विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 23 / 108 · तेईसवें श्लोक के दस नाम
जिसने सिखाया, उसे शुक्रिया कहा?
भगवान भी गुरु के आगे झुके
Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥
गुरु, गुरुतम, धाम, सत्य, सत्यपराक्रम; निमिष, अनिमिष, स्रग्वी, वाचस्पति, उदारधी।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
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आज का सत्संग, पढ़कर
किसी ने आपको ज़िन्दगी में कुछ सिखाया था… और आप कभी ठीक से उनका शुक्रिया नहीं कर पाए?
कल हमने कहा था — जो सारे संसार के गुरु हैं… वो ख़ुद एक गुरु के आश्रम में पढ़ने गए। वो नाम… तेईसवें श्लोक का पहला नाम है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज तेईसवाँ दिन। आज के दस नाम।
पहले कल का हाल — कल जिससे बात बंद थी… उसे "कैसे हो?" भेजा? मन में सन्धाता कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… तेईसवाँ मनका।
और आज के पहले दो नाम ही वो हैं… जिनका कल वादा किया था — गुरु… और गुरुतम। गुरु — जो अँधेरे से रोशनी में ले जाए। और गुरुतम — गुरुओं में भी सबसे बड़े। जिन्होंने अर्जुन को गीता सुनाई।
पर सुनिए — भागवत क्या कहती है। कृष्ण सब कुछ जानते थे। सारी विद्याएँ उन्हीं से निकलती हैं। फिर भी… उन्होंने अपना ज्ञान छिपाया। और बलराम के साथ… उज्जैन में गुरु सान्दीपनि के आश्रम पढ़ने गए।
और वहाँ कैसे रहे? भागवत कहती है — गुरु की सेवा… ऐसे करते थे, जैसे किसी देवता की करते हों। भक्ति से। आदर से।
गुरु ने उन्हें वेद पढ़ाए, धनुर्विद्या, धर्मशास्त्र, राजनीति… और भागवत कहती है — एक बार सुनकर ही वो सब सीख गए। चौंसठ दिनों में… चौंसठ कलाएँ।
फिर आया गुरुदक्षिणा का समय। कृष्ण ने कहा — "गुरुदेव, कुछ माँगिए।"
गुरु और गुरुपत्नी ने आपस में बात की। उनका एक बेटा था… जो प्रभास के समुद्र में डूबकर मर गया था। और उन्होंने माँगा — "हमारा बेटा।"
कृष्ण ने कहा — "ठीक है।" वो समुद्र तक गए… फिर समुद्र के नीचे… फिर यमराज की नगरी तक। और गुरु के बेटे को लौटा लाए।
गुरु के सामने खड़ा कर दिया… और बोले — "और कुछ माँगिए।"
गुरु की आँखें भर आईं। बोले — "बेटा, तुम जैसे शिष्यों के गुरु की… कौन-सी इच्छा बाक़ी रह सकती है? जाओ… तुम्हारा पढ़ा हुआ सदा नया रहे।"
तो जिस बात से हमने शुरू किया था — वो गुरु, वो शिक्षक… जिनका शुक्रिया नहीं कर पाए… जब भगवान ख़ुद गुरु के आगे झुके… तो हम भी झुक सकते हैं। देर कभी नहीं होती।
इसी श्लोक में और नाम भी हैं। धाम — जो ख़ुद आख़िरी ठिकाना हैं। सत्य, और सत्यपराक्रम — जो सच्चे हैं, और जिनका पराक्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
फिर — निमिष और अनिमिष। पलक झपकने वाले… और कभी पलक न झपकने वाले। मनुष्यों में भी, देवताओं में भी।
और आख़िर में — स्रग्वी, वाचस्पति, उदारधी। माला पहनने वाले। वाणी के स्वामी। और बड़ी, उदार बुद्धि वाले।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — जो सब जानते थे… वो भी गुरु के पास सीखने गए।
दूसरी — गुरु की सेवा… देवता की तरह।
तीसरी — शुक्रिया कहने में… कभी देर नहीं होती।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज किसी एक ऐसे इंसान को याद कीजिए… जिसने आपको कुछ सिखाया था — हो सके तो फ़ोन कीजिए। न हो सके… तो मन में प्रणाम कीजिए। और कहिए — गुरुः।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — चौबीसवाँ श्लोक। एक पाँच साल का बच्चा… जिसकी बात घर में किसी ने नहीं सुनी। वो जंगल चला गया… और उसे देखने वाले की हज़ार आँखें थीं। कल।
गुरुः… देर कभी नहीं होती।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.जो सब जानते थे… वो भी गुरु के पास सीखने गए।
- 2.गुरु की सेवा… देवता की तरह।
- 3.शुक्रिया कहने में… कभी देर नहीं होती।