विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 32 / 108 · बत्तीसवें श्लोक के दस नाम

भगवान से माँगना ग़लत है?

माँगिए, बिना शर्म के

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥

भूतभव्यभवन्नाथ पवन पावन अनल कामहा कामकृत् कान्त काम कामप्रद प्रभु

भूतभव्यभवन्नाथ, पवन, पावन, अनल; कामहा, कामकृत्, कान्त, काम, कामप्रद, प्रभु।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

क्या भगवान से कुछ माँगना ग़लत है? नौकरी, घर, बच्चे की सेहत… माँगो तो लगता है — मैं स्वार्थी हूँ?

कल हमने कहा था — आज के एक ही श्लोक में… पाँच नाम इच्छा पर हैं। वो श्लोक… बत्तीसवाँ है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज बत्तीसवाँ दिन। आज के दस नाम।

पहले कल का हाल — कल किसी डराने वाले बड़े काम का… एक छोटा हिस्सा किया? एक पत्थर रखा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… बत्तीसवाँ मनका।

पहला नाम — भूतभव्यभवन्नाथ। बीते, आने वाले और इस पल — तीनों के स्वामी। पहले दिन भी हमने ऐसा ही नाम सुना था।

फिर — पवन, पावन, अनल। हवा, जो सबको पवित्र करती है… और आग।

और अब वो पाँच नाम… जिनका कल वादा किया था। कामहा। कामकृत्। कान्त। काम। कामप्रद। सुनिए इनका अर्थ।

कामहा — जो ग़लत इच्छाओं का नाश करते हैं। कामकृत् — जो सही इच्छाएँ जगाते हैं। कान्त — सबसे प्यारे। काम — जो ख़ुद इच्छा हैं। और कामप्रद — जो इच्छाएँ पूरी करते हैं।

एक ही श्लोक में… इच्छा को मिटाने वाले भी — और इच्छा को पूरा करने वाले भी।

तो इच्छा अच्छी है या बुरी? गीता में कृष्ण साफ़ बताते हैं — "प्राणियों में… जो इच्छा धर्म के ख़िलाफ़ नहीं — वो मैं हूँ।"

और आगे कहते हैं — "चार तरह के भले लोग मुझे भजते हैं — जो दुखी हैं। जो जानना चाहते हैं। जो कुछ पाना चाहते हैं। और जो ज्ञानी हैं।" और फिर — "ये सभी उदार हैं।"

यानी जो कुछ माँगने आया… वो भी उदार है। भगवान ने उसे भी भला कहा है।

पर एक चेतावनी भी है। गीता कहती है — जो चीज़ों के बारे में सोचता रहता है… उनसे लगाव हो जाता है। लगाव से इच्छा… और इच्छा पूरी न हो — तो क्रोध। इसीलिए उनका एक नाम कामहा भी है।

और ध्रुव याद है? वो पाँच साल का बच्चा… जंगल किस लिए गया था? पिता की गोद के लिए। राजगद्दी के लिए। यानी एक इच्छा लेकर। और भगवान ने उसे ठुकराया नहीं। पर आख़िर में… जब ध्रुव से वर माँगने को कहा गया — उसने बस एक चीज़ माँगी — "हरि की अटल याद।"

इच्छा लेकर गया था… और इच्छा बदलकर लौटा।

और आख़िरी नाम — प्रभु। जो सबके स्वामी हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — माँगना ग़लत नहीं। गीता कहती है — माँगने वाले भी उदार हैं।

दूसरी — जो इच्छा धर्म के ख़िलाफ़ नहीं… वो ख़ुद भगवान का रूप है।

तीसरी — माँगते रहिए… इच्छाएँ अपने आप सुन्दर होती जाएँगी। ध्रुव की तरह।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज भगवान से खुलकर… बिना शर्म के… कुछ माँगिए। और अन्त में बस इतना जोड़िए — "जो धर्म के अनुकूल हो… वही।" और मन में कहिए — कामप्रदः।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — तैंतीसवाँ श्लोक। भगवान दिखते क्यों नहीं? एक बार वो देवताओं के सामने ख़ुद खड़े हो गए… और देवता उन्हें पहचान ही नहीं पाए। कल।

कामप्रद… माँगिए, बिना शर्म के।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.माँगना ग़लत नहीं। गीता कहती है — माँगने वाले भी उदार हैं।
  2. 2.जो इच्छा धर्म के ख़िलाफ़ नहीं… वो ख़ुद भगवान का रूप है।
  3. 3.माँगते रहिए… इच्छाएँ अपने आप सुन्दर होती जाएँगी। ध्रुव की तरह।