विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 21 / 108 · इक्कीसवें श्लोक के नौ नाम

मैं कौन हूँ?

भीतर जो है, वो छिनता नहीं

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मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥

मरीचि दमन हंस सुपर्ण भुजगोत्तम हिरण्यनाभ सुतपा पद्मनाभ प्रजापति

मरीचि, दमन, हंस, सुपर्ण, भुजगोत्तम; हिरण्यनाभ, सुतपा, पद्मनाभ, प्रजापति।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

कभी अकेले बैठकर सोचा है कि मैं असल में कौन हूँ? अगर मेरा नाम, मेरी नौकरी, मेरे रिश्ते, मेरी पहचान, ये सब एक पल के लिए हटा दिए जाएँ, तो फिर क्या बचता है?

कल मैंने आपसे कहा था कि भगवान एक बार हंस बनकर आए थे, और ऋषियों ने उनसे पूछा था, "आप कौन हैं?" वो हंस आज के इक्कीसवें श्लोक में है। पहले ये श्लोक ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम की एक सौ आठ दिन की इस यात्रा में आज इक्कीसवाँ दिन है, और आज के श्लोक में नौ नाम हैं।

पहले कल का हाल पूछ लूँ। कल किसी से सीधे, बिना बहाने के, "माफ़ कीजिए" कहा, मन में गोविन्द कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में इक्कीसवाँ मनका जुड़ गया।

श्लोक के पहले दो नाम हैं मरीचि और दमन। मरीचि यानी रोशनी की किरण, और दमन यानी जो बेलगाम चीज़ों को काबू में करते हैं। और फिर आता है वो नाम, जिसका कल वादा किया था, हंस। आचार्य कहते हैं कि हंस वो आत्मा है जो कहीं भी बेरोक-टोक आती-जाती है, जिसे कोई बाँध नहीं सकता।

भागवत में कहानी है कि ब्रह्मा जी के चार पुत्र थे, सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार। उन्होंने अपने पिता से एक बड़ा कठिन सवाल पूछा, "मन विषयों में घुस जाता है, और विषय मन में घुस जाते हैं, तो जो मुक्त होना चाहे, वो इन्हें अलग कैसे करे?" ब्रह्मा जी ने बहुत सोचा, पर उत्तर की जड़ तक नहीं पहुँच पाए, तो उन्होंने भगवान को याद किया।

और भगवान आए, एक हंस बनकर। ऋषियों ने उस हंस के पाँव छुए और पूछा, "आप कौन हैं?" अब ज़रा सोचिए, यही सवाल हम किसी से पूछें तो वो अपना नाम बताएगा, अपना गाँव, अपना काम। पर हंस ने जो उत्तर दिया, वो सुनिए।

और हंस ने जो उत्तर दिया, वो ये था, "ब्राह्मणो, अगर आत्मा में कोई भेद ही नहीं है, तो 'आप कौन हैं', ये सवाल किस आधार पर? सब प्राणी पाँच तत्त्वों से बने हैं, और भीतर से सब एक-से हैं, तो 'आप कौन', ये बस एक शब्द है।" और फिर हंस ने कहा, "मन से, वाणी से, आँख से, जो कुछ भी पकड़ में आता है, वो मैं ही हूँ, मुझसे अलग कुछ भी नहीं।"

तो जिस सवाल से हमने आज शुरू किया था, कि मैं कौन हूँ, उसे इस उत्तर के साथ रखकर देखिए। नाम बदल जाते हैं, नौकरी बदल जाती है, रिश्ते भी बदल जाते हैं, और कभी-कभी इन्हीं के बदलने से हमें लगता है कि हम ख़ुद खो गए। पर भीतर जो है, वो उसी हंस का है, और उसे कोई आपसे छीन नहीं सकता। और जब हम ये समझ लेते हैं कि सब प्राणी भीतर से एक-से हैं, तो दूसरों को देखने का नज़रिया भी थोड़ा बदल जाता है।

इसी श्लोक में और नाम भी हैं। सुपर्ण, यानी सुन्दर पंखों वाले गरुड़, भुजगोत्तम, यानी सर्पों में श्रेष्ठ, फिर हिरण्यनाभ, यानी सुनहरी नाभि वाले, और सुतपा, यानी बड़े तप वाले। और आख़िरी दो नाम हैं पद्मनाभ और प्रजापति, जो हम पहले भी सुन चुके हैं, कमल-नाभि वाले, और सब प्राणियों के स्वामी।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज जब आप आईने में ख़ुद को देखें, तो एक पल के लिए अपना नाम, अपना काम, सब भूल जाइए, बस अपनी आँखों में देखिए, और मन में कहिए, हंसः।

और रोज़ की तरह, आज का श्लोक एक बार गाइए, हो सके तो पूरा सहस्रनाम भी सुनिए, और कमेंट में लिख दीजिए कि आपने गाया, या सुना।

कल हम बाईसवें श्लोक पर आएँगे। अगर घर में कोई दरार आ गई है, अपनों से बातचीत बन्द है, तो कल का नाम उसका है जो टूटे हुए को जोड़ता है, और जो महाभारत का युद्ध रोकने के लिए ख़ुद दूत बनकर गए थे।

हंसः, यानी वो जो आपके भीतर है, और जिसे कोई छीन नहीं सकता। जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक मेरे साथ गाइए।

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.आप सिर्फ़ अपना नाम या ओहदा नहीं हैं। भीतर कुछ और भी है।
  2. 2.सब प्राणी भीतर से एक-से हैं। यही हंस का उत्तर है।
  3. 3.जो कुछ दिखता है… उसमें वही है।