विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 28 / 108 · अट्ठाईसवें श्लोक के नौ नाम

सच्चाई का ज़माना नहीं रहा?

धर्म एक पाँव पर खड़ा है

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वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥

वृषाही वृषभ विष्णु वृषपर्वा वृषोदर वर्धन वर्धमान विविक्त श्रुतिसागर

वृषाही, वृषभ, विष्णु, वृषपर्वा, वृषोदर; वर्धन, वर्धमान, विविक्त, श्रुतिसागर।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

आजकल अख़बार देखिए, या अपने आसपास देखिए, तो कभी-कभी लगता है कि सच्चाई का ज़माना ही नहीं रहा, हर तरफ़ झूठ, छल और बेईमानी है, और सच बोलने वाला ही बेवकूफ़ बनता है। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

कल मैंने आपसे कहा था कि आज की कहानी एक ऐसे बैल की है जो बस एक पाँव पर खड़ा था। वो बैल कौन था, ये आज के अट्ठाईसवें श्लोक का एक नाम बताता है। पहले ये श्लोक ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम की एक सौ आठ दिन की इस यात्रा में आज अट्ठाईसवाँ दिन है, और आज के श्लोक में नौ नाम हैं।

पहले कल का हाल पूछ लूँ। कल रोज़ दिखने वाले किसी इंसान का नाम पूछा, उन्हें नाम से पुकारा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में अट्ठाईसवाँ मनका जुड़ गया।

श्लोक का पहला नाम है वृषाही। वृष यानी धर्म, तो वृषाही यानी धर्म के स्वभाव वाले। और दूसरा नाम वही है जिसका कल वादा किया था, वृषभ, यानी बैल। हमारे शास्त्रों में धर्म को बैल के रूप में देखा गया है, तो वृषभ यानी ख़ुद धर्म। और तीसरा नाम है विष्णु, यानी जो सब जगह फैले हैं, और जिनके नाम पर ये पूरा सहस्रनाम है।

अब भागवत की कहानी सुनिए। कृष्ण इस धरती से जा चुके थे, और एक दिन धर्म, एक बैल के रूप में, धरती माता से मिला, जो एक गाय के रूप में थीं, और जिनका मुँह आँसुओं से भीगा हुआ था। और वो बैल बस एक पाँव पर चल रहा था।

तभी राजा परीक्षित ने देखा कि राजा के वेश में एक दुष्ट हाथ में डंडा लिए उस बैल और गाय को पीट रहा है, और बैल एक पाँव पर खड़ा काँप रहा है। परीक्षित ने धनुष उठाया और गरजकर कहा, "मेरे राज्य में निर्बल को मारने वाला तू कौन है?" और फिर बैल से बड़े प्यार से पूछा, "आपके तीन पाँव किसने काटे?"

और तब सारी बात खुली। धर्म के चार पाँव थे, तप, पवित्रता, दया और सत्य। घमण्ड, मोह और नशे ने उसके तीन पाँव तोड़ दिए थे, और अब बस एक पाँव बचा था, सत्य। और वो दुष्ट था कलि, जो उस आख़िरी पाँव को भी छीन लेना चाहता था।

परीक्षित ने कलि को अपने राज्य से निकाल दिया, और भागवत कहती है कि उन्होंने बैल के तीनों टूटे पाँव फिर से जोड़ दिए।

तो जिस निराशा से हमने आज शुरू किया था, कि सच्चाई का ज़माना नहीं रहा, उसके लिए इस कहानी में बहुत ईमानदार बात है। भागवत ये नहीं कहती कि सब ठीक है। धर्म कमज़ोर हुआ है, हाँ, वो एक पाँव पर है, पर गिरा नहीं है, खड़ा है। और वो एक पाँव है सत्य। तो हर बार जब कोई सच बोलता है, चाहे छोटी-सी बात में, वो उसी एक पाँव को टिकाए रखता है। आपका हर सच मायने रखता है।

इसी श्लोक के बाक़ी नाम भी सुन लीजिए। वृषपर्वा और वृषोदर, यानी जिनका हर पर्व, हर अंग धर्म है। वर्धन और वर्धमान, यानी जो सबको बढ़ाते हैं, और ख़ुद भी बढ़ते जाते हैं। विविक्त, यानी जो सबमें रहकर भी अलग हैं। और श्रुतिसागर, यानी वो सागर जिसमें सारे वेद आकर मिलते हैं।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जहाँ एक छोटा-सा झूठ बोलना आसान लगे, वहाँ सच बोलिए, और मन में कहिए, वृषभ।

और रोज़ की तरह, आज का श्लोक एक बार गाइए, हो सके तो पूरा सहस्रनाम भी सुनिए, और कमेंट में लिख दीजिए कि आपने गाया, या सुना।

कल हम उनतीसवें श्लोक पर आएँगे। अगर पैसों की तंगी चल रही है, महीने के आख़िर में हिसाब नहीं बैठता, तो कल का एक नाम उसका है जो देने वाला है, और साथ में गीता का एक वचन भी सुनाऊँगा।

वृषभ, यानी वो धर्म जो एक पाँव पर है, पर खड़ा है। जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक मेरे साथ गाइए।

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.वृषभ यानी धर्म। और धर्म के चार पाँव — तप, पवित्रता, दया, सत्य।
  2. 2.आज धर्म एक पाँव पर है। पर गिरा नहीं है।
  3. 3.आपका हर सच… उस एक पाँव को टिकाए रखता है।