विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 33 / 108 · तैंतीसवें श्लोक के आठ नाम

भगवान दिखते क्यों नहीं?

घमण्ड हटा, तो दिख गए

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥

युगादिकृत् युगावर्त नैकमाय महाशन अदृश्य व्यक्तरूप सहस्रजित् अनन्तजित्

युगादिकृत्, युगावर्त, नैकमाय, महाशन; अदृश्य, व्यक्तरूप, सहस्रजित्, अनन्तजित्।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

भगवान दिखते क्यों नहीं? इतना पुकारा… एक बार सामने आ जाते, तो विश्वास पक्का हो जाता?

कल हमने कहा था — एक बार वो देवताओं के सामने ख़ुद खड़े हो गए… और देवता उन्हें पहचान ही नहीं पाए। उस कहानी का नाम… तैंतीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज तैंतीसवाँ दिन। आज के आठ नाम।

पहले कल का हाल — कल भगवान से खुलकर कुछ माँगा? और अन्त में जोड़ा — "जो धर्म के अनुकूल हो"? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… तैंतीसवाँ मनका।

पहले चार नाम — युगादिकृत्, युगावर्त, नैकमाय, महाशन। जो हर युग की शुरुआत करते हैं। जो युगों का पहिया घुमाते हैं। जिनकी माया के अनगिनत रूप हैं… और जो अन्त में सब कुछ अपने में समेट लेते हैं।

और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — अदृश्य। जो दिखते नहीं। और उसके ठीक बाद — व्यक्तरूप। जो हर रूप में प्रकट हैं। दिखते भी नहीं… और हर जगह दिखते भी हैं।

केन उपनिषद में कहानी है। एक बार देवताओं ने असुरों को हरा दिया। और देवता सोचने लगे — "ये जीत हमारी है। ये महिमा हमारी है।" पर वो जीत असल में… ब्रह्म की थी।

तब ब्रह्म… उनके सामने एक यक्ष के रूप में प्रकट हुआ। देवता हैरान — "ये कौन है?"

पहले अग्नि गए। यक्ष ने पूछा — "तुम कौन हो? तुममें क्या शक्ति है?" अग्नि बोले — "मैं धरती पर कुछ भी जला सकता हूँ।" यक्ष ने सामने एक तिनका रख दिया — "इसे जलाओ।" अग्नि ने पूरी ताक़त लगाई… तिनका नहीं जला।

फिर वायु गए। "मैं धरती पर कुछ भी उड़ा सकता हूँ।" वही तिनका — "इसे उड़ाओ।" तिनका नहीं हिला।

फिर इन्द्र गए। और जैसे ही वो पास पहुँचे… यक्ष ग़ायब हो गया। उसी जगह आकाश में… हिमालय की पुत्री उमा खड़ी थीं। इन्द्र ने पूछा — "वो यक्ष कौन था?" उमा बोलीं — "वो ब्रह्म था। उसी की जीत में… तुम अपनी महिमा मना रहे थे।"

तो जिस सवाल से हमने शुरू किया था — भगवान दिखते क्यों नहीं? देवताओं के सामने वो खड़े थे। पर "मैं, मेरी जीत, मेरी ताक़त" — इसने पहचानने नहीं दिया। और जब घमण्ड हटा… तो दिख गए।

और उपनिषद बताता है कि वो दिखते कैसे हैं — "बिजली की चमक जैसे… पलक झपकने जैसे।" और कहता है — उन्हें "प्रियतम" मानकर याद करो।

और आख़िरी दो नाम — सहस्रजित्, अनन्तजित्। जो हज़ारों को जीतते हैं… और जिनकी जीत का कोई अन्त नहीं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — अदृश्य… और व्यक्तरूप। दिखते नहीं, फिर भी हर रूप में हैं।

दूसरी — "मेरी जीत" वाली सोच… सामने खड़े भगवान को भी छिपा देती है।

तीसरी — वो बिजली की चमक जैसे दिखते हैं। पलक झपकते। ध्यान रखिए।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब कोई काम अच्छा हो जाए… कोई तारीफ़ मिले — एक पल रुककर मन में कहिए — "ये मेरी अकेले की जीत नहीं।" और फिर — अदृश्य।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — चौंतीसवाँ श्लोक। ग़ुस्सा आता है… और फिर पछतावा? कल का एक नाम ग़ुस्से को मारता है। और कहानी एक ऐसे राजा की… जिसके सौ अपराध भगवान ने माफ़ किए। कल।

अदृश्य… बिजली की चमक जैसे।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.अदृश्य… और व्यक्तरूप। दिखते नहीं, फिर भी हर रूप में हैं।
  2. 2."मेरी जीत" वाली सोच… सामने खड़े भगवान को भी छिपा देती है।
  3. 3.वो बिजली की चमक जैसे दिखते हैं। पलक झपकते। ध्यान रखिए।