विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 25 / 108 · पच्चीसवें श्लोक के आठ नाम

सब डूब रहा है?

ज़मीन थमी हुई है

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आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥

आवर्तन निवृत्तात्मा संवृत सम्प्रमर्दन अहःसंवर्तक वह्नि अनिल धरणीधर

आवर्तन, निवृत्तात्मा, संवृत, सम्प्रमर्दन; अहः-संवर्तक, वह्नि, अनिल, धरणीधर।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

कभी ऐसा लगा है कि सब कुछ एक साथ डूब रहा है, काम, पैसा, घर, भरोसा, और पैरों के नीचे जैसे कोई ज़मीन ही नहीं बची?

कल मैंने आपसे कहा था कि एक बार पूरी धरती गहरे जल में डूब गई थी, और भगवान ने उसे अपने दाँत पर उठाकर बाहर निकाला था। उस रूप का नाम आज के पच्चीसवें श्लोक का आख़िरी नाम है। पहले ये श्लोक ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम की एक सौ आठ दिन की इस यात्रा में आज पच्चीसवाँ दिन है, और आज के श्लोक में आठ नाम हैं।

पहले कल का हाल पूछ लूँ। कल किसी की बात फ़ोन नीचे रखकर पूरे ध्यान से सुनी, मन में सहस्राक्ष कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में पच्चीसवाँ मनका जुड़ गया।

श्लोक की शुरुआत चार नामों से होती है, आवर्तन, निवृत्तात्मा, संवृत और सम्प्रमर्दन, यानी जो संसार का पहिया घुमाते हैं, जो भीतर से शान्त और अलग हैं, जो सबको ढके हुए हैं, और जो हर रुकावट को मसल देते हैं। फिर तीन नाम आते हैं, अहःसंवर्तक, वह्नि और अनिल, यानी जो दिन को समेटकर उसकी शाम लाते हैं, जो आग हैं, और जो हवा हैं।

और आख़िरी नाम, जिसका कल वादा किया था, धरणीधर। धरणी यानी धरती, और धर यानी थामने वाला, तो धरणीधर यानी धरती को थामने वाले।

भागवत में कहानी है कि सृष्टि की शुरुआत में पूरी धरती गहरे जल में डूबकर रसातल में चली गई थी। ब्रह्मा जी बहुत देर तक सोचते रहे कि इसे कैसे निकालूँ, और आख़िर में बोले, "जिनसे मैं जन्मा हूँ, वही ये काम करें।" और उसी पल ब्रह्मा जी की नाक से अँगूठे जितना एक छोटा-सा वराह निकला। और देखते ही देखते वो हाथी जितना बड़ा हो गया, और ब्रह्मा जी और सारे ऋषि हैरान होकर सोचने लगे कि ये कौन है।

वो वराह गरजा और जल में कूद गया, इतने वेग से कि समुद्र भी पुकार उठा, "हे यज्ञेश्वर, मेरी रक्षा करो।" और गहरे, बहुत गहरे जाकर उन्हें धरती मिली, सब प्राणियों का घर, और उन्होंने उसे अपने सफ़ेद दाँत की नोक पर उठा लिया।

ऋषियों ने ऊपर से देखा, श्याम रंग का वराह, और उसके दाँत पर टिकी पूरी धरती, पहाड़ों समेत, ऐसे जैसे किसी हाथी के दाँत पर एक छोटा-सा कमल रखा हो। और फिर भगवान ने जल को अपने खुरों से स्थिर किया, और धरती को उस पर आराम से रख दिया।

तो जिस डर से हमने आज शुरू किया था, कि सब डूब रहा है, उसके लिए ये कहानी बड़ा भरोसा देती है। जब पूरी धरती डूबी थी, तब भी कोई नीचे तक गया, सबसे गहरी जगह तक, और उसे उठाकर फिर से टिका दिया। और ध्यान दीजिए, वो अँगूठे जितने छोटे बनकर आए, और ज़रूरत पड़ी तो पहाड़ जितने बड़े हो गए। आपकी डूबी हुई चीज़ कितनी भी गहरी हो, जो धरती को थामे हुए हैं, उनके लिए कोई गहराई बहुत गहरी नहीं है।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। सुबह बिस्तर से उठकर पाँव ज़मीन पर रखने से पहले, हाथ से धरती को छूकर प्रणाम कीजिए, जैसे हमारे घरों में बड़े-बूढ़े करते आए हैं, और मन में कहिए, धरणीधर।

और रोज़ की तरह, आज का श्लोक एक बार गाइए, हो सके तो पूरा सहस्रनाम भी सुनिए, और कमेंट में लिख दीजिए कि आपने गाया, या सुना।

कल हम छब्बीसवें श्लोक पर आएँगे। अगर आपको लगता है कि ज़िन्दगी में बहुत ग़लत किया है, तो कल की कहानी ख़ास आपके लिए है। एक ऐसा आदमी, जिसने मरते समय बस अपने बेटे का नाम पुकारा, और भगवान के दूत दौड़े चले आए।

धरणीधर, यानी वो जिन्होंने आपके पैरों के नीचे की ज़मीन थाम रखी है। जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक मेरे साथ गाइए।

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.धरणीधर। जिस ज़मीन पर आप खड़े हैं… उसे कोई थामे हुए है।
  2. 2.भगवान अँगूठे जितने छोटे बनकर भी आते हैं… और ज़रूरत हो तो पहाड़ जितने बड़े भी।
  3. 3.डूबी हुई चीज़ को उठाने के लिए… वो सबसे गहरे जाते हैं।