विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 20 / 108 · बीसवें श्लोक के आठ नाम
ग़लती के बाद सामने जाने में शर्म?
वो हँसकर माफ़ कर देते हैं
Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥
महेष्वास, महीभर्ता, श्रीनिवास, सतां गति; अनिरुद्ध, सुरानन्द, गोविन्द, गोविदां पति।
आज की साधना
- 1. आज का सत्संग सुनें।
- 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
- 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
Kept on this device.
आज का सत्संग, पढ़कर
किसी के साथ ग़लत कर दिया… और अब शर्म से उसके सामने जाने की हिम्मत नहीं होती?
कल हमने कहा था — जिस देवता ने गोकुल पर बारिश भेजी थी… वही ख़ुद आकर कृष्ण के पाँव छूता है, और उन्हें एक नाम देता है। वो नाम… बीसवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥
जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज बीसवाँ दिन। आज के आठ नाम।
पहले कल का हाल — कल अपनी छत के नीचे एक पल चुप बैठे? महाद्रिधृक् कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… बीसवाँ मनका।
पहले चार नाम — महेष्वास, महीभर्ता, श्रीनिवास… और सतां गति। बड़े धनुष वाले। धरती को सँभालने वाले। श्रीनिवास — जिनमें लक्ष्मी बसती हैं। और सतां गति — भले लोगों की आख़िरी मंज़िल।
फिर — अनिरुद्ध और सुरानन्द। जिन्हें कोई रोक नहीं सकता… और जो देवताओं का आनन्द हैं।
और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — गोविन्द।
कल की कहानी याद है? सात दिन की बारिश… और कृष्ण ने गोवर्धन उठाए रखा। बारिश थमी। इन्द्र की ताक़त हार गई।
और फिर… इन्द्र ख़ुद आए। अकेले। चुपचाप। अपने किए पर शर्मिंदा।
भागवत कहती है — उन्होंने अपने चमकते मुकुट से… कृष्ण के पाँव छुए। और हाथ जोड़कर कहा — "भगवन्, घमण्ड और ग़ुस्से में… मैंने गोकुल को डुबोना चाहा। आपने मुझ पर कृपा की। मेरा घमण्ड टूट गया। मैं आपकी शरण में हूँ।"
और कृष्ण ने क्या किया? वो हँस पड़े। बोले — "इन्द्र, जाओ… तुम्हारा कल्याण हो। बस घमण्ड छोड़कर… अपना काम करो।"
न सज़ा। न ताना। न पुरानी बात का ज़िक्र।
और तब… गायों की माता सुरभि आईं। बोलीं — "आप ही हमारे इन्द्र हैं।" सुरभि ने अपने दूध से कृष्ण का अभिषेक किया। और इन्द्र ने… आकाशगंगा के जल से अभिषेक करके… उन्हें एक नया नाम दिया — गोविन्द।
यानी — जिस देवता ने बारिश भेजी थी… उसी ने उन्हें सबसे प्यारा नाम दिया।
और इसी श्लोक का आख़िरी नाम — गोविदां पति। गो — यानी गाय, धरती, वाणी, वेद। गोविन्द — जो इन सबको पाते हैं, जानते हैं। और गोविदां पति — जो इन्हें जानने वालों के भी स्वामी हैं।
तो जिस शर्म से हमने शुरू किया था — कि ग़लती के बाद सामने कैसे जाएँ… इन्द्र गए। सिर झुकाकर। और जवाब में मिली… एक हँसी, और एक आशीर्वाद।
तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।
पहली — ग़लती मानने में… बड़ा साहस लगता है। इन्द्र ने किया।
दूसरी — भगवान पुरानी बात नहीं गिनते। हँसकर कहते हैं — जाओ, कल्याण हो।
तीसरी — सबसे प्यारा नाम — गोविन्द… एक माफ़ी के बाद मिला।
और आज के लिए एक छोटी-सी बात। अगर किसी का दिल दुखाया है — आज उससे सीधे, बिना बहाने के… "माफ़ कीजिए" कहिए। और मन में कहिए — गोविन्द।
और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।
कल — इक्कीसवाँ श्लोक। भगवान एक बार हंस बनकर आए। ऋषियों ने उनसे पूछा — "आप कौन हैं?" और उनके उत्तर ने सबको चुप कर दिया। कल।
गोविन्द… जाओ, कल्याण हो।
जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥
आज घर ले जाने के लिए
- 1.ग़लती मानने में… बड़ा साहस लगता है। इन्द्र ने किया।
- 2.भगवान पुरानी बात नहीं गिनते। हँसकर कहते हैं — जाओ, कल्याण हो।
- 3.सबसे प्यारा नाम — गोविन्द… एक माफ़ी के बाद मिला।