विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 16 / 108 · सोलहवें श्लोक के दस नाम

किसी ने बेवजह चोट पहुँचाई?

सहने वाला ही जीतता है

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥

भ्राजिष्णु भोजन भोक्ता सहिष्णु जगदादिज अनघ विजय जेता विश्वयोनि पुनर्वसु

भ्राजिष्णु, भोजन, भोक्ता, सहिष्णु, जगदादिज; अनघ, विजय, जेता, विश्वयोनि, पुनर्वसु।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

किसी ने बेवजह चोट पहुँचाई? और मन कर रहा है… कि अभी जवाब दे दूँ?

कल हमने कहा था — एक ऋषि ने भगवान की छाती पर लात मारी थी। और भगवान ने जो किया… वो सोलहवें श्लोक के एक नाम में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज सोलहवाँ दिन। आज के दस नाम।

पहले कल का हाल — कल भगवान की चार भुजाओं वाली तस्वीर दो पल देखी? चतुर्भुजः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… सोलहवाँ मनका।

पहला नाम — भ्राजिष्णु। जो चमकते हैं।

फिर दो नाम जो रोज़ आपकी थाली से जुड़े हैं — भोजन… और भोक्ता। भोजन — जो ख़ुद अन्न हैं। और भोक्ता — जो हर अर्पण को स्वीकार करते हैं।

और अब वो नाम… जिसका कल वादा किया था — सहिष्णु। जो सहते हैं। जो चोट खाकर भी… शान्त रहते हैं।

भागवत में कहानी है। एक बार ऋषियों ने भृगु मुनि को भेजा — देवताओं के धैर्य की परीक्षा लेने।

भृगु वैकुण्ठ पहुँचे। भगवान विष्णु विश्राम कर रहे थे… लक्ष्मी जी पास थीं।

और भृगु ने… बिना कुछ कहे… भगवान की छाती पर लात मार दी।

अब सोचिए — आगे क्या हुआ? क्रोध? श्राप? सज़ा?

भगवान उठे। लक्ष्मी जी के साथ नीचे उतरे… और ऋषि को सिर झुकाकर प्रणाम किया। बोले — "ब्रह्मन्, आपका स्वागत है! एक पल इस आसन पर बैठिए। हमें आपके आने का पता नहीं था… हमें क्षमा कीजिए।"

और फिर… अपने हाथों से ऋषि के पाँव सहलाने लगे। "महामुने… आपके पाँव तो बहुत कोमल हैं।"

भृगु कुछ बोल नहीं पाए। भागवत कहती है — उनका गला भर आया… और आँखों से आँसू छलक आए।

तो जिस ग़ुस्से से हमने शुरू किया था — कि अभी जवाब दे दूँ… जिसे लात लगी, उसने पाँव सहलाए। और जिसने लात मारी… वो रो पड़ा।

और देखिए — इसी श्लोक में सहिष्णु के ठीक बाद कौन-से नाम आते हैं? अनघ — जिनमें कोई दोष नहीं। विजय… और जेता — जीत, और जीतने वाले। यानी सहना हारना नहीं है। सहने वाला ही जीतता है।

बाक़ी नाम — जगदादिज — जो जगत की शुरुआत में प्रकट हुए। विश्वयोनि — पूरे विश्व की जननी। और पुनर्वसु — जो हर युग में बार-बार आते हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — सहिष्णु यानी… चोट खाकर भी शान्त रहना।

दूसरी — सहना कमज़ोरी नहीं। सहिष्णु के बाद ही आता है — विजय।

तीसरी — कभी-कभी नरमी… सामने वाले का दिल पिघला देती है।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज कोई कड़वी बात कहे — जवाब देने से पहले… तीन लम्बी साँसें लीजिए। और मन में कहिए — सहिष्णु।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — सत्रहवाँ श्लोक। एक छोटा-सा ब्राह्मण बालक… एक राजा से तीन क़दम ज़मीन माँगता है। और तीन क़दमों में… पूरा ब्रह्माण्ड नाप लेता है। कल।

सहिष्णु… सहने वाला ही जीतता है।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.सहिष्णु यानी… चोट खाकर भी शान्त रहना।
  2. 2.सहना कमज़ोरी नहीं। सहिष्णु के बाद ही आता है — विजय।
  3. 3.कभी-कभी नरमी… सामने वाले का दिल पिघला देती है।