विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 26 / 108 · छब्बीसवें श्लोक के ग्यारह नाम
बहुत ग़लत किया है?
रास्ता हमेशा बचा है
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सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥
सुप्रसाद, प्रसन्नात्मा, विश्वधृक्, विश्वभुक्, विभु; सत्कर्ता, सत्कृत, साधु, जह्नु, नारायण, नर।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
ज़िन्दगी में बहुत ग़लत किया है? और अब लगता है… मेरे लिए कोई रास्ता नहीं बचा?
कल हमने कहा था — आज एक ऐसे आदमी की कहानी होगी… जिसने मरते समय बस अपने बेटे का नाम पुकारा। वो नाम… छब्बीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज छब्बीसवाँ दिन। आज के ग्यारह नाम।
पहले कल का हाल — आज सुबह पाँव ज़मीन पर रखने से पहले… धरती छूकर धरणीधर कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… छब्बीसवाँ मनका।
पहले दो नाम — सुप्रसाद और प्रसन्नात्मा। जिनकी कृपा बहुत आसानी से होती है… और जो ख़ुद भीतर से प्रसन्न हैं।
फिर — विश्वधृक्, विश्वभुक्, विभु। जो विश्व को थामते हैं… विश्व को पालते हैं… और हर जगह फैले हैं।
और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — नारायण।
भागवत में कहानी है — अजामिल की। कान्यकुब्ज में एक ब्राह्मण था। पर उसने सब ग़लत रास्ते पकड़ लिए। लूट, जुआ, छल, चोरी… और बूढ़े माँ-बाप को भी बेसहारा छोड़ दिया।
उसके दस बेटे थे। और सबसे छोटा — उसे सबसे प्यारा था। तोतली बोली बोलता था। बूढ़ा अजामिल उसे खेलते देखकर ख़ुश होता रहता। और उस बच्चे का नाम था — नारायण।
फिर अजामिल का अन्त समय आया। उसने देखा — तीन भयानक यमदूत… हाथ में फंदा लिए… उसे लेने आए हैं।
घबराकर उसने… दूर खेलते अपने बेटे को पुकारा — "नारायण!"
और भागवत कहती है — मरते हुए आदमी के मुँह से अपने स्वामी का नाम सुनकर… भगवान के पार्षद तुरन्त आ पहुँचे। और यमदूतों को रोक दिया।
यमदूत बोले — "ये तो पापी है!" भगवान के दूतों ने कहा — "इसने 'नारायण' — ये चार अक्षर कहे हैं। बेटे के बहाने ही सही… पर नाम लिया है।"
और फिर क्या हुआ? अजामिल को दूसरा मौक़ा मिला। और उसे अपने किए पर गहरा पछतावा हुआ — "कहाँ मैं… और कहाँ ये मंगलमय नाम — नारायण!"
और उसने ठान लिया — "अब मैं सबका हितैषी बनूँगा। शान्त, दयालु, संयमी।" और उसने सच में अपनी ज़िन्दगी बदल दी।
तो जिस डर से हमने शुरू किया था — कि बहुत ग़लत किया है… नाम एक दरवाज़ा खोलता है। अजामिल उस दरवाज़े से निकला… और फिर बदल गया। रास्ता हमेशा बचा रहता है।
इसी श्लोक के बाक़ी नाम — सत्कर्ता, सत्कृत, साधु — जो सबका आदर करते हैं, जिनका सब आदर करते हैं, जो सबसे भले हैं। जह्नु — जिनसे गंगा निकलीं। और नर — जो नारायण के साथ, हर मनुष्य के भीतर की आत्मा हैं।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — नारायण का नाम… बहाने से लिया जाए, तब भी काम करता है।
दूसरी — नाम दरवाज़ा खोलता है… चलना हमें पड़ता है। अजामिल चला।
तीसरी — कोई इतना दूर नहीं गया… कि लौट न सके।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब कोई पुरानी ग़लती याद आए… तो ख़ुद को कोसने के बजाय… बस धीरे से कहिए — नारायण।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — सत्ताईसवाँ श्लोक। करोड़ों लोगों की इस दुनिया में… कभी लगता है, मेरी क्या गिनती? कल का पहला नाम उसका है… जिसकी ख़ुद कोई गिनती नहीं हो सकती। कल।
नारायण… रास्ता हमेशा बचा है।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.नारायण का नाम… बहाने से लिया जाए, तब भी काम करता है।
- 2.नाम दरवाज़ा खोलता है… चलना हमें पड़ता है। अजामिल चला।
- 3.कोई इतना दूर नहीं गया… कि लौट न सके।