विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 22 / 108 · बाईसवें श्लोक के ग्यारह नाम
अपनों से बात बंद?
कोशिश का भी पुण्य है
Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥
अमृत्यु, सर्वदृक्, सिंह, सन्धाता, सन्धिमान्, स्थिर; अज, दुर्मर्षण, शास्ता, विश्रुतात्मा, सुरारिहा।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
Kept on this device.
आज का सत्संग, पढ़कर
घर में दरार पड़ गई है? भाई-भाई में… माँ-बेटे में… बातचीत बंद?
कल हमने कहा था — आज उसका नाम आएगा जो टूटे को जोड़ता है… और जो महाभारत का युद्ध रोकने ख़ुद दूत बनकर गया था। वो नाम… बाईसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज बाईसवाँ दिन। आज के ग्यारह नाम।
पहले कल का हाल — कल आईने में अपनी आँखों में देखा? मन में हंसः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… बाईसवाँ मनका।
पहले तीन नाम — अमृत्यु, सर्वदृक्, सिंह। जिनकी मृत्यु नहीं। जो सब देखते हैं। और जो सिंह जैसे निडर हैं।
और अब वो दो नाम… जिनका कल वादा किया था — सन्धाता… और सन्धिमान्। सन्धि यानी — जोड़। मेल। समझौता। सन्धाता — जो टूटे को जोड़ते हैं।
और महाभारत में ये काम उन्होंने ख़ुद किया। पाण्डवों का सब कुछ छिन चुका था — राज्य, घर, सब। फिर भी युधिष्ठिर ने कृष्ण से कहा — "हमें बस पाँच गाँव दे दें… जहाँ हम पाँचों भाई साथ रह सकें। ताकि हमारे कारण भरतवंश नष्ट न हो।"
और कृष्ण ख़ुद दूत बनकर हस्तिनापुर गए। वहाँ विदुर ने उनसे कहा — "दुर्योधन नहीं मानेगा। आप क्यों आए?"
और कृष्ण ने जो उत्तर दिया… वो सुनिए। "विदुर, मैं सब जानता हूँ — उसकी दुष्टता भी, और इस दुश्मनी को भी। ये जानते हुए भी… मैं आज आया हूँ।"
"क्योंकि अगर कोई पूरी ताक़त से भले काम की कोशिश करे… और फिर भी पूरा न कर पाए… तब भी उसे उस काम का पुण्य मिलता है।"
और हुआ भी वही। दुर्योधन ने सभा में साफ़ कहा — "सुई की नोक जितनी ज़मीन भी… पाण्डवों को नहीं दूँगा।"
युद्ध हुआ। पर सन्धाता ने कोशिश की थी। पूरी ताक़त से।
तो जिस दरार से हमने शुरू किया था — अपनों से बात बंद… जोड़ना आपके बस में हो या न हो… कोशिश आपके बस में है। और भगवान ने कहा है — कोशिश का भी पुण्य है।
इसी श्लोक में और नाम भी हैं। स्थिर — जो डगमगाते नहीं। अज — अजन्मा। दुर्मर्षण — जिन्हें कोई हरा नहीं सकता।
और आख़िरी तीन — शास्ता, विश्रुतात्मा, सुरारिहा। शास्ता — जो प्यार से सुधारते हैं। विश्रुतात्मा — जिनका यश सब जगह फैला है। और सुरारिहा — जो देवताओं के शत्रुओं का अंत करते हैं।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — सन्धाता यानी… जो टूटे को जोड़ते हैं।
दूसरी — कृष्ण जानते थे कि दुर्योधन नहीं मानेगा। फिर भी गए।
तीसरी — नतीजा आपके हाथ में नहीं… कोशिश आपके हाथ में है।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। जिससे बात बंद है… आज उसे एक छोटा-सा संदेश भेजिए। बस इतना — "कैसे हो?" और भेजते हुए मन में कहिए — सन्धाता।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — तेईसवाँ श्लोक। जो सारे संसार के गुरु हैं… वो ख़ुद एक गुरु के आश्रम में पढ़ने गए। और गुरुदक्षिणा में क्या दिया? कल।
सन्धाता… कोशिश का भी पुण्य है।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.सन्धाता यानी… जो टूटे को जोड़ते हैं।
- 2.कृष्ण जानते थे कि दुर्योधन नहीं मानेगा। फिर भी गए।
- 3.नतीजा आपके हाथ में नहीं… कोशिश आपके हाथ में है।