विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 19 / 108 · उन्नीसवें श्लोक के आठ नाम

मुसीबतों की बारिश थमती नहीं?

पहाड़ नहीं गिरेगा

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महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥

महाबुद्धि महावीर्य महाशक्ति महाद्युति अनिर्देश्यवपु श्रीमान् अमेयात्मा महाद्रिधृक्

महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति, महाद्युति; अनिर्देश्यवपु, श्रीमान्, अमेयात्मा, महाद्रिधृक्।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

कभी-कभी ज़िन्दगी में मुसीबतों की ऐसी बारिश होती है कि एक थमती नहीं और दूसरी आ जाती है, और लगता है कि सिर छुपाने की कोई जगह ही नहीं बची। क्या आपके साथ भी अभी ऐसा ही कुछ चल रहा है?

कल मैंने आपसे कहा था कि आज उस बच्चे की कहानी होगी, जिसने सात दिन तक एक हाथ पर पूरा पहाड़ उठाए रखा। उसका नाम आज के उन्नीसवें श्लोक के आख़िर में है। पहले ये श्लोक ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम की एक सौ आठ दिन की इस यात्रा में आज उन्नीसवाँ दिन है, और आज के श्लोक में आठ नाम हैं।

पहले कल का हाल पूछ लूँ। कल दवा लेते हुए, या पानी पीते हुए, मन में वैद्यः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में उन्नीसवाँ मनका जुड़ गया।

श्लोक की शुरुआत चार बड़े नामों से होती है, महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति और महाद्युति, यानी बड़ी बुद्धि, बड़ा पराक्रम, बड़ी शक्ति और बड़ी चमक। फिर आता है अनिर्देश्यवपु, यानी जिनके रूप को शब्दों में बताया ही नहीं जा सकता, और उसके बाद श्रीमान् और अमेयात्मा, ये दोनों नाम आप पहले भी सुन चुके हैं।

और आख़िरी नाम, जिसका कल वादा किया था, महाद्रिधृक्। महा-अद्रि यानी बड़ा पहाड़, और धृक् यानी उठाने वाला, तो महाद्रिधृक् यानी बड़े पहाड़ को उठाने वाले। और ये पहाड़ है गोवर्धन।

भागवत में कहानी है कि इन्द्र गोकुल से नाराज़ थे, क्योंकि गोकुल वालों ने उनकी पूजा बन्द कर दी थी। तो उन्होंने बादलों को आदेश दिया कि गोकुल को डुबो दो। मूसलधार बारिश शुरू हुई, तेज़ आँधी चली, गाएँ काँपने लगीं, और ठण्ड से ठिठुरते गोप-गोपियाँ अपने बच्चों को सीने से ढके हुए कृष्ण के पास दौड़े, और बोले, "कृष्ण, कृष्ण, गोकुल के रक्षक तुम ही हो, हमें बचाओ।"

और कृष्ण ने मन में कहा, "यह व्रज मेरी शरण में है, मैं इसका रक्षक हूँ, ये मेरा अपना परिवार है।" और फिर उन्होंने एक हाथ से गोवर्धन पर्वत उखाड़ा, और ऐसे उठा लिया जैसे कोई बच्चा खेल-खेल में कुकुरमुत्ता उठा लेता है। फिर सबको पुकारा, "माँ, बाबा, सब आ जाओ, अपनी गायों के साथ पहाड़ के नीचे आ जाओ, और डरो मत कि पहाड़ मेरे हाथ से गिर जाएगा।"

और भागवत कहती है कि सात दिन तक, भूख-प्यास भूलकर, वो पहाड़ उठाए खड़े रहे, अपनी जगह से एक क़दम भी नहीं हिले, और पूरा गोकुल बस उन्हें निहारता रहा। ज़रा उस दृश्य को मन में लाइए। जिस बच्चे को कल तक माँ गोद में उठाती थी, आज उसने पूरा गाँव उठा रखा था।

तो जिस बारिश से हमने आज शुरू किया था, उन मुसीबतों से जो थमती ही नहीं, उनके लिए इस कहानी में एक बहुत सच्ची बात है। बारिश सात दिन चली, उसे कोई रोक नहीं पाया, पर पहाड़ एक पल के लिए भी नहीं गिरा, क्योंकि उसे उठाने वाला थका नहीं। बारिश लम्बी हो सकती है, पर जो उनकी शरण में आता है, वो उनका अपना परिवार हो जाता है, और उसके सिर पर छत बनी रहती है।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज कुछ देर अपने घर की छत के नीचे चुपचाप बैठिए, बस एक पल, और मन में कहिए, महाद्रिधृक्। जो इतना बड़ा पहाड़ उठा सकते हैं, वो आपका बोझ भी उठा सकते हैं।

और रोज़ की तरह, आज का श्लोक एक बार गाइए, हो सके तो पूरा सहस्रनाम भी सुनिए, और कमेंट में लिख दीजिए कि आपने गाया, या सुना।

कल हम बीसवें श्लोक पर आएँगे, और कल की कहानी वहीं से शुरू होगी जहाँ आज ख़त्म हुई। बारिश थमने के बाद, जिस देवता ने वो बारिश भेजी थी, वही ख़ुद आकर कृष्ण के पाँव छूता है, और उन्हें एक नया नाम देता है।

महाद्रिधृक्, यानी वो जिनके हाथ से पहाड़ कभी नहीं गिरता। जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक मेरे साथ गाइए।

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.महाद्रिधृक्। जो पहाड़ उठा सकते हैं… वो आपका बोझ भी उठा सकते हैं।
  2. 2."ये मेरा परिवार है।" जो उनकी शरण में आता है… उनका अपना हो जाता है।
  3. 3.बारिश लम्बी हो सकती है। पर छत सलामत है।