विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 29 / 108 · उनतीसवें श्लोक के दस नाम

पैसों की तंगी?

ज़रूरत उनकी ज़िम्मेदारी

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥

सुभुज दुर्धर वाग्मी महेन्द्र वसुद वसु नैकरूप बृहद्रूप शिपिविष्ट प्रकाशन

सुभुज, दुर्धर, वाग्मी, महेन्द्र, वसुद, वसु; नैकरूप, बृहद्रूप, शिपिविष्ट, प्रकाशन।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

पैसों की तंगी? महीने के आख़िर में हिसाब नहीं बैठता… और रात को यही सोचते-सोचते नींद नहीं आती?

कल हमने कहा था — आज का एक नाम उसका है जो देने वाला है… और साथ में गीता का एक वचन। वो नाम… उनतीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज उनतीसवाँ दिन। आज के दस नाम।

पहले कल का हाल — कल जहाँ छोटा झूठ आसान लगा… वहाँ सच बोला? मन में वृषभ कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… उनतीसवाँ मनका।

पहले चार नाम — सुभुज, दुर्धर, वाग्मी, महेन्द्र। सुन्दर भुजाओं वाले। जिन्हें कोई रोक नहीं सकता। जो सबसे अच्छा बोलते हैं… और जो देवराज इन्द्र से भी बड़े हैं।

और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — वसुद। वसु यानी — धन, जो कुछ भी काम का है। वसुद — देने वाले। और उसके ठीक बाद — वसु। यानी जो ख़ुद सबसे बड़ा धन हैं।

अब गीता का वो वचन। कृष्ण कहते हैं — "जो लोग किसी और का नहीं… बस मेरा चिन्तन करते हुए मुझे भजते हैं… उन भक्तों का योगक्षेम… मैं ख़ुद उठाता हूँ।"

योगक्षेम यानी? योग — जो ज़रूरी है पर पास नहीं, उसका मिलना। और क्षेम — जो पास है, उसका बचा रहना। यानी ज़रूरत भी… और सुरक्षा भी।

और ध्यान दीजिए — कृष्ण ने ये नहीं कहा कि "मैं तुम्हें अमीर बना दूँगा।" कहा — "तुम्हारी ज़रूरत… मेरी ज़िम्मेदारी।"

और सुदामा याद हैं? नौवें दिन की कहानी — चार मुट्ठी चिउड़े। लौटते समय सुदामा ने रास्ते में सोचा था — "मेरे मित्र बहुत देने वाले हैं। माँगने वाले को… बिना कहे, बादल की तरह दे देते हैं। और फिर चुपचाप देखते रहते हैं।"

बादल की तरह। बादल कभी नहीं पूछता — "तुमने माँगा क्यों नहीं?" बस बरस जाता है।

तो जिस चिन्ता से हमने शुरू किया था — पैसों की तंगी… मेहनत कीजिए, हिसाब रखिए — ये हमारा काम है। पर रात को उस बोझ को सिर पर लेकर मत सोइए। गीता कहती है — योगक्षेम का बोझ… कोई और भी उठा रहा है।

इसी श्लोक के बाक़ी नाम — नैकरूप, बृहद्रूप — अनेक रूपों वाले, विशाल रूप वाले। शिपिविष्ट — जो सूर्य की किरणों में, और हर शरीर में समाए हैं। और प्रकाशन — जो सबको रोशनी देते हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — वसुद… देने वाले। और वसु… जो ख़ुद सबसे बड़ा धन हैं।

दूसरी — गीता का वचन — योगक्षेम। ज़रूरत भी, और सुरक्षा भी।

तीसरी — मेहनत हमारी… बोझ उनका।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज सोने से पहले… तीन ऐसी चीज़ें गिनिए जो आपके पास हैं — छत, खाना, कोई अपना… और हर एक पर मन में कहिए — वसुदः।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — तीसवाँ श्लोक। एक महीना! कभी सोचा है — कौन-सा मंत्र जपूँ? गुरु नहीं मिला… दीक्षा नहीं हुई? कल का एक नाम… ख़ुद मंत्र है। कल।

वसुद… बादल की तरह।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.वसुद… देने वाले। और वसु… जो ख़ुद सबसे बड़ा धन हैं।
  2. 2.गीता का वचन — योगक्षेम। ज़रूरत भी, और सुरक्षा भी।
  3. 3.मेहनत हमारी… बोझ उनका।