विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 35 / 108 · पैंतीसवें श्लोक के नौ नाम

भगवान ने मुझे भुला दिया?

वो ऊँघते नहीं, भूलते नहीं

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अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥

अच्युत प्रथित प्राण प्राणद वासवानुज अपांनिधि अधिष्ठान अप्रमत्त प्रतिष्ठित

अच्युत, प्रथित, प्राण, प्राणद, वासवानुज; अपांनिधि, अधिष्ठान, अप्रमत्त, प्रतिष्ठित।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

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आज का सत्संग, पढ़कर

कभी ऐसा लगता है कि भगवान ने मुझे भुला दिया है, कि वो सबकी सुनते हैं, बस मेरी बारी ही नहीं आती, और पता नहीं कभी आएगी भी या नहीं?

कल मैंने आपसे कहा था कि आज का नाम कहता है कि वो एक पल के लिए भी असावधान नहीं होते। वो नाम आज के पैंतीसवें श्लोक में है। पहले ये श्लोक ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम की एक सौ आठ दिन की इस यात्रा में आज पैंतीसवाँ दिन है, और आज के श्लोक में नौ नाम हैं।

पहले कल का हाल पूछ लूँ। कल ग़ुस्सा आया, तो दस तक गिना, और दसवीं गिनती पर क्रोधहा कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में पैंतीसवाँ मनका जुड़ गया।

और आज के श्लोक में कुछ पुराने दोस्त लौट आए हैं। अच्युत, याद है ग्यारहवाँ दिन, जो कभी अपनी जगह से नहीं गिरते? और प्राण और प्राणद, आठवाँ दिन, साँस, और साँस देने वाले। सहस्रनाम कभी-कभी एक ही नाम दोहराता है, जैसे माँ एक ही बात दो बार कहती है, ताकि बच्चा भूल न जाए। फिर आते हैं प्रथित और वासवानुज, यानी जो सब जगह प्रसिद्ध हैं, और जो इन्द्र के छोटे भाई वामन बनकर आए थे।

और अब वो नाम, जिसका कल वादा किया था, अप्रमत्त। प्रमाद यानी लापरवाही, ऊँघ, भूल, और अप्रमत्त यानी जो कभी लापरवाह नहीं होते, एक पल के लिए भी नहीं ऊँघते।

गीता में कृष्ण ख़ुद कहते हैं, "पार्थ, तीनों लोकों में मुझे कुछ भी करना बाक़ी नहीं, कुछ भी पाना बाक़ी नहीं, फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।" और आगे कहते हैं, "अगर मैं एक पल भी सावधान होकर कर्म में न लगूँ, तो ये सारे लोक बिखर जाएँ।" ज़रा सोचिए, जिसे कुछ भी नहीं चाहिए, वो फिर भी एक पल नहीं रुकता। सूरज का उगना, आपकी साँस का चलना, धरती का घूमना, ये सब इसलिए हो रहा है कि कोई है जो असावधान नहीं है।

और वो रहते कहाँ हैं? गीता का एक और वचन है, "ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं।" तो जो आपके हृदय में रहता है, वो आपको भूलेगा कैसे? और पिछले दिनों की कहानियाँ याद कीजिए, गजेन्द्र की पुकार, ध्रुव की चुप्पी, अजामिल का एक शब्द, किसी की बारी नहीं छूटी।

तो जिस डर से हमने आज शुरू किया था, कि भगवान ने मुझे भुला दिया, उसके लिए मैं आपसे झूठा वादा नहीं करूँगा कि सब कल ठीक हो जाएगा। देर लग सकती है, रास्ता लम्बा लग सकता है। पर अप्रमत्त का अर्थ यही है कि वो ऊँघते नहीं, वो भूलते नहीं, और जो आपके भीतर बैठा है, उसकी नज़र से आप एक पल के लिए भी बाहर नहीं हैं।

इसी श्लोक के बाक़ी नाम भी सुन लीजिए। अपांनिधि, यानी सारे जल का सागर, अधिष्ठान, यानी जिस पर सब कुछ टिका है, और प्रतिष्ठित, यानी जो अपनी महिमा में ख़ुद स्थिर हैं।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज रात सोने से पहले अपने हृदय पर हाथ रखिए, उसकी धड़कन महसूस कीजिए, और मन में कहिए, अप्रमत्त। आप सो रहे होंगे, पर वो जागते रहेंगे।

और रोज़ की तरह, आज का श्लोक एक बार गाइए, हो सके तो पूरा सहस्रनाम भी सुनिए, और कमेंट में लिख दीजिए कि आपने गाया, या सुना।

कल हम छत्तीसवें श्लोक पर आएँगे। आधी रात है, मूसलधार बारिश है, यमुना उफन रही है, और एक पिता अपने नवजात बच्चे को लेकर वो नदी पार कर रहा है। उस पिता का नाम, और उस बच्चे का नाम, कल।

अप्रमत्त, यानी वो जो जागते हैं, जब आप सोते हैं। जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक मेरे साथ गाइए।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.अप्रमत्त। वो एक पल को भी लापरवाह नहीं।
  2. 2.उन्हें कुछ नहीं चाहिए… फिर भी वो रुकते नहीं — हमारे लिए।
  3. 3.जो हृदय में रहता है… वो भूलता नहीं।