विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 31 / 108 · इकतीसवें श्लोक के सात नाम

बीच में समुद्र-सा फ़ासला?

रोज़ एक पत्थर

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥

अमृतांशूद्भव भानु शशबिन्दु सुरेश्वर औषध जगतः सेतु सत्यधर्मपराक्रम

अमृतांशूद्भव, भानु, शशबिन्दु, सुरेश्वर; औषध, जगतः सेतु, सत्यधर्मपराक्रम।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

जहाँ आप हैं… और जहाँ पहुँचना है — उसके बीच एक समुद्र-सा फ़ासला लगता है?

कल हमने कहा था — समुद्र के ऊपर पत्थरों का एक पुल… और एक नाम, जो ख़ुद पुल है। वो नाम… इकतीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज इकतीसवाँ दिन। आज के सात नाम।

पहले कल का हाल — कल अपना सबसे प्यारा नाम एक सौ आठ बार जपा? कमेंट में बताया कौन-सा था? तो आज आपकी माला में… इकतीसवाँ मनका।

पहले चार नाम — अमृतांशूद्भव, भानु, शशबिन्दु, सुरेश्वर। जिनसे अमृत-किरणों वाला चाँद निकला। जो ख़ुद सूरज हैं। जो चाँद भी हैं… और देवताओं के ईश्वर भी।

फिर — औषध। जगत की दवा। अठारहवें दिन हमने वैद्य नाम सुना था… आज वही — ख़ुद दवा।

और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — जगतः सेतु। संसार का पुल। जो इस किनारे को उस किनारे से जोड़ता है।

और रामायण में… एक सचमुच का पुल बना था। सीता लंका में थीं। बीच में — सौ योजन का समुद्र। राम ने समुद्र से रास्ता माँगा। समुद्र नहीं आया। राम ने धनुष उठाया।

तब समुद्र हाथ जोड़कर सामने आया। और बोला — "राघव, आपकी सेना में नल है — विश्वकर्मा का पुत्र। वो मुझ पर पुल बनाए… और मैं उसे थामे रखूँगा।"

और नल ने क्या कहा? "समुद्र ने सच कहा। मैं ये कर सकता हूँ। पर बिना पूछे… मैं अपने गुण नहीं बताता।" इतना हुनर… और इतनी विनम्रता।

और फिर वानर जंगलों में टूट पड़े। साल, ताड़, आम, अशोक, नीम के पेड़… हाथी जितने बड़े पत्थर… सब समुद्र में।

और सुनिए — पुल बना कैसे? वाल्मीकि गिनकर बताते हैं — पहले दिन चौदह योजन। दूसरे दिन बीस। तीसरे दिन इक्कीस। चौथे दिन बाईस। और पाँचवें दिन तेईस… और पुल उस पार पहुँच गया।

सौ योजन। एक दिन में नहीं… रोज़ थोड़ा-थोड़ा।

तो जिस फ़ासले से हमने शुरू किया था — जहाँ हैं और जहाँ पहुँचना है… फ़ासला एक दिन में नहीं मिटता। पर रोज़ एक पत्थर… और समुद्र ख़ुद उसे थामे रखता है।

और आपकी ये एक सौ आठ दिन की माला? वो भी एक पुल है। रोज़ एक मनका। रोज़ एक पत्थर।

और आख़िरी नाम — सत्यधर्मपराक्रम। जिनका धर्म सच्चा है… और पराक्रम भी।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — जगतः सेतु। वो इस किनारे को उस किनारे से जोड़ते हैं।

दूसरी — सौ योजन का पुल… पाँच दिन में, रोज़ थोड़ा-थोड़ा।

तीसरी — आप पत्थर रखिए… थामने वाला कोई और है।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। कोई बड़ा काम जो डरा रहा है — आज उसका बस एक छोटा-सा हिस्सा कीजिए। एक पत्थर। और मन में कहिए — सेतु।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — बत्तीसवाँ श्लोक। क्या भगवान से कुछ माँगना ग़लत है? इच्छाएँ रखना पाप है? कल के एक ही श्लोक में… पाँच नाम इच्छा पर हैं। कल।

सेतु… रोज़ एक पत्थर।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.जगतः सेतु। वो इस किनारे को उस किनारे से जोड़ते हैं।
  2. 2.सौ योजन का पुल… पाँच दिन में, रोज़ थोड़ा-थोड़ा।
  3. 3.आप पत्थर रखिए… थामने वाला कोई और है।