विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 34 / 108 · चौंतीसवें श्लोक के ग्यारह नाम

ग़ुस्सा, फिर पछतावा?

सौ बार थामे रखा

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥

इष्ट अविशिष्ट शिष्टेष्ट शिखण्डी नहुष वृष क्रोधहा क्रोधकृत् कर्ता विश्वबाहु महीधर

इष्ट, अविशिष्ट, शिष्टेष्ट, शिखण्डी, नहुष, वृष; क्रोधहा, क्रोधकृत्, कर्ता, विश्वबाहु, महीधर।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

ग़ुस्सा आता है… और फिर बाद में पछतावा — "काश वो बात न कही होती"?

कल हमने कहा था — आज का एक नाम ग़ुस्से को मारता है… और कहानी एक ऐसे राजा की है, जिसके सौ अपराध भगवान ने माफ़ किए। वो नाम… चौंतीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज चौंतीसवाँ दिन। आज के ग्यारह नाम।

पहले कल का हाल — कल कोई काम अच्छा हुआ तो… मन में कहा — "ये मेरी अकेले की जीत नहीं"? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… चौंतीसवाँ मनका।

पहले तीन नाम — इष्ट, अविशिष्ट, शिष्टेष्ट। जो सबके प्यारे हैं। जो सबमें एक-से हैं। और जो भले लोगों को सबसे प्रिय हैं।

फिर — शिखण्डी। सिर पर मोरपंख वाले! और नहुष, वृष — जो सबको बाँधे रखते हैं, और जो ख़ुद धर्म हैं।

और अब वो नाम… जिनका कल वादा किया था — क्रोधहा… और क्रोधकृत्। क्रोधहा — जो ग़ुस्से को मारते हैं। और क्रोधकृत् — जो सही जगह पर, सही ग़ुस्सा करते भी हैं।

सुनिए महाभारत की कहानी। कृष्ण की एक बुआ थीं। उनका बेटा था — शिशुपाल। बुआ जानती थीं कि उनका बेटा कृष्ण से बैर रखता है। तो उन्होंने कृष्ण से एक वर माँगा — "मेरे लिए… शिशुपाल के अपराध क्षमा कर देना।"

और कृष्ण ने कहा — "बुआ, तुम्हारे बेटे के सौ अपराध… मैं ज़रूर क्षमा करूँगा। चाहे वो सज़ा के लायक़ ही क्यों न हों।"

सालों बीते। शिशुपाल ने कृष्ण का अपमान किया… बार-बार। और कृष्ण… चुप रहे। गिनते रहे। एक बुआ को दिए वचन के लिए।

फिर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में… भरी सभा में, सब राजाओं के सामने… शिशुपाल ने हद पार कर दी। और तब कृष्ण ने कहा — "मैंने इसके सौ अपराध क्षमा कर दिए। पर आज… जो इसने पूरी सभा के सामने किया है — वो मैं क्षमा नहीं कर सकूँगा।"

और उसी सभा में… शिशुपाल का अन्त हुआ।

तो जिस ग़ुस्से से हमने शुरू किया था — देखिए, कृष्ण को ग़ुस्सा नहीं आया था? आया था। पर सौ बार… उन्होंने उसे थामे रखा। एक वचन के लिए। एक माँ के लिए। इसीलिए वो क्रोधहा भी हैं… और क्रोधकृत् भी।

और गीता बताती है कि बेक़ाबू ग़ुस्सा क्या करता है — "क्रोध से मूढ़ता आती है। मूढ़ता से याद भटकती है। याद भटकी… तो बुद्धि का नाश।"

बाक़ी नाम — कर्ता, विश्वबाहु, महीधर। जो सब करते हैं। जिनकी भुजाएँ पूरे विश्व में हैं। और जो धरती को थामे हुए हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — ग़ुस्सा आना पाप नहीं। कृष्ण को भी आया था।

दूसरी — उसे थामे रखना… यही क्रोधहा की शक्ति है।

तीसरी — बेक़ाबू ग़ुस्सा… सबसे पहले अपनी ही बुद्धि छीनता है।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब ग़ुस्सा आए — सौ तक नहीं… बस दस तक गिनिए। और दसवीं गिनती पर मन में कहिए — क्रोधहा।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — पैंतीसवाँ श्लोक। कभी लगता है… भगवान ने मुझे भुला दिया? मेरी बारी आएगी भी? कल का नाम कहता है — वो एक पल को भी असावधान नहीं होते। कल।

क्रोधहा… दस तक गिनिए।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.ग़ुस्सा आना पाप नहीं। कृष्ण को भी आया था।
  2. 2.उसे थामे रखना… यही क्रोधहा की शक्ति है।
  3. 3.बेक़ाबू ग़ुस्सा… सबसे पहले अपनी ही बुद्धि छीनता है।