विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 30 / 108 · एक महीना · तीसवें श्लोक के आठ नाम
कौन-सा मंत्र जपूँ?
नाम ही मंत्र है
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ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥
ओजस्तेजोद्युतिधर, प्रकाशात्मा, प्रतापन; ऋद्ध, स्पष्टाक्षर, मन्त्र, चन्द्रांशु, भास्करद्युति।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
कभी सोचा है… कौन-सा मंत्र जपूँ? गुरु नहीं मिला… दीक्षा नहीं हुई… तो क्या मैं कुछ जप ही नहीं सकता?
कल हमने कहा था — आज का एक नाम… ख़ुद मंत्र है। वो नाम… तीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज तीसवाँ दिन। पूरा एक महीना! आज के आठ नाम।
पहले कल का हाल — कल सोने से पहले… तीन चीज़ें गिनीं जो आपके पास हैं? वसुदः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… तीसवाँ मनका। एक महीने में तीस मनके। तीस श्लोक। क़रीब ढाई सौ नाम। ये छोटी बात नहीं है।
पहले तीन नाम — ओजस्तेजोद्युतिधर, प्रकाशात्मा, प्रतापन। जो बल, तेज और चमक धारण करते हैं। जिनकी आत्मा ही प्रकाश है… और जो सबको तपाकर निखारते हैं।
फिर — ऋद्ध और स्पष्टाक्षर। ऋद्ध — भरे-पूरे। और स्पष्टाक्षर — जिनका हर अक्षर साफ़ है। इसीलिए नाम लेते समय… धीरे, साफ़ बोलिए।
और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — मन्त्र। भगवान का एक नाम ही है — मन्त्र। यानी जिसे आप जपते हैं… वो कोई अलग चीज़ नहीं — वही हैं।
गीता में कृष्ण कहते हैं — "वाणी में मैं एक अक्षर ॐ हूँ। और यज्ञों में… मैं जप-यज्ञ हूँ।" सारे यज्ञों में… नाम जपना।
और भागवत में ध्रुव की कहानी याद है? पाँच साल का बच्चा। नारद मुनि ने उसे एक मंत्र दिया — "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।" और कहा — शुद्ध जल, फूल, वन के फल… और तुलसी से पूजा करना। और नारद ने भगवान को कहा — मन्त्रमूर्ति। यानी — मंत्र ही जिनका रूप है।
अब आपका सवाल — दीक्षा नहीं हुई तो? जो मंत्र गुरु दीक्षा में देते हैं… वो गुरु से ही लीजिए। पर ये हज़ार नाम? इसी सहस्रनाम के अन्त में भीष्म कहते हैं — "जो इन्हें रोज़ सुनता है, या इनका कीर्तन करता है… उसका कभी कुछ अशुभ नहीं होता।" और आगे — हर वर्ण के लिए, हर इंसान के लिए… इनका फल बताया गया है।
यानी इन नामों का दरवाज़ा… सबके लिए खुला है।
और आख़िरी दो नाम — चन्द्रांशु और भास्करद्युति। चाँद की ठण्डी किरण… और सूरज की चमक। दोनों वही।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — मन्त्र… भगवान का ही एक नाम है। नाम लेना ही जप है।
दूसरी — गीता कहती है — यज्ञों में जप-यज्ञ। बिना सामग्री, बिना ख़र्च।
तीसरी — दीक्षा वाले मंत्र गुरु से… पर ये हज़ार नाम… सबके लिए।
और आज, एक महीना पूरा होने पर… एक छोटी-सी बात। इन तीस दिनों में जो नाम आपको सबसे प्यारा लगा — शरण, अच्युत, प्राण, कृतज्ञ… कोई भी — आज उसे एक सौ आठ बार जपिए। माला न हो तो उँगलियों पर… या बस पाँच मिनट, आँखें बंद करके। और कमेंट में लिखिए — आपका नाम कौन-सा था।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — इकतीसवाँ श्लोक। समुद्र के ऊपर… पत्थरों का एक पुल। और कल का एक नाम… ख़ुद पुल है। किसके बीच का पुल? कल।
मन्त्र… जो जपते हैं, वही वो हैं।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.मन्त्र… भगवान का ही एक नाम है। नाम लेना ही जप है।
- 2.गीता कहती है — यज्ञों में जप-यज्ञ। बिना सामग्री, बिना ख़र्च।
- 3.दीक्षा वाले मंत्र गुरु से… पर ये हज़ार नाम… सबके लिए।