाम भी हैं। अमोघ — जिनका कोई काम व्यर्थ नहीं जाता। पुण्डरीकाक्ष — सफ़ेद कमल जैसी आँखों वाले। और वृषकर्मा, वृषाकृति — जिनका हर काम धर्म है… और रूप भी धर्म।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — भगवान सबके लिए सम हैं। न कोई प्रिय, न अप्रिय।
दूसरी — फ़र्क़ सिर्फ़ प्रेम से पड़ता है। पैसे से नहीं।
तीसरी — शबरी ने बरसों इंतज़ार किया। और राम ख़ुद आए।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज किसी ऐसे से दो मीठे बोल बोलिए… जिसे आमतौर पर कोई नहीं देखता। और मन में कहिए — समः।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — तेरहवाँ श्लोक। उसमें एक नाम है… जो आँसुओं से जुड़ा है। वो रुलाता भी है… और दुःख भगाता भी है। कौन-सा नाम? कल।
समः… सबके लिए एक-से।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.भगवान सबके लिए सम हैं। न कोई प्रिय, न अप्रिय।
- 2.फ़र्क़ सिर्फ़ प्रेम से पड़ता है। पैसे से नहीं।
- 3.शबरी ने बरसों इंतज़ार किया। और राम ख़ुद आए।