विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 27 / 108 · सत्ताईसवें श्लोक के नौ नाम

करोड़ों में मेरी क्या गिनती?

आप नम्बर नहीं हैं

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असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥

असंख्येय अप्रमेयात्मा विशिष्ट शिष्टकृत् शुचि सिद्धार्थ सिद्धसङ्कल्प सिद्धिद सिद्धिसाधन

असंख्येय, अप्रमेयात्मा, विशिष्ट, शिष्टकृत्, शुचि; सिद्धार्थ, सिद्धसङ्कल्प, सिद्धिद, सिद्धिसाधन।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

करोड़ों लोगों की इस भीड़ में… कभी लगता है — मेरी क्या गिनती? मैं तो बस एक नम्बर हूँ?

कल हमने कहा था — आज का पहला नाम उसका है… जिसकी ख़ुद कोई गिनती नहीं हो सकती। वो नाम… सत्ताईसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज सत्ताईसवाँ दिन। आज के नौ नाम।

पहले कल का हाल — कल कोई पुरानी ग़लती याद आई… तो ख़ुद को कोसने के बजाय नारायण कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… सत्ताईसवाँ मनका।

और आज का पहला नाम ही वो है — असंख्येय। संख्या — गिनती। असंख्येय — जिन्हें गिना ही नहीं जा सकता। और उसके ठीक बाद — अप्रमेयात्मा। जिनकी आत्मा का कोई माप नहीं।

अब भागवत की एक अद्भुत कहानी सुनिए। वृन्दावन में कृष्ण अपने ग्वाल-बाल दोस्तों और बछड़ों के साथ खेल रहे थे। और ब्रह्मा जी ने सोचा — इनकी लीला देखूँ। तो उन्होंने चुपके से… सारे बछड़े और सारे ग्वाल-बाल छिपा दिए।

कृष्ण ने चारों तरफ़ ढूँढा… और समझ गए — ये ब्रह्मा का काम है।

और तब कृष्ण ने क्या किया? वो ख़ुद… हर एक बछड़ा बन गए। और हर एक ग्वाल-बाल।

और सुनिए — कैसे? भागवत कहती है — जितने बच्चे थे, वैसे ही हाथ-पैर। वैसी ही छड़ियाँ, वैसी ही बाँसुरियाँ। वैसे ही कपड़े, वैसे ही गहने। वैसा ही स्वभाव… वैसा ही नाम… वैसा ही खेल।

हर बच्चा… अपनी पूरी पहचान के साथ। कोई भी "बस एक और" नहीं।

शाम को बच्चे घर लौटे… और माँओं ने उन्हें ऐसे गले लगाया… जैसे पहले कभी नहीं लगाया था। पूरे एक साल तक… ये चलता रहा।

और जब ब्रह्मा जी लौटे… तो उन्होंने देखा — हर बछड़ा, हर बच्चा… चार भुजाओं वाला विष्णु था। श्याम रंग, पीले वस्त्र, हाथों में शंख, चक्र, गदा, कमल। अनगिनत।

ब्रह्मा जी स्तब्ध रह गए। अपने हंस से उतरे… और कृष्ण के चरणों में गिर पड़े। बार-बार उठते… और फिर गिर पड़ते।

तो जिस सवाल से हमने शुरू किया था — मेरी क्या गिनती? जो असंख्येय हैं… उन्होंने किसी को गिनती में नहीं देखा। हर एक को… उसकी छड़ी, उसकी बाँसुरी, उसके नाम के साथ जिया। आप नम्बर नहीं हैं।

इसी श्लोक में और नाम भी हैं। विशिष्ट — सबसे अलग, सबसे ख़ास। शिष्टकृत् — जो भले लोगों को गढ़ते हैं। शुचि — पवित्र।

और आख़िरी चार — सिद्धार्थ, सिद्धसङ्कल्प, सिद्धिद, सिद्धिसाधन। जिनका हर उद्देश्य पहले से पूरा है। जिनका संकल्प कभी अधूरा नहीं रहता। जो सिद्धि देते हैं… और जो ख़ुद सिद्धि तक पहुँचने का साधन हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — असंख्येय। उनके रूप अनगिनत हैं।

दूसरी — फिर भी… उनके लिए हर एक अलग है, ख़ास है।

तीसरी — भीड़ में खोया हुआ लगे… तो याद रखिए — वो आपकी बाँसुरी तक पहचानते हैं।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज किसी ऐसे इंसान का नाम पूछिए… जिसे आप रोज़ देखते हैं पर नाम नहीं जानते — चौकीदार, सफ़ाई वाले, सब्ज़ी वाले। और उसे नाम से पुकारते हुए मन में कहिए — असंख्येय।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — अट्ठाईसवाँ श्लोक। आजकल लगता है… सच्चाई का ज़माना ही नहीं रहा? कल की कहानी एक बैल की है… जो बस एक पाँव पर खड़ा था। कल।

असंख्येय… और फिर भी, आप उनके लिए एक हैं।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.असंख्येय। उनके रूप अनगिनत हैं।
  2. 2.फिर भी… उनके लिए हर एक अलग है, ख़ास है।
  3. 3.भीड़ में खोया हुआ लगे… तो याद रखिए — वो आपकी बाँसुरी तक पहचानते हैं।