विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 24 / 108 · चौबीसवें श्लोक के दस नाम
कोई मेरी सुनता नहीं?
हज़ार आँखें आप पर हैं
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥
अग्रणी, ग्रामणी, श्रीमान्, न्याय, नेता, समीरण; सहस्रमूर्धा, विश्वात्मा, सहस्राक्ष, सहस्रपात्।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
क्या कभी ऐसा लगता है कि कोई आपकी सुनता ही नहीं, अपने घर में भी, अपने लोगों के बीच भी, जैसे आपकी कोई जगह ही नहीं है?
कल मैंने आपसे कहा था कि आज एक पाँच साल के बच्चे की कहानी होगी, जिसकी बात घर में किसी ने नहीं सुनी। और उसे देखने जो आया, उसका नाम आज के चौबीसवें श्लोक में है। पहले ये श्लोक ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम की एक सौ आठ दिन की इस यात्रा में आज चौबीसवाँ दिन है, और आज के श्लोक में दस नाम हैं।
पहले कल का हाल पूछ लूँ। कल किसी सिखाने वाले को याद किया, फ़ोन किया या मन में प्रणाम किया? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में चौबीसवाँ मनका जुड़ गया।
श्लोक की शुरुआत छह नामों से होती है, अग्रणी, ग्रामणी, श्रीमान्, न्याय, नेता और समीरण, यानी जो सबसे आगे चलते हैं, सबको राह दिखाते हैं, जो ख़ुद न्याय हैं, और जो हवा की तरह सबको चलाते हैं। और फिर आते हैं वो नाम, जिनका कल वादा किया था, सहस्रमूर्धा, सहस्राक्ष और सहस्रपात्, यानी हज़ार सिर, हज़ार आँखें, हज़ार पाँव। मतलब कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ उनकी नज़र न हो।
भागवत में ध्रुव की कहानी आती है। राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं, और छोटी रानी राजा को ज़्यादा प्यारी थी। बड़ी रानी सुनीति का बेटा था ध्रुव, बस पाँच साल का। एक दिन राजा छोटी रानी के बेटे को गोद में बिठाकर दुलार रहे थे, और ध्रुव भी पिता की गोद में चढ़ना चाहता था, पर राजा ने उसे पास नहीं बुलाया। और छोटी रानी ने उससे कहा, "तू इस गोद के लायक़ नहीं।" और पिता चुपचाप देखते रहे, कुछ नहीं बोले।
वो पाँच साल का बच्चा रोता हुआ अपनी माँ के पास गया। माँ ने उसे गोद में लिया, ख़ुद भी रो पड़ीं, और फिर बोलीं, "बेटा, किसी का बुरा मत सोच। कमल-नयन भगवान के सिवा मुझे कोई नहीं दिखता जो तेरा दुःख मिटा सके।" और वो पाँच साल का बच्चा अकेला जंगल चला गया, मधुवन में, भगवान को पुकारने।
और भागवत यहाँ एक बहुत सुन्दर बात कहती है, कि हज़ार सिरों वाले भगवान अपने भक्त को देखने की इच्छा से गरुड़ पर बैठकर मधुवन गए। ज़रा सोचिए, जिन्हें पिता ने गोद में नहीं बिठाया, उसे देखने के लिए पूरे ब्रह्माण्ड के स्वामी ख़ुद चलकर आए।
ध्रुव ने आँखें खोलीं तो भगवान सामने खड़े थे। वो ज़मीन पर गिर पड़ा, फिर हाथ जोड़कर खड़ा रहा, स्तुति करना चाहता था, पर इतना छोटा था कि बोलना ही नहीं आता था। और भगवान ने अपने शंख से धीरे से उसका गाल छू दिया, और उसी पल उस बच्चे को बोलना आ गया।
तो जिस दर्द से हमने आज शुरू किया था, कि कोई सुनता नहीं, उसे इस कहानी के साथ रखकर देखिए। जिन्हें घर में जगह नहीं मिली, उनके पास भगवान ख़ुद चलकर आए, और जो शब्द उसके पास नहीं थे, वो चुप्पी भी उन्होंने सुन ली। सहस्राक्ष का यही अर्थ है, कि उनकी नज़र आप पर भी है, उस वक़्त भी जब आपको लगता है कि कोई नहीं देख रहा।
और श्लोक का बाक़ी नाम है विश्वात्मा, यानी जो पूरे विश्व की आत्मा हैं।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज घर में किसी की बात, और हो सके तो किसी बच्चे की बात, फ़ोन नीचे रखकर, पूरे ध्यान से सुनिए, और मन में कहिए, सहस्राक्ष। क्योंकि किसी को सुन लेना भी बहुत बड़ी चीज़ है।
और रोज़ की तरह, आज का श्लोक एक बार गाइए, हो सके तो पूरा सहस्रनाम भी सुनिए, और कमेंट में लिख दीजिए कि आपने गाया, या सुना।
कल हम पच्चीसवें श्लोक पर आएँगे। एक बार पूरी धरती गहरे जल में डूब गई थी, और भगवान ने उसे अपने दाँत पर उठाकर बाहर निकाला था। वो कौन-सा रूप था, और उसका नाम क्या है, ये कल।
सहस्राक्ष, यानी वो जिनकी नज़र आप पर है। जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक मेरे साथ गाइए।
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.सहस्राक्ष। कोई जगह नहीं जहाँ उनकी नज़र न हो।
- 2.जिन्हें घर में जगह नहीं मिलती… उनके पास भगवान ख़ुद चलकर आते हैं।
- 3.शब्द न भी आएँ… वो चुप्पी भी सुन लेते हैं।